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मुझे जीवन भर गलत समझा गया

विचार

 

मुझे जीवन भर गलत समझा गया

महात्मा गांधी


मैं सोचता हूं कि वर्तमान जीवन से 'संत' शब्द निकाल दिया जाना चाहिए. यह इतना पवित्र शब्द है कि इसे यूं ही किसी के साथ जोड़ देना उचित नहीं है. मेरे जैसे आदमी के साथ तो और भी नहीं, जो बस एक साधारण-सा सत्यशोधक होने का दावा करता है, जिसे अपनी सीमाओं और अपनी त्रुटियों का अहसास है और जब-जब उससे गुटिया हो जाती है, तब-तब बिना हिचक उन्हें स्वीकार कर लेता है और जो निस्संकोच इस बात को मानता है कि वह किसी वैज्ञानिक की भांति, जीवन की कुछ 'शाश्वत सच्चाइयों' के बारे में प्रयोग कर रहा है, किंतु वैज्ञानिक होने का दावा भी वह नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी पद्धतियों की वैज्ञानिक यथार्थता का उसके पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है और न ही वह अपने प्रयोगों के ऐसे प्रत्यक्ष परिणाम दिखा सकता है जैसे कि आधुनिक विज्ञान को चाहिए.

गांधी जी


मैं अपने जीवन में न कोई अंतर्विरोध पाता हूं, न कोई पागलपन. यह सही है कि जिस तरह आदमी अपनी पीठ नहीं देख सकता, उसी तरह उसे अपनी त्रुटियां या अपना पागलपन भी दिखाई नहीं देता. लेकिन मनीषियों ने धार्मिक व्यक्ति को प्रायः पागल जैसा ही माना है. इसलिए मैं इस विश्वास को गले लगाए हूं कि मैं पागल नहीं हूं बल्कि सच्चे अर्थों में धार्मिक हूं. मैं वस्तुतः इन दोनों में से क्या हूं, इसका निर्णय मेरी मृत्यु के बाद ही हो सकेगा.

मैंने कभी अपने आपको संन्यासी नहीं कहा. संन्यास बड़ी कठिन चीज है. मैं तो स्वयं को एक गृहस्थ मानता हूं जो अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर, मित्रों की दानशीलता पर जीवन निर्वाह करते हुए, सेवा का विनम्र जीवन जी रहा है... मैं जो जीवन जी रहा हूं वह पूर्णतया सुगम और बड़ा सुखकर है, यदि सुगमता और सुख को मनःस्थिति मान लें तो. मुझे जो कुछ चाहिए, वह सब उपलब्ध है और मुझे व्यक्तिगत पूंजी के रूप में कुछ भी संजोकर रखने की कतई जरूरत नहीं है.

मैं अपनी सीमाओं को स्वीकार करता हूं. मैंने कोई उल्लेखनीय विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त नहीं की. हाई स्कूल तक मैं कभी औसत से .पर का छात्र नहीं रहा. मैं परीक्षा में पास हो जाता था तो शुव्गुजार होता था. स्कूली परीक्षाओं में विशेष योग्यता प्राप्त करने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था.

अपनी पढ़ाई के दिनों में मैंने पाठय्पुस्तकों के अलावा शायद ही कुछ पढ़ा हो और सव्यि जीवन में प्रवेश के बाद मुझे स्वाध्याय के लिए प्रायः कम ही समय मिला. इसलिए मैं विशेष पुस्तकीय ज्ञान का कोई दावा नहीं कर सकता. बहरहाल, मेरे इस विवशताजन्य संयम से कोई विशेष हानि हुई नहीं दिखती. इससे उलट, हुआ यह है कि कम किताबें पढ़ने के कारण मुझमें यह योग्यता आई कि जो पढूं, उसे भीतर भली भांति गुनूं-मनन करूं .

इन पढ़ी हुई पुस्तकों में से जिस एक पुस्तक ने मेरे जीवन में तत्काल और व्यावहारिक रूपांतरण कर डाला, वह थी 'अनटू दिस लास्ट'. बाद में, मैंने गुजराती में इसका अनुवाद किया जिसका शीर्षक रखा 'सर्वोदय' 1सब का कल्याण1. मेरा विश्वास है कि रस्किन की इस महान पुस्तक में मुझे अपनी ही गहरी आंतरिक निष्ठाएं प्रतिबिंबित होती दिखाई दीं और यही कारण है कि इसने मुझे विमुग्ध करके मेरे जीवन का रूपांतरण कर डाला .

तब मैं दक्षिण अफ्रीका में रह रहा था. मैंने 'अन टू दिस लास्ट', पैंतीस वर्ष की अवस्था में 1904 में, डर्बन जाते समय रेल में पढ़ी. इसे पढ़कर मैंने अपने संपूर्ण बाहरी जीवन को बदल डालने का निर्णय ले लिया. मैं बस यही कह सकता हूं कि रस्किन के शब्दों ने मुझे विमुग्ध कर दिया. मैं एक साथ पूरी पुस्तक पढ़ गया और उसके बाद रात भर सो नहीं सका. मैंने तत्काल अपने संपूर्ण जीवनव्म को बदल देने का फैसला कर लिया. टाल्सटाय मैं बहुत पहले पढ़ चुका था. उसने मेरे अंतर्मन को प्रभावित किया था.

मुझे जीवन भर गलत समझा जाता रहा. हर एक जनसेवक की यही नियति है. उसकी खाल बड़ी मजबूत होनी चाहिए. अगर अपने बारे में कही गई हर गलत बात की सफाई देनी पड़े और उन्हें दूर करना पड़े तो जीवन भार हो जाए. मैंने अपने जीवन का यह नियम बना लिया है कि अपने बारे में किए गए गलत निरूपणों या मिथ्या प्रचारों पर स्पष्टीकरण न देता फिरूं सिवाय तब के जबकि उनको सुधारे जाने की जरूरत लगे. इस नियम के पालन से मेरी कई चिंताएं मिटीं और बहुत-सा समय बचा.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

amin [patelamin931@gmail.com] jalgaon - 2011-10-13 08:26:54

 
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