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यह जो आंदोलन है

मुद्दा

 

यह जो आंदोलन है

सचिन कुमार जैन


लाखों लोग सड़क पर हैं. वे त्रस्त रहे हैं गैर जवाबदेह व्यवस्था, बेईमान जनप्रतिनिधियों, तानाशाहों की तरह बर्ताव करने वाले सरकारी कर्मचारियों से. सन 1861 में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए पुलिस क़ानून की ढाल से, आम लोगों को प्रताड़ित करने वाली पुलिस से. आपको पता है, आज सामाजिक संस्थाएं जिस क़ानून के तहत सरकार द्वारा पंजीकृत की जाती हैं, वह क़ानून 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन के बाद 1860 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बनाया गया था, ताकि सरकार को पता रहे कि कहाँ कौन लोग, किस मकसद से संगठित हो रहे हैं.

हमारे यहाँ विकास के नाम पर लोगों को उनके गारों, जंगलों और जमीन पर से बेदखल करने के लिए स्वतंत्र भारत की सरकार जिस क़ानून का नत-मस्तक होकर पालन करती है, वह भी 1994 में बना था. अंग्रेजों ने 1929 में एक क़ानून बना कर उस जंगल और वन संसाधनों को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया, जो पूरे मानव इतिहास में समुदाय की संपत्ति रहा. फिर संविधान बना.

बाबा साहब आंबेडकर दलितों की पैरवी कर पाए, इसलिए अनुसूचित जाति को सामाजिक व्यवस्था में समानता के अधिकार को हासिल कर पाने की संभावनाएं मिल पायीं, पर आदिवासियों, बच्चों और महिलाओं के विशेष हक़ कैसे परिभाषित होंगे, यह काम संविधान में भी अधूरा ही रह गया. इनके लिए सब कुछ नीति निदेशक तत्वों में रह गया और मौलिक अधिकार एक ख़ास वर्ग और जाति के लिए विशेषधिकार बन गए. हम सामाजिक परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाइयों में यह भूलते रहेंगे कि हमारा समाज जाति, वर्ग और लिंग आधारित भेदभाव की धुरी पर टिका हुआ है तब तक उस लड़ाई की दिशा सही है, यह नहीं कहा जा सकेगा.

भ्रष्टाचार भी जाति और वर्ग व्यवस्था के तहत ही संचालित होता है. आज भारत भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में यह देख सकते हैं कि 5000 करोड़ रूपए का व्यावसायिक साम्राज्य चलाने वाले भी इसके साथ हैं, और राशन की दुकान से राशन पाने के लिए राशन कार्ड को हासिल करने के लिए 500 रूपए की रिश्वत देने को मजबूर व्यक्ति भी मन से इस आंदोलन से जुडा हुआ है. सवाल यह है कि क्या इन दोनों के जुड़ाव का एक ही सन्दर्भ है?

हम हर बार रिश्वत या घोटालों की बात कह रहे हैं, पर केवल रिश्वत ही भ्रष्टाचार नहीं है, यह हम मानने को तैयार नहीं हैं. अब तो सरकार भी मान रही है कि पीडीएस में बहुत भ्रष्टाचार है, इसीलिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का 40 फ़ीसदी उन तक पहुँचता ही नहीं है, तो हमें राशन देना बंद करके लोगों को नकद देना शुरू कर देना चाहिए.

बात बहुत सधी सी है, पर सत्ता के निहितार्थ बहुत ही खतरनाक. यदि पीडीएस बंद कर दिया जाता है तो किसानों से सरकार अनाज खरीदना बंद कर देगी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को किसानों से शोषण के साथ अनाज खरीदने का मौका मिल जाएगा, या असुरक्षा की स्थिति में जब और लाखों किसान खेती छोड़ेंगे, तो वह जमीनें पूंजीवादी हस्तियाँ खरीदेंगी. सरकार नकद देगी तो बाज़ार में खाद्यान्नों की कीमतें वैसी ही होंगी, जैसी कि आज सोने की कीमतें हैं, यानी बस उछाल ही उछाल. बार-बार बढ़ने वाली कीमतों के मुताबिक़ तो सरकार अपनी सब्सिडी बढ़ाएगी नहीं, तब लोग ऊँची कीमतों पर सवार अनाज को कैसे खरीदेंगे, जरा सोचिये.

बात केवल पीडीएस की नहीं है. अब स्वास्थ्य के मामले में भी यही बात है. डाक्टर साहब नहीं आते हैं, दवाइयां नहीं मिलती हैं, बिस्तर गंदे रहते हैं, जगह नहीं मिलती है, एक्स-रे मशीन बन रहती है और नर्स बुरा बर्ताव करती है...सरकार कहती है, बिलकुल सही बात है. और फिर कुछ विद्वान् आते हैं और सुझाते हैं कि सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था चला नहीं सकती है, उसे यह व्यवस्था कंपनियों या निजी क्षेत्र को दे देना चाहिए. फिर बात आती है. रोज़गार और विकास की, तो सरकार नीति और क़ानून बनाती है कि उद्योग लगा कर रोज़गार पैदा किया जाएगा और 1 करोड़ हेक्टयर जमीन इस दावे के साथ कंपनियों को देना शुरू कर दी जाती है कि इससे विकास होगा और खुशहाली आएगी.

यह सब कुछ नीतियों और क़ानून बना कर किया जा रहा है. कई मामलों में रिश्वत भी दी जा रही है और कई प्रकरणों में मंत्रियों-अफसरों की हिस्सेदारी भी है. इसे तो जांचा जा सकता है, पर जब दवाइयां बनाने वाली कम्पनियाँ डाक्टरों को अध्ययन के बहाने विदेश घुमाती हैं, अफसरों को अपने साथ ले जा कर विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ सिखा-पढ़ा कर वापस भेजते हैं कि किसान के पास जमीन रहने से विकास बाधित होता है, झुग्गी बस्तियों के हटाये बिना शहर सुन्दर नहीं दिखेगा....और फिर हमारे अफसर-मंत्री वैसी ही नीतियां बना कर काम शुरू कर देते हैं. अब जब विस्थापन क़ानून के माध्यम से ही हो रहा है, तो न्यायालय भी उसे जायज़ ही ठहराएगा.

मतलब साफ़ है कि अब भ्रष्टाचार व्यक्तिगत अपराध नहीं है, यह व्यवस्थागत अपराध है. आज ज्यादा से ज्यादा डाक्टर हों, इसके लिए निजी मेडिकल कालेज खोले जा रहे हैं, जिनमें एक युवक को डाक्टर बनने के लिए 25 लाख रूपए खर्च करना पड़ते हैं. सरकार ने उसके लिए कर्जे की व्यवस्था कर दी. जब वह डाक्टर बन जाता है, तो उसका पहला लक्ष्य होता है, 10 साल के लिए 25 हज़ार रूपए प्रतिमाह की किश्तों की व्यवस्था करना. और वहां उसका मकसद होता है पैसा कमाना, तो क्या ऐसी स्थिति में वह सरकारी अस्पताल में नौकरी करने जाएगा? क्या यदि आप उसकी जगह हैं तो क्या आप जायेंगे?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

देवेश तिवारी [deveshtiwaricg@gmail.com] रायपुर - 2011-08-24 20:41:30

 
  भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने अन्ना के इस आंदोलन का साथ दिया ..क्योंकि ये लड़ाई उनके नजरिये में सीधे तौर पर उनसे जुडी हुई है .. जंगल जमीन नदी को बचाने में जनता इस तरह का कोई सहयोग नहीं करेगी .. क्योंकि दो भारत गाँव और शहर में से जो शहरी मानसिकता है उसे जंगल जल जमीन से सीधा जुड़ाव नहीं होने के कारण कोई लेना देना नहीं होगा ..... 
   
 

K. Ashok Rao [kashokrao@gmail.com] - 2011-08-20 18:50:19

 
  It is an interesting coincidence that while in Washington the World Bank’s President Mr. Robert Zoellickan, evangelist for free trade and a member of the neoconservative vanguard, was launching an International Corruption Hunters Alliance (ICHA) to “draw strength, learn from one another and create their global alliance” in India the media owned by the beneficiaries of neo liberalism was launching a “civil society” crusade against corruption.
The term “civil society’ itself is an integral part of the neo con lexicon. Is not the Parliament civil society? Are you and I not civil society?“Civil Society” if for the neo cons that part of society that capital can create supported by corporate media. Campaigns launched by foreign funded NGOs are civil society. The struggles of the tribal people, of the workers or ordinary people are not part of the “Civil Society”. When was the last time you saw a trade union, a tribal leader or a dalit leader on the television debate? They are debarred since they are not the civil society.
World Bank President’s concern was that “stealing is bad enough, ripping off the poor is disgusting” the civil society’s concern was the lack of an ombudsman who would reign in corruption with a magic wand.
It is not surprising that even as the “civil Society” begins its August 2011 offensive, the United States Government decides to interfere in a purely internal matter, while Ford Foundation (known for its links with CIA) pumps in through its NGO named Kabir more than two hundred thousand dollars.
The architecture of legislation in every vital sector of the economy –electricity, telecom, civil aviation etc. dictated by the World Bank and neo cons – is the same. Create a regulator who would control the sector and be independent both the executive and the legislature. Each of these sectors there are having thousands of millions of public money, consumers and employees but neither the executive nor the legislature should be in command. In the last decade we have witnessed regulatory capture by the corporates and the multinationals. The 2 G scam itself is a product of such a capture.
What does the architecture of the civil society Lokpal Bill. Create a super regulator who would oversee the executive, legislature and the judiciary. So from the Prime Minister to the clerk, from the Chief Justice to the Magistrate, from the Member Parliament to the Member of the Legislative Assembly everyone would be covered by an authority that is not elected by the people and is accountable to no one. Anyone who can regulate this regulator in effect regulated the nation.
The sheer arrogance to claim that the “civil society”represents more than a billion Indians, more human beings than dozens of nations put together is staggering. The “Civil Society” in this case has made no bones about the fact that they do not have any respect for the Parliamentary process. The argument is that the Constitution mandated exclusive powers the Parliamentarians to make legislation should be bypassed since there is disconnect between the people and those they stood in line and voted for them to make law.
What would terminate the indefinite fast? -An assurance that Parliament would approve the “Civil Society” bill, and if that condition is not met hold a referendum since we say so. In other words just junk the Constitution of India.
Corruption is not only the misdemeanour of individual, but also the product of policies that encourage and ensure gross inequities. If the head of Medical Council of India and the All India Council of Technical Education, that regulate medical and technical education (including management studies) are in Jail in the company of the head of teacher’s education comparing notes on who could make more money, is it because this bunch of officials, compared to their predecessors, were real venal men wrongly chosen or because of the exponential commodification of education advocated by the World Bank?
Why is it that there has been an exponential growth of corruption in every sector since the time of the introduction of the new economic paradigm based on the conditionalities of the Structural Adjustment Loan following the signing of the Instruments of surrender in 1991 by Shri Man Mohan Singh the then Finance Minister?
Is privatisation, a mechanism of transferring public assets into private assets, in itself an act of corruption, or does it becomes an act of corruption if besides corporates, by breaching some procedures, even an individual has pecuniary share in the proceeds? Nobel Laureate and former Chief Economic Adviser of the World Bank Joseph Stiglitz asserted that privatization in the Third World was nothing but‘briberization‘ In the context of Russia he said“There was too much emphasis on macroeconomic stabilisation at the expense of institution-building. Privatisation was pushed too far too fast, and, without the right regulatory framework, was bound to fail. The result was a country riddled with cronyism and corruption.”
Under the Lokpal and the current crusade against corruption, privatisation and neo liberal policies are policy. If public assets are transferred to private hands and private monopolies replace public monopolies, that is policy leading to economic growth. Corruption arises if individuals dip their hands in the till. In other word, their concern is transaction costs and not what Stiglitz called ‘briberization‘.
It is not surprising either that the neo cons do not hesitate to dump the Mubaraks and the Manmohan Singhs once their use if over. The current economic crisis in the US and Europe dictate the need for ”Colonies without physical occupation” There will be many more such right wing “Civil Society” offensives until every value and institution build as a consequence of the freedom struggle is undermined.
This phenomenon has to be fought politically. Unfortunately, a worthless Government using a largely colonial criminal jurisprudence has played into the hands of this offensive and created a situation where in the minds of the unsuspecting public it’s a simple a political crusade against a corrupt government.
In the absence of a working class movement, between a guilty government and a presumptuous“civil society” Indian politics is slowly and steadily moving towards the Latin America style of politics – where a minuscule percentage of the population control everything from politics to every sector of the economy, sustained by internal repression.
 
   
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