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लोकतंत्र के ह्रदय में कैंसर

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लोकतंत्र के ह्रदय में कैंसर

एम जे अकबर


आश्चर्य होता है कि कांग्रेस को यह समझने में समय लगा कि अन्ना का आंदोलन ट्वीटर और ब्लॉग से परे निचले स्तर तक पहुंच गया है. गरीब जानता है कि अन्ना हम जैसे ही हैं, भले ही ऐसी धारणा उनके सहयोगियों के बारे में न हो. उन्हें इससे मतलब नहीं है कि उनके सलाहकार कौन हैं. वे पूरी तरह अन्ना के पीछे खड़े हैं और यही उनके लिए काफ़ी है. कांग्रेस को अन्य कारणों से ज्यादा अन्ना पर निजी आक्षेप लगाने के कारण लोगों का भरोसा खोना पड़ा है.

इस बात के तार्किक कारण हैं कि क्यों भ्रष्टाचार पर होने वाली बहस शराबखाने में होने वाली अस्त-व्यस्त बहसों के इर्द-गिर्द घूमने जैसी लगने लगी है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि भ्रष्टाचार को खत्म करना सभी चाहते हैं, लेकिन पूरी तरह नहीं. इसीलिए भाजपा सभी जगह ईमानदारी चाहती है, पर कर्नाटक के खनन मालिकों के लिए थोड़ा राहत भी चाहती है.

कांग्रेस एक स्वच्छ भारत चाहती है, गांव से लेकर सभी जगह तक, लेकिन ऐसा शुद्ध नहीं कि भूखे मंत्री या उसकी पवित्र गाय, और आजकल इस समूह में पवित्र बैल भी शामिल हो गये हैं, भूखे रह जायें. कोई भी राजनीतिक दल इस जाल से स्वतंत्र नहीं है. एक क्षेत्रीय नेता, जो अपने को ईमानदार का प्रतीक दिखाने की कोशिश करता है, उसकी ईमानदारी उस समय अस्त-व्यस्त हो जाती है जब वह व्यापारी को राज्यसभा में भेजता है.

हमारे लोकतंत्र के हृदय में कैंसर हो गया है. हमारी चुनावी प्रक्रिया सफ़ेद धन की बजाय काले धन से संचालित हो रही है. राजनेताओं को पल-पल की जानकारी देने वाले संस्थान को इसकी जानकारी होती कि वे इसका इंतजाम खुद करते हैं. सीबीआइ तब सक्रिय हो जाती है जब उसे तय टारगेट को पकड़ना होता है, लेकिन वह सहयोगी पुलिसवालों के खिलाफ़ कार्रवाई नहीं करती, जो झुग्गी वाले से पानी की आपूर्ति बहाल रखने के लिए महीने में 150 रुपये वसूलते हैं. गरीबों पर रहम नहीं की जाती, क्योंकि वे आर्थिक रूप से सशक्त नहीं हैं.

गवर्नेस पूरी तरह सड़ गया है. केवल एक व्यक्ति है जो भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म करना चाहता है, वह हैं अन्ना हजारे. एक बार उन्होंने ब़ड़े संजीदे तरीके से इस ओर इशारा किया था कि वे कभी चुनाव लड़ने का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होंगे. भ्रष्टाचार पर हो रही बहस हजारों विधियों के बीच डगमगाती दिखी. इस समस्या के मूल यानि चुनावों में भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित किये बिना इसे दूसरी ओर मोड़ने की कोशिश हो रही है. मनमोहन सिंह ने चुनाव सुधार की जरूरत बतायी, लेकिन वह सिर्फ़ बात को आगे बढ़ाना भर रहा. किसी दल ने, जिसमें उनकी अपनी पार्टी भी शामिल है, इस मसले को जोरदार तरीके से नहीं उठाया.

पूरा राजनीतिक वर्ग आज व्यापारी, न्यायाधीश, नौकरशाही और वे सभी जिनके बारे में आप सोच सकते हैं, के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए जमा हुआ है. पर बात जब आत्मावलोकन की आती है, तो जमा हुए संभ्रांत पाखंड करने लगते हैं.

मैं इस बात पर बहस नहीं करूंगा कि सशक्त लोकपाल को राजनीति में धनबल के मुद्दे को देखना चाहिए. इसके लिए हमेशा बहाने रहेंगे. सबसे खास होगा ईमानदारी का कथित संरक्षक चुनाव आयोग. यह उसी तरह है, जैसे यह कहना कि न्यायपालिका मौजूद है, पुलिस और न्यायाधीश अपराध रोकने के लिए बनाये गये थे, अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो इस बात पर बहस नहीं होती. चुनाव आयोग पारदर्शी तरीके से अपने मकसद के प्रति संवेदनशील है, लेकिन उसके समक्ष चुनौतियां उसकी ओधकारिक क्षमता से बाहर की बात है.

अगर आप राजनीति में धनबल के स्तर के बारे में थोड़ी भी जानकारी चाहते हैं तो आप केवल राजनेताओं के छपे बयानों को पढ़ लें. आंध्र प्रदेश के कांग्रेस प्रमुख ने दावा किया कि पार्टी से इस्तीफ़ा देकर जगन रेड्डी के पक्ष में खड़े विधायकों को दस-दस करोड़ रुपये दिये गये हैं. इसे तथ्य के तौर पर न लें. अगर पैसा ही विश्वास की एकमात्र गारंटी होती तो कांग्रेस के पास इतना पैसा है कि वह देश के सभी विपक्षी पार्टियों को खरीद सकती है. लेकिन इस दावे से यह जाहिर होता है कि इसी दायरे में पैसे दिये जाते हैं.

मुझे उम्मीद है कि इस बात से कोई सहमत नहीं होगा कि चुनावी भ्रष्टाचार स्टेट फ़ंडिंग से जुड़ा है. यह आम जनता का पैसा कूड़े में डालने जैसा होगा. इससे चुनावी खर्च कम नहीं होगा, बल्कि बढ़ जायेगा.
 

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
28.08.2011, 00.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित