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सत्ता पर भारी योग्यता

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सत्ता पर भारी योग्यता

एम जे अकबर


सरकार के तीन दिग्गजों, चिदंबरम, सिब्बल और सलमान खुर्शीद ने मिलकर अन्ना के खिलाफ़ मोर्चा खोला और आक्रामक रुख अपनाते हुए अन्ना को जेल भेजो का नारा बुलंद करने लगे. 24 घंटे के भीतर ये तीनों ऐलस इन वडंरलैंड की बिल्ली जैसे बन गये थे. एक ज्यादा सक्षम सरकार ने अन्ना के लोकपाल बिल के ड्राफ्ट को संसद में भेज दिया होता और इसे लंबी विधायी प्रक्रिया में छोड़ दिया होता.

आजादी की आधी रात को जवाहर लाल नेहरू की वाक्पटुता इस कदर उम्दा थी कि इसने लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाली उस यादगार सांझ में दूसरे महान भारतीयों के योगदान को एक तरह से ढंक दिया. 64 साल बाद आज हम डॉ राधाकृष्णन की उस आवाज को भी सुनते हैं, जिसमें आजादी की शानदार उपलब्धि की खुशी के साथ ही आने वाले कल के खतरों की चिंता भी दिखाई देती है.

उन्होंने कहा था कि ‘दूसरे’ ,यानी अंग्रेज हमारी कमजोरियों का फ़ायदा उठाने में कामयाब रहे, क्योंकि हममें ही ये कमजोरियां थीं. जब ताकत योग्यता पर भारी पड़ जाती है, तब बुरे दिन शुरू हो जाते हैं. राधाकृष्णन ने आगाह किया था कि अगर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी आदि को जड़ से नहीं मिटाया जाये तो हम इस महान देश के नाम पर बट्टा लगा देंगे.

लोकतंत्र की विशिष्टता संकट के समय में खुद को नये सिरे से परिवर्तित करने में निहित है. यही वह बदलाव है जिसका वादा अन्ना हजारे ने उन बच्चों से किया है, जिनको भविष्य की इबारत लिखनी है. जब शासक दल एक आम आदमी और उल्लसित आंदोलन पर भद्दी टिप्पणियां करने लगता है, तब इसका अर्थ यही लगाना चाहिए कि वह रसातल में गर्क हो गया है.

काश पीलू मोदी इस समय जीवित होते! या कम से कम इस 1970 के दशक के इस शानदार सांसद को हम याद कर पाते. उसी दौर में आखिरी बार लोगों का गुस्सा उस सरकार के खिलाफ़ उबल पड़ा था, जिसकी ताकत ने उसकी योग्यता को लांघने की कोशिश की थी. पीलू की आवाज में ऐसी तुर्शी थी, जो सत्ता के गलियारे में लगातार गूंजती रहती थी. उनकी हाजिरजवाबी के सामने बड़ी से बड़ी इमारत बांस की झोपड़ी की तरह धराशाई हो जाती थी.

अब राशिद अल्वी जैसे कांग्रेस के प्रवक्ता सीआइए संज्ञा का इस्तेमाल करने से परहेज बरतते हैं. लेकिन 1970 के दशक में सीआइएक हर दुष्टता का सार्वजनिक पर्याय बन गया था. जो भी कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देता था, उस पर तुरंत सीआइए का ठप्पा जड़ दिया जाता था. जब सीआइए की संज्ञा भी नाकाफ़ी दिखाई देती थी, तब आरएसएस का ठप्पा लगा दिया जाता था. मानो यह ऐसा कलंक है, जिसे धोया जाना संभव नहीं. 1974 के अल्वियों ने इसी आदत के तहत जयप्रकाश नारायण(जेपी) जैसे प्रतिबद्ध देशभक्त को सीआइए से जोड़ने की कोशिश की थी. तब जेपी आम जनता के गुस्से का नेतृत्व कर रहे थे.

तानाशाही सरकारों को हंसी से ज्यादा डर किसी और चीज से नहीं लगता. पीलू मोदी को यह मालूम था कि हंसा कैसा जाये? एक बार वे लोकसभा में एक बड़ा सा बिल्ला लटकाये आये, जिस पर लिखा था, ‘मैं सीआइ का एजेंट हूं’. सरकार फ़िर संभल नहीं पायी. अब चूंकि हमारे आसपास कोई पीलू मोदी नहीं है, उन बच्चों ने जो अन्ना के चारों ओर लगाए गये बाड़े की रखवाली कर रहे हैं, हंसी को अपना सबसे अहम हथियार बना लिया है.

अगर सरकार अन्ना हजारे से डरी हुई नहीं है, तो उसे उसे व्यंग्य से भरे हुए उन नारों से जरूर डरना चाहिए, जो अन्ना के चारों ओर बच्चों और युवाओं द्वारा लगाए जा रहे हैं. कांग्रेस के बड़े नेताओं को यह यकीन हो सकता है कि वे अपने अपने मूर्ख प्रवक्ताओं से पल्ला झाड़ सकते हैं, लेकिन यह भ्रम है. जनता को मालूम है कि एक संवाददाता कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं है.

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह की त्रिमूर्ति के खिलाफ़ आम आदमी को गुस्सा जमा होता जा रहा है. यह इसके बावजूद है कि सोनिया फ़िलहाल इलाज के लिए देश से बाहर हैं, राहुल गांधी किसी पवित्र क्षण में ही अपनी जुबान खोलते हैं, और डॉ सिंह चुप्पी का इस्तेमाल रणनीतिक रूप से करते हैं. अन्ना जेपी के समान ही एक प्रतीक बन गये हैं. इसका बात का महत्व कम है कि वे क्या मांग कर रहे हैं. अहम बात यह है कि वे इन मांगों को उठा रहे हैं.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
21.06.2011, 00.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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