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कांग्रेस की दुर्दशा

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कांग्रेस की दुर्दशा

एम जे अकबर


इन दिनों कांग्रेस पर लगातार चोट पड़ रही है. यह सत्ता की निहाई पर महत्वाकांक्षा के हथौड़े की चोट है. सत्ता हासिल करने की उम्मीद ने भाजपा को सिरदर्द दे रखा है. अपनी स्थिति को लेकर कांग्रेस गंभीर है. भाजपा अब भी अक्लमंदी से दूर. चिदंबरम और नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं का लंबे समय तक अपने पदों पर बने रहना भारतीय राजनीति की एक चौंकाने वाली विशिष्टता है. इन नेताओं को असहनशीलता का रोग समान रूप से व्यापता है.

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी


चिड़चिड़ापन इस रोग का साइड इफ़ेक्ट है. चिदंबरम जानबूझ कर प्रेस कांफ्रेंस में याद्दाश्त गंवा बैठते हैं तो नरेंद्र मोदी को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की तारीखें याद नहीं रहतीं. कांग्रेस का संकट ज्यादा बड़ा है. क्योंकि इसकी वजह से केंद्र सरकार का कामकाज पूरी तरह से ठप पड़ चुका है. जहां तक भाजपा का सवाल है, किसी को इसके महात्वाकांक्षी नेताओं को यह बात बतानी चाहिए कि भारत के मतदाता उन लोगों को सजा देने से नहीं चूकते जो मत डाले जाने से पहले ही अपने आप को जीता हुआ मान बैठते हैं.

यह सही है कि कांग्रेस की हालत फ़िलहाल काफ़ी खराब है, लेकिन यह अपने आप को अगले लोकसभा चुनावों की दौड़ से बाहर नहीं मान रही. कांग्रेस ने जो रणनीति बनाई है, उसके पांच चरण हैं. ये सारे चरण आशा के तर्क से आपस में जुड़े हुए हैं. कांग्रेस की रणनीति की शुरुआत इस मान्यता से होती है कि मतदाता की स्मृति काफ़ी छोटी होती है और वह किसी चीज को लंबे समय तक दिल से लगाकर नहीं रखता. कांगेस की दूसरी उम्मीद यह है कि लोकपाल बिल के पारित हो जाने से जनता का गुस्सा खुद-ब-खुद शांत पड़ जायेगा.

तीसरी मान्यता यह है कि भ्रष्टाचार वैसा बड़ा मुद्दा न होकर बस एक छोटा सा घाव है. चौथी मान्यता के मुताबिक वर्तमान की तमाम गलतियों की जिम्मेदारी मनमोहन सिंह की छवि पर लादी जा सकती है. मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत बेईमानी की बजाय राजनीतिक प्रबंधन में चूक का आरोप ही लगाया जा सकता है, जो पार्टी को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचायेगा.

कांगेस यह भी मान रही है कि अगर वर्तमान गलतियों की जिम्मेदारी किसी रूप में अगर मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी राहुल गांधी पर आती भी है, तो इसे बड़ी आसानी से गरीबों के कल्याण के लिए चलायी जाने वाली उन हाइ प्रोफ़ाइल योजनाओं के सहारे मिटाया जा सकता है, जिसका खर्चा अगर बजटीय आवंटन से नहीं पूरा पड़ता है, तो रिजर्व बैंक और इंडिया के खजाने का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

पार्टी उत्तर प्रदेश में उम्मीद के अनुरूप सफलता के बाद यह कदम अपने भाग्य को सुधारने के लिए उठा सकती है. पार्टी का मानना है कि किसानों के लिए कर्ज माफ़ी की घोषणा पिछले चुनाव का टर्निग प्वाइंट था. हालांकि तथ्य इस निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करते. कांग्रेस की सीटों के खाते को 200 से ऊपर ले जाने में असल भूमिका शहरी मतदाताओं ने निभाई थी. बहरहाल यह उनकी सोच है और सोच ही महत्वपूर्ण है. वापसी की कांग्रेस की उम्मीदें यूपी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन पर टिकी हैं. इससे पीएम के पद के लिए राहुल की दावेदारी भी मजबूत हो जायेगी.

कांग्रेस ने पिछले लोकसभा चुनावों में यूपी के असाधारण प्रदर्शन को दोहरा पाने की उम्मीद छोड़ दी है. तब इसे 120 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी. 2012 में अगर इसे 60 सीटों पर जीत मिलती है, तो भी वह विजेता होने की घोषणा कर सकती है. कांग्रेस के मायावती पर हमलावर होने की उम्मीद है. लेकिन मुलायम के खिलाफ़ उसका रवैया ज्यादा कठोर नहीं होगा. चुनाव के बाद आखिर उसे सहयोगी की दरकार होगी. लेकिन अपने रवैये में वह ज्यादा कठोर शायद ही हो. बेहतर प्रस्ताव मिलने पर पार्टी मायावती के साथ जाने से भी परहेज न करे.

यूपी में 60 सीट कांग्रेस के लिए लखनऊ की सत्ता का दरवाजा खोल सकती है. यूपी चुनाव प्रचार के स्टार राहुल और प्रियंका होंगे. प्रियंका पूरे राज्य का दौरा कर सकती हैं. उम्मीद है कि अगले आम चुनावों में प्रियंका गांधी अपनी मां की रायबरेली की सीट से चुनाव भी लड़ेंगी. यह सब एक कपोल कल्पना है, जिसके सहारे कांग्रेसी नेता सुकून भरी नींद ले सकते हैं.

भाजपा के लोग यह मानते हैं कि उनका ऊपर की ओर बढ़ रहा ग्राफ़ यूपी चुनाव में प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. वे कम से कम 80 सीटों का लक्ष्य रख रहे हैं. सच्चाई यह है कि दोनों पार्टियां यूपी में बहुत अच्छा नहीं कर सकतीं. चुनाव विश्ले षकों की मानें तो यूपी में मायावती, मुलायम और छोटी पार्टियां आपस में 300 सीटें बांट लेंगी. कांग्रेस और भाजपा के बीच 100 सीटों का बंटवारा होगा. इनमें किसी एक को ही 60 या हद से हद 80 सीट मिल सकती है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
02.10.2011, 00.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित