पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

अन्ना की क्रान्ति

बात पते की

 

अन्ना की क्रान्ति

अरुंधति राय


जो कुछ भी हम टी. वी. पर देख रहे हैं, अगर वह सचमुच क्रान्ति है तो यह मौजूदा दौर की सर्वाधिक शर्मनाक और समझ में न आने वाली क्रान्ति होगी. आज की तारीख में जन लोकपाल बिल के बारे में आपके जो भी सवाल हों, उम्मीद है कि आपको ये जवाब मिलेंगे : बॉक्स पर निशान लगा लीजिए - (ए) वन्दे मातरम, (बी) भारत माता की जय, (सी) इंडिया इज अन्ना, अन्ना इज इंडिया, (डी) जय हिंद.

अरुंधति राय

आप कह सकते हैं कि बिलकुल अलग कारणों और बिलकुल अलग तरीके से, माओवादियों और जन लोकपाल बिल में एक बात समान है- वे दोनों ही भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. एक नीचे से ऊपर की ओर काम करते हुए, व्यापक तौर पर गरीबतम लोगों से गठित आदिवासी सेना द्वारा छेड़े गए सशस्त्र संघर्ष के जरिए, तो दूसरा ऊपर से नीचे की तरफ काम करते हुए ताजा-ताजा गढ़े गए एक संत के नेतृत्व में, अहिंसक गांधीवादी तरीके से, जिसकी सेना में मुख्य तौर पर शहरी और निश्चित रूप से बेहतर जीवन जी रहे लोग शामिल हैं. (इसमें सरकार भी खुद को उखाड़ फेंके जाने के लिए हर संभव सहयोग करती है.)

अप्रैल 2011 में, अन्ना हजारे के पहले "आमरण अनशन" के कुछ दिनों बाद सरकार की साख को चूर-चूर कर देने वाले भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों से जनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने टीम अन्ना; "सिविल सोसायटी" ग्रुप ने यही ब्रांड नाम चुना है, को नये भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का न्यौता दिया. कुछ महीनों बाद ही इस कोशिश को धता बताते हुए, उसने अपना खुद का विधेयक संसद में पेश कर दिया, जो इतना दोषपूर्ण था कि उसे गंभीरता से लिया ही नहीं जा सकता था.

फिर अपने दूसरे "आमरण अनशन" के लिए तय तारीख 16 अगस्त की सुबह, अनशन शुरू करने या किसी भी तरह का कानूनन जुर्म करने के पहले ही अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. जन लोकपाल बिल के लिए किया जाने वाला संघर्ष, अब विरोध करने के अधिकार के लिए संघर्ष और खुद लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जुड़ गया. इस 'आजादी की दूसरी लड़ाई' के कुछ ही घंटों के भीतर अन्ना को रिहा कर दिया गया. उन्होंने होशियारी से जेल छोड़ने से इन्कार कर दिया, बतौर एक सम्मानित अतिथि तिहाड़ जेल में बने रहे और किसी सार्वजनिक स्थान पर अनशन करने के अधिकार की मांग करते हुए वहीं पर अपना अनशन शुरू कर दिया. तीन दिनों तक जबकि तमाम लोग और टी.वी. चैनलों की वैन बाहर जमी हुई थीं, टीम अन्ना के सदस्य उच्च सुरक्षा वाली इस जेल में अन्दर-बाहर डोलते रहे और देश भर के टेलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने के लिए उनके वीडियो सन्देश लेकर आते रहे. (क्या किसी और को यह सुविधा मिल सकती है?) इस बीच दिल्ली नगर निगम के 250 कर्मचारी, 15 ट्रक और 6 जे सी बी मशीनें कीचड़ युक्त रामलीला मैदान को सप्ताहांत के बड़े तमाशे के लिए तैयार करने में दिन रात लगे रहे. अब कीर्तन करती भीड़ और क्रेन पर लगे कैमरों के सामने, भारत के सबसे महंगे डाक्टरों की देख रेख में, बहुप्रतीक्षित अन्ना के आमरण अनशन का तीसरा दौर शुरू हो चुका है. टी.वी. उद्घोषकों ने हमें बताया कि "कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है."

उनके तौर-तरीके गांधीवादी हो सकते हैं मगर अन्ना हजारे की मांगें कतई गांधीवादी नहीं हैं. सत्ता के विकेंद्रीकरण के गांधी जी के विचारों के उलट जन लोकपाल बिल एक कठोर भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून है, जिसमें सावधानीपूर्वक चुने गए लोगों का एक दल हजारों कर्मचारियों वाली एक बहुत बड़ी नौकरशाही के माध्यम से प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, संसद सदस्य, और सबसे निचले सरकारी अधिकारी तक यानी पूरी नौकरशाही पर नियंत्रण रखेगा. लोकपाल को जांच करने, निगरानी करने और अभियोजन की शक्तियां प्राप्त होंगी. इस तथ्य के अतिरिक्त कि उसके पास खुद का क़ैदखाना नहीं होगा, यह एक स्वतंत्र प्रशासन की तरह कार्य करेगा, उस मुटाए, गैरजिम्मेदार और भ्रष्ट प्रशासन के विरुद्ध, जो हमारे पास पहले से ही है. यानी एक के बजाए, अल्पजनाधिपत्य वाली दो व्यवस्थाएं.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ghansyam gupta [ghansyam.gupta69@gmail.com] jabalpur - 2011-09-03 14:19:30

 
  धन्य हैं वो लोग, जो खुद को ही सही समझते हैं और दूसरों को नहीं समझते हैं. क्या ये सोच लोक तंत्र युक्त है या जन लोकपाल के बहाने योजना कोई गुप्त है ??? 
   
 

rajesh jwell [jwellrajesh@yahoo.co.in] indore - 2011-08-28 11:03:16

 
  बात सही है कि सिर्फ लोकपाल बिल से ही भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता. अन्ना महान हैं मगर उनका अड़ियल रवैय्या ठीक नहीं है.ये पूरा तमाशा इलेक्ट्रानिक मीडिया की देन है. अन्ना के समर्थन में खड़ा मीडिया क्या खुद पाक साफ है? 2जी स्पेक्ट्रम और पेड न्यूज सहित तमाम आरोप मीडिया पर लगते रहे हैं और मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिये.एक पत्रकार होने के नाते मैं मीडिया का गेम जानता हूं. 
   
 

RAKSHA [] KATNI - 2011-08-27 06:54:24

 
  Total one sided story.very sad Arundhti that a socialist like u speaks like this.better search a way rather to blame 
   
 

prashant [] raipur - 2011-08-26 07:24:28

 
  The basic quation is to stand firmly,actually doing something and not only discussing,against something which one feels that it is becoming a national problem for a common man,rather than only speaking intellectualy.
Second thing is the spectrum of public life on which one is working.It can be many.That dose\'nt mean that other part of spectrum is wrong or useless.One should not loose heart if movement of one\'s likeing is not given more importance by public,rather more energy is needed to be poured in,so that it can be understood by general people.As far as media is conserned,it is also a group of people of urban areas,you cant blame them for not understanding rural problems.Again they are consern is headlines and breaking news only,it is up to u how to use this medium for your movement.......Pl make interospaction..and don\'t be negetive with something else,rather come forward with suggetions to make it more better and more effective........
 
   
 

देवेश तिवारी [deveshtiwaricg@gmail.com] रायपुर - 2011-08-24 20:18:42

 
  विश्लेषण बेहद बहुत अच्छा है. अरुंधती जी बड़ी विद्वान हैं इसमें संदेह करना हालमार्क लगे चौबीस कैरेट सोने को नकली बताने जैसा होगा ..माफ़ कीजियेगा मै अल्प ज्ञानी हू .. मुझे कभी ऐसा सुनने में नहीं आया कि आप किसी भी मुदद्दे पर सरकार के या सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले किसी टीम के समर्थन में खड़ी हों .. अगर अन्ना का आंदोलन गलत है तो भ्रष्टाचार को कम करने के लिए आपके बुद्धि कौशल से अगर कोई बढ़िया उपाय हो तो आप सामने आइये .. और आप तो ख्यातिप्राप्त हैं आप कहती हैं कि ओ बी वैन देख कर आप अपने घर में होने वाले पथराव का अंदेशा लगा लेती हैं .. इसका मतलब मीडिया आपको भी अपने मुख्य खबर के रूप में आंकता है फिर आप इरोम शर्मिला जी के पास जाकर अनशन में उनका साथ क्यों नहीं दे रही हैं, मीडिया भी आपके पीछे हो लेगा .. एक प्रकृति जिसमें हम उल्टी बात करके लोगों का ध्यान खींचना चाहते हैं इस चोले को उतारिये ... आपको अमरीका के उस पत्रकार की तरह बनने की जरुरत नहीं जिसने कहा था जब मेरी सांसे थमे तब लोगों की जुबान से निकले कि वो बुरा था लेकिन पढ़ा और सुना गया ..... 
   
 

sri pradeep [pradeeptsharma@rediffmail.com] bilaspur - 2011-08-24 02:40:27

 
  Lord Macaulay observed an statement on -Minutes of Indian Education-in 1935 \'We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons, Indian in blood and color, but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect I have never met one among them who could deny that a single shelf of a good European library was worth more than the whole native literature of India and Arabia. Arundhati Roy is one such marvelous representation of the same.She has started her article equating Anna and Maoist.. for one and other reason she found Maoist are Gandhian with arms, and here she is disappointed because a movement without gun apparently be more powerful. Mrs. Roy is disappointed because this is first time that a farmer of secluded peasant class is leading the movement and speaking a plain language a villager speaks at his own home. Now you have to teach him a better , politically correct, issues specific language specially because you are awarded by the same people who speaks the same language. About ford foundation and its money..It is the old rhetoric on which people do not react even... Ask Mahasweta Devi if not so.  
   
 

उग्रनाथ नागरिक [priyasampadak@gmail.com] लखनऊ - 2011-08-23 20:30:21

 
  अच्छा लगा , देर आयद दुरुस्त आयद. 
   
 

prabhakar [rakesh1936@gmail.com] Agra - 2011-08-23 17:41:23

 
  अन्ना और उनकी टीम वस्तुतः ब्लैकमेलिंग कर रहे हैं। अगर कुछ नक्सलवादी/माओवादी जंतरमंतर पर धरना /अनशन करें तो कितने हमारे दुर्धर्ष टीवी पत्रकार उनकी मांगों के समर्थन में आयेंगे,क्योंकि चुनाव तो नक्सली भी नहीं लडना चाहते!सिर्फ अनशन करने से किसी की मांग जायज़ नहीं हो जातीं। 
   
 

sanjay garg [sanjay_cellcom@rediffmail.com] jaipur - 2011-08-23 16:12:41

 
  I m more o less agree with aal points except the slogans. Because slogans are not so badand we should not go on so deep.people including you are not reaching at he main point.
Before going deep into above matter the primary question to be dealt with is whether it is going to help in curving down the graph of corruption or not?
To understand the issue in detail, let us take the assumption that the most powerful jan lokpal as proposed by Anna Hazare team is implemented in our country. What do we think to be happened , is it going to be unaffected by political, monetary or any other means and the investigation would be transparent as being expected by the people of the country? How and why?
The only janlokpal’s investigations can be reliable and transparent? Not the other agencies working in throughout the country? If it is possible, then why don’t we make the existing agencies more transparent, responsible and reliable rather than introducing one more new agency?
I personally feel that no any lokpal can eradicate the corruption as the corruption is not in the people but it is in the system and the basic vision of our leaders.
For an example, let us assume that out of 125 crores people of our country, 6 crores are government employees and out of them 90% are corrupt. Let us replace all the employees with new honest people in the system, what will happen? Will the new honest employees in the system not be corrupt?
Yes, they will be but over a small period of time. It proves that the people in the system are not corrupt but the system is. “The whole system is needed to be overhauled.”
Now, the question is what the shortcomings are in the system. To understand this, we have to restudy the incorporation of the anti- corruption agencies time to time in our country. We find that during the period of 65 years since independence, as and when the government introduced such agencies to control the corruption and facilitate the public of the nation, the graph of corruption kept on reaching new heights. It shows that the corruption is directly proportional to deploying such agencies.
Now the question is whether this corruption would ever end? If yes, then how?
To find the answer to this question, we have to start studying from the very starting after independence and the vision of our then leaders. The basic vision of the effective leaders of the time was a socialistic structure of the economic system in the country. The root of the corruption lies in the centre of this vision. As the basic theory of the vision is to snatch from a group of rich intelligent and hard working people and give a part of it to the poor and needy people to equalize and balance the economic society. By the passage of time, it kept on distorting and due to personal and individual interests of leaders and lack of knowledge of people in this field. And the percentage which was supposed to be given to the poors went on decreasing and corruption went on increasing. As per Rajeev gandhi’s survey in 1980’s the share of poors came down to 15 percent.
The activities of the government seemed to be done for economic reform were similar to that of a group of dacoits who looted the money from rich and throw a very small part of it to a large group of poors. Thus, the group of dacoits gets name, fame and support from an important section of the society. The same approach is being adopted by all the governments after independence and due to this wrong approach and vision of all the leaders from the day of independence till today, the corruption has reached to new heights today.
From all the aspects discussed above, we reach to a conclusion that to root out the corruption we have to take necessary corrective steps. First of all, we have to stop all the activities which cause the corruption to increase and make strategies in such a way that the corruption is minimized and our aim to help the poors in the society is fulfilled.
 
   
 

RAAJESH DHANANI [rajdhan1@yahoo.co.in] KANPUR - 2011-08-23 15:22:02

 
  आप का विश्लेषण बेहद महत्वपूर्ण है तथा डरावनी सच्चाई के बेहद नजदीक है पर ये परिस्थितियां बनाई नहीं गईं, स्वतः बनती चली गई हैं. नियति से कैसे बचा जा सकता है. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in