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एक पैसे से दस लाख की तलाश

मुद्दा

 

एक पैसे से दस लाख की तलाश

कृष्ण राघव


संगीतकार रवि के दो गाने बहुत चले थे, ''ओ जाने वाले बाबू, एक पैसा दे दे'' और ''तुम एक पैसा दोगे, वो दस लाख देगा.'' ये दो गीत हमारे औसत समाज की सही मानसिकता जतलाते हैं. कुछ टोटकों से यदि बड़ी सफलता हाथ आती हो तो कौन नहीं आजमाना चाहेगा! इसी से शगुन और और अपशगुन भी जुड़े हुए हैं. सुबह-सुबह यदि कोई कोढ़ी दिख गया और उसे भीख में कुछ दे दिया गया तो दाता के खाते में उस दिन लाभ ही लाभ अर्जित होगा. उसी तरह सुबह-सवेरे काम पर जाते समय यदि किन्नर टकरा गया और उसे पैसे दे दिए गए तो घाटे की शंका समाप्त हो जाती है.

भिखारी
तस्वीरः केवल कृष्ण


शनिवार के दिन लोहे की कटोरी में सरसों का तेल डालकर शनि के नाम पर भीख मांगते लोग आपको हर सिग्नल पर दिख जाएंगे. श्रावण मास में नाग देवता की नागपंचमी के आसपास सांप गले में लटकाए, नवदुर्गा में 'देवी’ के नाम पर, रमजान में अल्लाह के नाम पर अर्थात भीख मांगने के ऐसे-ऐसे नायाब तरीके हैं, जो कामयाब ही इसलिए होते हैं क्योंकि भीख देने वाले मौजूद हैं. जरूरत केवल इस बात की है कि उन्हें धर्म के नाम पर, धन के नाम पर, भविष्य के नाम और धंघे पर घबरा दिया जाय.

हां, मैं जान-बूझकर घबराना शब्द इस्तेमाल कर रहा हूं. तरक्की के नाम पर दिन ब दिन असुरक्षा बढ़ती जा रही है. जितनी तरक्की बढ़ रही है, उतनी ही महंगाई. जितनी महंगाई बढ़ रही है, उतनी ही जीवन स्तर बढ़ाने की होड़ भी. इस होड़ में पीछे न रह जाएं, इसलिए पैसे कमाने की चिंता हद से बढ़ कर साथ रहती है. बद्दुआओं से डर लगता है, किन्नर को न दिया और उसने कुछ कह दिया तो! सांप को न दिया, शनि को दे दिया...इत्यादि, इत्यादि. डर के मारे जान निकली रहती है.

दूसरी ओर यह कि समीकरण भी कितना सरल है. जाते समय केवल कुछ पैसे ही जाते हैं. कुछ पैसों का ज़माना तो खैर अब नहीं रहा. रुपया तो कम से कम लगता ही है, वरना तो दो रूपए, पांच रूपए...जो सिक्का हाथ आ जाए इतना-सा देकर आकाश तक को भी अपनी झोली में डाल देने की आशा और विश्वास; भले ही कुछ लोग उसे अंधविश्वास कहते रहें, यदि हाथ आता है तो हर्ज ही क्या है.

तीसरी बात यह कि भीख देकर शायद इंसान का अहं भी बहुत तुष्ट होता है. दाता बनने का भी एक अपना ही नशा है. अब कुछ उनके बारे में भी कहें, जिन्हें देखकर हम सब ही बेहद द्रवित हो जाते हैं. इनमें बच्चों से लेकर वह बूढ़े तक भी शामिल हैं, जिनका कोई न कोई अंग-भंग है, किसी की आंख तो किसी के पांव या किसी के हाथ हैं ही नहीं. अपनी इन्हीं कमियों की ओर इशारा करते हुए यह आपसे भीख मांगते हैं और सब द्रवित हो जाते हैं.

जबकि नग्न सत्य यह है कि ऐसे गैंग हैं, जो आंख फोड़ने, हाथ काटने आदि का काम करते हैं और भीख मंगवा कर लखपति दादा बने रहना उनका धंधा ही है तो हम किसकी मदद कर रहे हैं. जिसका अंग-भंग है उसकी अथवा उसकी, जो उससे भीख मंगवा-मंगवा कर अपनी तिजोरियां भर रहा हैं? निश्चित रूप से हम उसी की मदद कर रहे हैं. हम नहीं चाहते कि भिक्षावृत्ति रुके. भगवान से, भाग्य से, पाप-पुण्य से इतने डरे हुए हैं हम, इतने असुरक्षित हैं हम कि अपने भीख के पैसों से आगे सोचना ही नहीं चाहते. सोचने की क्षमता नहीं है, ऐसा मैं नहीं मानता, पता न हो यह भी मुझे विश्वास नहीं होता अपितु मंशा केवल इतनी रहती है कि हमने पैसा देकर पुण्य कमा लिया, अब हमें क्या मतलब कि उस पैसे से कोई क्या करता है अथवा वह पैसा किस काम आता है!
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