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मनमोहन सिंह का जादुई डंडा

मुद्दा

 

मनमोहन सिंह का जादुई डंडा

विष्णु राजगढ़िया

 

तो क्या मनमोहन सरकार सरकार भी 1974 और 1984 का हश्र भूल कर इंदिरा गांधी के रास्ते पर बढ़ रही है ? याद करें, पंद्रह अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण, जिसमें वे कहते हैं- "भ्रष्टाचार से निपटने के लिए मेरे पास कोई जादुई छड़ी नहीं है.” यह कथन उन्हें इच्छाशक्ति के नितांत अभाव वाले किसी लिजलिजे कमजोर आदमी में बदल देता है. इससे पहले वह सहयोगी मंत्रियों के कारनामों पर गंठबंधन की मजबूरियां गिनाकर भ्रष्टाचार के पोषक के बतौर अपना नाम लिखा चुके थे.

मनमोहन सिंह


हालांकि भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक यही प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार-विरोधियों से निपटने में पूरी इच्छाशक्ति का परिचय देता है. गोया मनमोहन सिंह कहना चाहते हों- ”भ्रष्टाचार विरोधियों से निपटने के लिए तो मेरे पास जादुई डंडा जरूर है.”

आयकर विभाग ने टीम अन्ना के प्रमुख कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल को एक नोटिस भेजा है. इसी विभाग में कार्यरत अरविंद ने 2006 में ही आइआरएस के आकर्षक पद से इस्तीफा दे दिया था. उनका इस्तीफा अब तक मंजूर नहीं हुआ. नियमों के पेंच के तहत अरविंद से नौ लाख की राशि मांगी गयी. अरविंद के अनुसार विभाग पर उनका ही बकाया निकलता है. जो राशि काटनी है, काट ले. यह राशि कितनी है, किसे लेनी या देनी है, यह विवाद का विषय हो सकता है. लेकिन इसे जिस समय और जिस रूप में पेश किया गया, उसने इस आरोप को आधार दिया कि यह नोटिस केंद्र सरकार के निर्देश पर टीम अन्ना को प्रताड़ित करने के लिए भेजा गया है.

इससे पहले, काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ देश को जगाने वाले स्वामी रामदेव और बालकृष्ण को भी विभिन्न मामलों में उलझाने की कवायद हम देख चुके हैं. अन्ना हजारे जैसे संत की भी पूरी तलाशी लेने के बावजूद कुछ नहीं मिलने से हताश केंद्र सरकार अब टीम अन्ना के सदस्यों के पीछे पड़ी है. क्या ऐसी ही मुस्तैदी से उन मंत्रियों, सांसदों व अधिकारियों की भी जन्मकुंडली तलाशी जायेगी, जिन पर देश को लूटने और विदेशों में अकूत काला धन भेजकर देश को खोखला करने के गंभीर आरोप हैं?

अरविंद केजरीवाल को प्रताड़नामूलक नोटिस भेजे जाने पर मैंने एक व्यंग्योक्ति की. लिखा- ”सरकार एक नया कानून बनाने जा रही है- भ्रष्टाचार विरोधी गतिविधि निरोधक विधेयक 2011. (Prevention of Anti Corruption Activities Bill 2011). इसका उद्देश्य स्वामी रामदेव, बालकृष्ण, अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों से निपटना होगा, जो भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ नागरिकों को भड़काकर सरकार की नींद हराम करते हैं.”

मेरी इस टिप्पणी पर मेरे गुरुदेव सेवानिवृत प्राध्यापक डॉ राजकुमार झा बोले- ”भ्रष्टाचार विरोधियों को सबक सिखाने के लिए केंद्र सरकार का लोकपाल विधेयक ही काफी है.”

मित्रों, बात-बात में हम अचानक एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुंच गये हैं. यह कोई हास्य-व्यंग्य नहीं बल्कि हकीकत है कि सरकारी लोकपाल विधेयक का लक्ष्य भ्रष्टाचार पर काबू पाना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार विरोधियों को ठिकाने लगाना है.

सरकारी लोकपाल विधेयक की धारा 49 कहती है- "जो व्यक्ति कोई झूठी, सतही या परेशान करने वाली शिकायत करेगा, उसे न्यूनतम दो साल और अधिकतम पांच साल तक कैद और 25 हजार से लेकर दो लाख तक जुर्माने की सजा मिलेगी.” (मूल अंग्रेजी का सरल, संक्षिप्त भावानुवाद, कृप्या विधेयक देखें).

ज्यादातर कानूनों में जेल या जुर्माना या दोनों का प्रावधान होता है. लेकिन सरकारी लोकपाल में शिकायतकर्ता नागरिक के लिए जेल और जुर्माना, दोनों को अनिवार्य कर दिया गया है.

एक नजर में यह प्रावधान किसी को तंग करने की नीयत से झूठी शिकायतें करने वालों को रोकने के लिए जरूरी लग सकता है. लेकिन विस्तार से जाते ही यह बात समझ में आ जायेगी कि यह भ्रष्टाचार से लड़ने वाले नागरिकों को डराने और जेल भेजने की बुरी नीयत से किया गया प्रावधान है.

इसमें भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी के मुकदमे का खर्च भी केंद्र सरकार उठायेगी. उस अधिकारी के मुकदमे के खर्च के साथ ही मुआवजे की राशि भी शिकायतकर्ता नागरिक से वसूली जायेगी. विशेष अदालत यह तय करेगी कि आरोपी अधिकारी को कितना मुआवजा व अन्य राशि मिले.

इतने पर ही आप अपनी खैर मानिये. सरकारी लोकपाल विधेयक की धारा 50 कहती है- "यदि झूठी शिकायत किसी सोसाइटी, नागरिक समूह या ट्रस्ट द्वारा की गयी हो, भले ही वह पंजीकृत हो अथवा नहीं, तो उसके कामकाज से जुड़े सारे लोगों और पदाधिकारियों को सजा भुगतनी होगी.”

अब जरा एक उदाहरण देखिये. पिछले वर्ष आपके इलाके के कुछ नागरिकों ने एक बैठक करके मुहल्ला विकास समिति बनायी. उसमें एक अध्यक्ष, एक सचिव, एक कोषाध्यक्ष और पांच कार्यकारिणी सदस्य बना दिये. आपका नाम भी कार्यकारिणी में डाल दिया गया. इसका कोई पंजीकरण नहीं हुआ, कोई विधिवत गतिविधि नहीं चलती. बैठक भी नहीं होती. अध्यक्ष-सचिव कभी-कभार जनहित में कुछ करते रहते हैं. संभवतः साल भर में आप भूल चुके हों कि ऐसी कोई समिति बनी है.

इस बीच आपके मुहल्ले में सड़क निर्माण में अनियमितता के बारे में समिति का कोई सदस्य या पदाधिकारी एक शिकायत भेज दे. सरकारी अधिकारी ऐसी शिकायतों पर होने वाली जांच को आसानी से प्रभावित करके बेकसूर साबित हो सकते हैं. ऐसे में झूठी शिकायत के आरोप में अन्य लोगों के साथ आपको भी दो साल की जेल, दो लाख तक जुर्माना और मुआवजे के बतौर भारी-भरकम राशि का भुगतान करना पड़ सकता है.

क्या ऐसा कानून बनने के बाद आप किसी मोहल्ला विकास समिति या भजन-मंडली या खेल संघ या पत्रकार संघ का सदस्य बनने की हिम्मत कर सकेंगे? याद कीजिये, बचपन से अब तक आप ऐसी कितनी संस्थाओं से किसी रूप में जुड़े और उन संस्थाओं के सदस्यों द्वारा किसी गलत चीज के विरोध में कितने पत्र भेजे गये.

सरकारी लोकपाल विधेयक में भ्रष्टाचार से लड़ने वालों या विसिल ब्लोअर को संरक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन इसमें भ्रष्टाचार से लड़ने वालों के लिए 20 फुट गहरी कब्र का इंतजाम जरूर है.

एक दिल दहलाने वाला उदाहरण देखिये. झारखंड में एक मोबाइल दारोगा को वर्ष 2000 में निगरानी विभाग ने रिश्वत लेते गिरफ्तार किया. जिस अधिकारी ने उसे पकड़ा था, उसने अदालत में सुनवाई के दौरान उसे पहचानने से इनकार कर दिया. इसके कारण मोबाइल दारोगा बेकसूर साबित हुआ. अगर यह गिरफ्तारी आपकी मोहल्ला विकास समिति के किसी सदस्य की शिकायत पर हुई होती तो अन्य सदस्यों के साथ आप भी जेल की हवा खा रहे होते.

जो लोग सरकारी लोकपाल विधेयक पढ़े बगैर अन्ना के आंदोलन पर इधर-उधर की बात कर रहे हैं, उन मित्रों को मेरी सलाह है कि विधेयक की धारा 49 एवं 50 ध्यान से पढ़ और समझ लें. सरकार की नीयत समझने के लिए सिर्फ ये दो धाराएं काफी हैं. टीम अन्ना को धन्यवाद, जिसने समय रहते ऐसा काला कानून बनने से रोक दिया. सरकारी लोकपाल कानून बन गया होता तो हर जागृत नागरिक के लिए हर वक्त जेल के दरवाजे खुले मिलते. अफसोस कि जिस प्रधानमंत्री के पास भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई जादुई छड़ी नहीं, वह भ्रष्टाचार विरोधियों के लिए जादू का डंडा चलाने पर तुला है. सुबुद्धि किसी दुकान पर नहीं मिलती प्रधानमंत्री जी.

03.09.2011, 13.11 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

A K JAIN [akjain.dvc@gmail.com] KOLKATA - 2011-09-11 03:03:22

 
  I have read the article again. It is so beautifully written that the same is required to be gone through by all MPs, MLAs & Govt officials. 
   
 

Deepak Kumar Lohia [lohiaranchi@yahoo.com] Ranchi - 2011-09-08 08:01:39

 
  हालांकि भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक यही प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार-विरोधियों से निपटने में पूरी इच्छाशक्ति का परिचय देता है. गोया मनमोहन सिंह कहना चाहते हों- ”भ्रष्टाचार विरोधियों से निपटने के लिए तो मेरे पास जादुई डंडा जरूर है.”
सरकार की पूरी मंशा इन लाईनों से समझ में आ जाती है. एक बेवाकपूर्ण आलेख.
 
   
 

Vishnu Rajgadia [vranchi@gmail.com] Ranchi - 2011-09-05 16:05:20

 
  Sri AK Jain, pls send me the copies. regards 
   
 

ashok kumar jain [akjain.dvc@gmail.com] kolkata - 2011-09-04 17:42:12

 
  The provision in govts lokpal bill whistleblower bill is dangerous as pointed out by Vishnu Ji. I have evidence that in one complaint of made by us to CVC, it was declared by the CVO of the concerned organization that the complaint lacks merit, but it was established by us and the embezzled amount was refunded back by the party due to our pursuance. Had this bill would have been in place we would have been in jail and suffered fine of Rs. 30000/- also at the same time. We have evedence available with us.  
   
 

दिनेश [iptadgg@gmail.com] डोंगरगढ़ - 2011-09-04 16:35:36

 
  विष्णु जी आपका लेख बहुत अच्छा है। 
   
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