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प्रीतीश नंदी | डरना जरुरी है...

विचार

 

डरना ज़रुरी है...

प्रीतीश नंदी

 

 

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि इंसान के तौर पर हम कितने डर और चिंता के साथ जीते हैं? ये हमारे जीवन में इस कदर व्याप्त हो चुके हैं कि हमने इन्हें जीवन का हिस्सा मान लिया है.

सबसे पहले यह भयग्रस्तता जहां सबसे ज्यादा देखी जा सकती है, वह है हमारा टेलीविजन. टीवी न्यूज में हिंसा, क्रूरता, वीभत्स अपराध, बम धमाके, आतंकी धमकियां, सांप्रदायिक दंगे, घरेलू हिंसा, सीमा विवाद, लड़ाई-झगड़े, हत्या, डकैती, अपहरण, बलात्कार, जातीय हिंसा जैसी खबरों की भरमार होती है.

कहीं न कहीं कुछ न कुछ भयावह घट रहा होता है. यह आपके आस-पास हो या फिर बिहार या कश्मीर में अथवा यहां तक कि संसद में भी, लेकिन टीवी इसे घर में लाकर हमारी जिंदगी और बातचीत का हिस्सा बना देता है. पहले तो बुरी खबरों के साथ अच्छी खबरें भी आती थीं. अब तो यह इतनी अपरिहार्य हो गई हैं कि अच्छी खबरों को हाशिये पर धकेल दिया गया है. जब ऐसी पर्याप्त खबरें नहीं होतीं तो टीआरपी गिर जाती है. इस वजह से चैनल्स आपके देखने हेतु डरावनी सामग्री जुटाने के लिए लगातार खोजबीन में लगे रहते हैं.

चिकित्सक, मनोचिकित्सक, योग प्रशिक्षक, आध्यात्मिक गुरु, साधु, तांत्रिक, अंक-ज्योतिषी, खगोलशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, लूट-खसोट करने वाले, अपराधी, वकील यानी वे सब जो आपके भय को पोषित करते हैं, इस माहौल में पनप रहे हैं.


ऐसा ही कुछ प्रेस के साथ भी है. हर जगह बुरी खबरें छाई हैं. पहला पन्ना बड़ी-बड़ी खबरों के लिए होता है. ऐसी खबरें जो आपको भरसक डराएं- 13 फीसदी मुद्रास्फीति, कश्मीर में लगातार हिंसा का दौर, सुलगता जम्मू.

5000 करोड़ की वेतन वृद्धि उन सरकारी कर्मचारियों के लिए जो अमूमन काम नहीं करते, जिससे मुद्रास्फीति की समस्या और गंभीर हो जाएगी, राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, आपके और हमारे लिए आवासीय ऋण और महंगा हो जाएगा. इसके अलावा आर्थिक विकास की रफ्तार कम होना, लुढ़कता शेयर बाजार, पानी और बिजली का बिल दोगुना होना, सोने की कीमतें गिरना, खाद्य की बढ़ती कीमतें, महंगा ईंधन, बेरोजगारी तथा अपराध, और ज्यादा संपत्ति कर, अधिक सेवा कर, ज्यादा वैट, सूखा, बाढ़, फसलों का सफाया, घरों का भी, यानी हर चीज गंभीर स्थिति में है.

और भी बुरा देखना चाहते हैं? नेट पर कोशिश करें. नॉर्मल, फन सेक्स तो अब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है. अब तो इसके जरिये बाल-सेक्स, अप्राकृतिक संबंध, सेक्स चेंज, अश्लील फिल्में, ट्रैफिकिंग, नरभक्षण जैसी चीजें परोसी जा रही हैं. यानी जितनी ज्यादा हिंसा, नग्नता और वीभत्सता, उतना अधिक रोमांच.

यह नया पैमाना है. तकनीक ने और अधिक भय व चिंताओं को जन्म दिया है. लोगों की पहचान चोरी हो रही है. बैंक एकाउंट्स में सेंध लग रही है. क्रेडिट कार्डस हैक हो रहे हैं. तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ हो रही है. आप अपने किसी सहकर्मी के प्रस्ताव को ठुकराइए और बाद में आप किसी लोकप्रिय कम्युनिटी साइट पर अपने को ग्रुप सेक्स फिल्म में देख सकते हैं. धूर्त शैतानों के हाथों में तकनीक उतनी ही खतरनाक है, जितना कि उन्मादी आतंकवादियों के हाथों में बम.

अमीर भी डरे हुए हैं. लुढ़कते शेयर बाजार, लुटेरों व अपहर्ताओं, विवाह पूर्व के समझौतों और तलाक के बाद दिए जाने वाले गुजारा भत्तों से. वे छापों से डरे हुए हैं. उन्हें इस बात का डर है कि मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में उन्हें कारोबार में घाटा हो सकता है. वे चिंतित हैं कि उनकी बचत खत्म हो सकती है, उनकी संपत्तियों की कीमत गिर सकती है और बढ़ती लागतों व करों के बोझ तले उनके कारोबार धराशायी हो सकते हैं. उनकी रातों की नींद उड़ गई है क्योंकि उन्होंने कर बचाने के लिए जो धन सीमा पार किसी गुप्त जगह पर छिपा रखा है, अब उसकी गहरी छानबीन हो सकती है.

गरीब इसलिए डरे हुए हैं, क्योंकि उनका जीवन अब और ज्यादा असुरक्षित है. उनकी झुग्गियां लगातार टूट रही हैं. बिल्डरों-राजनेताओं की साठ-गांठ और मजबूत हो गई है. अब वे कहीं भी अपील नहीं कर सकते. रोजमर्रा की जरूरतें अब उनकी थोड़ी सी कमाई से पूरी नहीं हो सकतीं. जब-जब सड़कों पर कोई हिंसक वारदात या दंगा-फसाद होता है, वे इसके पहले शिकार होते हैं. वे कहीं नहीं जा सकते, कहीं नहीं छिप सकते.

जब भी उनके आस-पास कोई चोरी, डकैती या बम धमाके जैसी कोई वारदात होती है, सबसे पहले उन्हें ही पकड़कर मारा-पीटा जाता है. जहां तक पुलिस की बात है तो वह हमेशा ही बलि का बकरा तलाशने की जल्दबाजी में होती है. ऐसे में कौन प्रताड़ित होता है? गरीब. जिनके पास कोई घर-बार नहीं, स्थायी पता नहीं, राशनकार्ड नहीं, मतदाता पहचान पत्र नहीं, यानी किसी से कोई संरक्षण नहीं. कोई भी अदालतों में उनका बचाव करने के लिए तैयार नहीं होता.

वे लगातार इस भय के साए में जीने को विवश हैं कि पता नहीं कल कौन सी मुश्किल लेकर आए. मध्यवर्ग के लोग अलग तरह के डर में जीते हैं. उनके कुछ डर तो ऐतिहासिक हैं, लेकिन ज्यादातर ज्ञान से जन्मे हैं. वे पढ़े-लिखे, चतुर, जानकार हैं और इस तरह भय की उस जहरीली हवा के प्रति ज्यादा खुले हुए हैं जो उनके दिमाग पर छाई हुई है. वे पर्यावरण के नुकसान, मौसम के बदलाव से डरते हैं. हम जिस तरह जंगल काट रहे हैं, ऊर्जा का अपव्यय कर रहे हैं, दूसरी प्रजातियों को मार रहे हैं, अपने रहवास को नुकसान पहुंचा रहे हैं, प्रकृति को लूट-खसोट रहे हैं और हमारे पूर्वजों द्वारा हमें सौंपी गई तमाम विरासत को नुकसान पहुंचा रहे हैं, इसे लेकर उन्हें काफी चिंता है. वे अपनी जवाबदेही की भावना को दरकिनार नहीं कर सकते.

ऐसे में भाग्यशाली कौन हैं? निश्चित ही फार्मास्युटिकल्स कंपनियां.

तनाव संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं. कंपनियां महफूज हैं. वे सबसे तेजी से बढ़ रही हैं. चिकित्सक, मनोचिकित्सक, योग प्रशिक्षक, आध्यात्मिक गुरु, साधु, तांत्रिक, अंक-ज्योतिषी, खगोलशास्त्री, हस्तरेखा विशेषज्ञ, लूट-खसोट करने वाले, अपराधी, वकील यानी वे सब जो आपके भय को पोषित करते हैं, इस माहौल में पनप रहे हैं.

धार्मिक नेता, राजनेता, घोटालेबाज और धोखाधड़ी करने वाले जो आपको अपने जीवन की उलझनों से बाहर निकलने के शॉर्टकट्स बेचते हैं, उनकी चांदी है. इसके अलावा हम जैसे एंटरटेनर्स भी, जो आपको फैंटेसी के जरिये बचाव का आसान रास्ता बताते हैं. यही कारण है कि हम भारतीय संगीत, कला, फिल्मों और साहित्य में इतने बेहतर हैं. ये अब हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा नहीं रहे. वे अब हमारे जीवन जीने का औजार बन चुके हैं. हमेशा भयाक्रांत रहते हुए हमें विशुद्ध पलायनवाद से लगाव होने लगा है.

 

04.09.2008, 00.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kaushlendra(k.prapanna@gmail.com)

 
 dar ke sociopsychologicaly pritish ji ne chir fad kiya hai. lekh vastav me dar ke gahri bunawat ko ubharta hai. 
   
 

Sunita Verma

 
 यह सच है कि हम सब एक डरे हुए समय में जी रहे हैं लेकिन इसका एक दूसरा पहलू ये भी है कि समाज का एक बड़ा वर्ग निर्भिक हो कर जी रहा है. उसे किसी का डर नहीं है. यकिन नहीं हो तो भ्रष्ट नेताओं से पूछें, जिनकी आज भरमार है. उन नेताओं को किसी बात का डर नहीं सताता, कोई ईश्वर नहीं, कोई मानवता नहीं. इनके पास एक ही नारा है- डरना मना है. 
   

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