पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >एम जे अकबर Print | Share This  

एक टाइगर के जाने के बाद

बाईलाइन

 

एक टाइगर के जाने के बाद

एम जे अकबर


उस छोटे से शहर के अकेलेपन में जहां मेरा जन्म हुआ और घर से दूर बोर्डिग स्कूल के बंद जीवन में सपने का अर्थ सिर्फ़ एक पांच अक्षरों का शब्द था. टाइगर. मंसूर अली खान का जादू रेडियो कमेंट्री से आते हर एक शब्द से पार चला जाता था. उस जमाने में रेडियो ही हमारे लिए टेस्ट क्रिकेट की दुनिया में प्रवेश का एकमात्र पासपोर्ट था.

नवाब पटौदी


क्रिकेट के बारे जानने का दूसरा रास्ता खुलता था उन सलेटी तसवीरों से जो ब्लैक एंड व्हाइट अखबारों में छपा करती थीं. हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता था, जब अखबारों में पटौदी की तस्वीर छपती थी. उनकी खड़ी नाक को देखकर ऐसा लगता था कि भगवान ने इसे राजघराने के रुआब के लिए ही रचा है.

उनकी तस्वीर को मैंने अपने स्क्रैपबुक में संजो कर रख दिया था. इसमें नील हार्वी, रिची बेनॉ, वेस हॉल, गारफ़ील्ड सोबर्स और फ्रैंक वौरेल की तसवीरें भी थीं. ज्यादा चर्चित न रहे वौरेल को महान खिलाड़ियों के साथ रखने की वजह यह नहीं थी कि वे बल्लेबाजी कर सकते थे, बल्कि इसलिए कि वे नेतृत्व कर सकते थे.

विरासत में मिली पटौदी की उपाधि में कहीं न कहीं एक दोतरफ़ा संकेत था. हम आमलोगों के साथ उनकी असहजता को भले उनसे सुन न पाएं, लेकिन कभी-कभी महसूस जरूर कर पाते थे. मजेदार बात यह थी वे कल के अभिजात वर्ग को लेकर गाहे-बगाहे की गयी हमारी थोड़ी कड़वी टिप्पणियों को भी सुना करते थे.

1960 के दशक के आते-आते नवाब लोग एक कमजोर कैरिकेचर में तब्दील हो चुके थे. उन्हें 18वीं सदी के उनके शाही भव्यता के दया करने लायक भग्नावशेष के तौर पर देखा जाता था. वे पहले तो ब्रिटिशों के दया पर आश्रित हुए और उसके बाद आजादी के बाद के राजनीतिज्ञों के पिछलग्गू बन कर रह गये. यहां तक कि हिंदी सिनेमा भी छोटे नवाबों पर हंसने लगा था.

राजनीति के मंच पर इंदिरा गांधी का आगमन इस लिहाज से महत्वपूर्ण घटना थी. उन्होंने 1969 में नवाबों और राजाओं को गैरकानूनी बना दिया. इस बात से नवाबों की बौखलाहट उतनी ही बड़ी थी, जितनी बड़ी थी उनकी शक्तिहीनता. जब 1971 के आम चुनावों में उन्होंने इंदिरा गांधी को चुनौती देने की कोशिश की तब शायद उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वे बदलते हुए भारत से कितनी दूर आ गये हैं. इन चुनावों ने इंदिरा गांधी को गद्दीनशीन बनाया. अब भारत की नयी रानी इंदिरा गांधी थीं. लोकतंत्र की नयी बेगम. इस बदलाव से टाइगर भी उतने ही क्षुब्द थे जितना कि कोई भी उनका भाई-बंधु.

लेकिन टाइगर ने अपने इस व्यक्तिगत दुख को अपने अद्भुत सेंस ऑफ़ ह्यूमर के भीतर छिपा लिया. इस ह्यूमर में दुनियावी चुटकुलों की भरमार हुआ करती थी, जिसे एक किस्म के अंगरेजों वाले भावहीन चेहरे के सहारे अंजाम दिया जाता था. वे एक पक्के एंग्लो इंडियन थे. शानदार शेरवानी में भी उसी प्रकार दमकते थे, जिस प्रकार शिकारी जैकेट में.भारत का यह राजकुमार अंगरेजी क्रिकेट से एक रेशमी धागे से बंधा था. इसके सहारे वे नये शासक वर्ग से जुड़े हुए थे.

क्रिकेट न तो अंगरेजों को चुनौती देता था, न ही सामान्य भारतीयों को बहुत ज्यादा अपने भीतर शामिल करता था. एक नवाब के लिए किसी कंपनी में एक बेहद कामयाब एक्जीक्यूटिव बनने जैसा काम उसकी शान के खिलाफ़ हो सकता था. भारत के नीले रक्त वाले राजकुमार के लिए कोई भी ब्लूचिप कंपनी उसके मुताबिक नीली नहीं थी. सेना एक सम्मानजनक आरामगाह हो सकती थी, लेकिन यह बहुत कम के बदले बहुत ज्यादा अनुशासन की मांग करती थी.

राजनीति एक विकल्प हो सकता था, लेकिन इसके लिए आम आदमियों के साथ कंधे घिसने पड़ते. ग्लैमर के साथ टाइगर का रिश्ता सहज बना रहा. वे पाखंडी नहीं थे, इसलिए उन्होंने ग्लैमर की आलोचना नहीं की. लेकिन वे कभी अपने आईने या अपनी छवि से प्रेम में नहीं पड़े.

उनके खाते में रनों की कमी को लेकर कई तरह की व्याख्याएं की गयीं हैं. उन्होंने केवल छह शतक जड़े. ऑक्सफ़ोर्ड में कार दुर्घटना में एक आंख गंवाने को लोग इसकी सबसे बड़ी वजह मानते हैं. मेरा मानना है कि उन्होंने इसकी बहुत फ़िक्र ही नहीं की. क्रिकेट उनके लिए अंतत: एक खेल ही था, धर्म नहीं. उन्होंने आंकड़ों के लिए खुशियों से समझौता नहीं किया.

पटौदी की पहचान एक टाइगर के तौर पर बनने के पीछे उनकी अनोखी और चुस्त स्टाइल का हाथ था. वे क्रीज पर बेहद शांत रहा करते थे, लेकिन अचानक तेजी से झपट पड़ते थे. वे अपने चेहरे पर हमेशा एक टाइगर वाली मुस्कान ओढ़े रहते थे. वे असल में रॉयल बंगाल टाइगर थे. इसे कलकत्ता ने उस समय सहर्ष स्वीकार भी कर लिया जब उन्होंने महान टैगोर खानदान की जहीन बेटी शर्मिला से शादी रचायी.

 

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
25.09.2011, 00.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in