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मोंटेक सिंह को उपहार

बाईलाइन

 

मोंटेक सिंह को उपहार

एम जे अकबर


अमीरी की पहचान गरीबी की तुलना में कहीं आसानी से की जा सकती है. अमीरी दिखती है लेकिन गरीबी निगाहों से परे होती है. गरीबी का निकृष्टतम रूप भारत सहित विश्व के उन हिस्सों में दिखाई देता है, जहां यह सरकार की नजरों से दूर होती है और व्यक्तियों या संस्थाओं की दिलचस्पी नहीं जगा पाता, जो आधुनिक जीवन के इंजन को चलाने का काम करते हैं.

मोंटेक सिंह


मसलन, व्यवसायी वर्ग, नौकरशाही या फ़िर मीडिया. जीवन में उदारवादी सिद्धांतों को अपनाने वाले कभी-कभी भुखमरी जैसे हालात के दृश्य को देख कर नैतिक रूप से थोड़ा विचलित जरूर महसूस करते हैं, लेकिन गरीबी किसी भी बही खाते में दर्ज नहीं होती. हमलोग गरीबों से अपनी निगाह फ़ेर लेने में ही भलाई समझते हैं. सारी जवाबदेही को सरकार पर डाल कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं. सरकारें निजी हितों और गैर-व्यक्तिगत फ़ैसलों की अजीबोगरीब खिचड़ी होती हैं.

हम अपने अनुभवों से जानते हैं कि सरकार की तरफ़ से दी जानेवाली सबसे अच्छी सेवा जुबानी सेवा है. इस जुबानी सेवा की खिल्ली मत उड़ाइये. काफ़ी श्रम से इसका विकास एक विज्ञान के तौर पर किया गया है. इस विज्ञान का आधार आंकड़े हैं. जुबानी सेवा अपनी वैधता आंकड़ों में छिपे तथ्यों से ग्रहण करते हैं. कुछ इस तरह, मानो तथ्य, सत्य के समानार्थी हों. आंकड़े सरकार की तरफ़ से आते रहते हैं और हमें इस बात का भ्रम देते रहते हैं कि कोई न कोई जरूर ऐसा है जो किसी मसले पर कुछ न कुछ जरूर कर रहा है.

हमारे यहां आंकड़े योजना आयोग का विशेषाधिकार हैं, जिसका मुखिया फ़िलहाल विदेश से लौटा एक ऐसा नौकरशाह है, जिसे कोई भी चीज प्रभावित नहीं करती. मोंटेक सिंह आहलूवालिया का परिचय भारत से कराना एक अच्छा विचार हो सकता है. आखिर जब तक मनमोहन सिंह योजना आयोग के अध्यक्ष हैं, आहलूवालिया योजना आयोग के वास्तविक मुखिया बने रहेंगे.

32 रुपये वाली गरीबी रेखा के पिता के तौर पर मशहूर हो चुके मोंटेक गरीबी की गणना के लिए उन मानकों को नहीं अपनाते जिसका इस्तेमाल इंगलैंड और अमरीका जैसे देश करते हैं. हम लोग नीचे से ऊपर तक की पद्धति का अनुसरण करते हैं. ऐसे पैमाने का, जिसमें किसी व्यक्ति के जीवित रहने के न्यूनतम खर्च का ध्यान रखा जाता है.

इसके तहत जीवित रहने के लिए जरूरी कैलोरी की गणना की जाती है. जबकि अमीर देश गरीबी की गणना देश की औसत संपत्ति के एक खास प्रतिशत पर तौर पर करते हैं. इस औसत के एक खास प्रतिशत से नीचे चले जानेवाले को गरीब यानी मदद का हकदार माना जाता है. यही वजह है कि अमीर देशों में गरीब कभी भुखमरी के कगार पर नहीं आते.

गरीबी रेखा के पैमाने को बदलने के लिए दिया गया तर्क बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं था. कहा गया कि अमीर देश आर्थिक अधिशेष की वजह से गरीबी रेखा को ऊपर बढ़ा पाते हैं. अगर दूसरे नजरिये से देखा जाये तो क्या यह नहीं कहा जा सकता है कि ये देश आज इसी कारण अमीर हैं क्योंकि उन्होंने अपने यहां गरीबी की परिभाषा को बदल दिया है.

कोई देश कैसे अमीर बनता है? क्या अमीरों के एक ऐसे छोटे समूह द्वारा जिसके पास संपत्ति के निर्माण और उसके खर्च का अधिकार है और जो इस शक्ति का इस्तेमाल इस संपत्ति के वितरण को रोकने के लिए करते हैं? या फ़िर एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण द्वारा जो संपत्ति के बंटवारे में यकीन करती है? इसका जवाब भारत में एक बेहद रूखे अंदाज में इस सिद्धांत के रूप में दिया गया कि गरीबों को जो मिलता है, वे उसके ही लायक हैं और वे अपने भाग्य के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं.

इस तर्क के नाकाफ़ी साबित होने पर गरीबी को नियति करार दिया जाता है. अतीत में इन तर्को से खूब काम चलाया जाता रहा है क्योंकि गरीबों के पास इस व्यवस्था को चुनौती देने की शक्ति नहीं थी. यही उसे मारे भी जा रही थी.

लोकतंत्र का सबसे बड़ा गुण यह है कि इस तरह की विध्वंसकारी असामनता टिक नहीं सकती. राजनीतिक अधिकार का तभी कुछ मतलब है जब वे आर्थिक सशक्तिकरण का जरिया बनें. सामंतवाद और उपनिवेशवाद के तहत काफ़ी लंबे दौर तक क्रूरता का चक्र चलता रहा. इस क्रूरता का एक बेहद दुखद लक्षण अकाल था.

लेकिन सबसे अच्छे शासकों और वायसरायों को यह पता था कि जब आर्थिक भेदभाव गरीबों की जान लेने लगती है तब कोई भी साम्राज्य संकटग्रस्त हो जाता है. जहांगीरनामा के एक संस्करण में जहांगीर की एक तसवीर है, जिसमें वह एक कुरूप चुड़ैल को तीर लेकर मारने के लिए तैयार हैं. यह ऐसी तसवीर नहीं है, जिसे भारत का शहंशाह आनेवाले समय के लिए बचा कर रखना चाहता. इस तसवीर के नीचे लिखे अक्षरों को पढ़ने से पहले तक मैं भी काफ़ी आश्चर्यचकित था.

दरअसल इस तसवीर में चुड़ैल गरीबी का प्रतीक है. जहांगीर इस गरीबी रूपी चुड़ैल का संहार कर रहे थे. दीवाली जल्द ही आने वाली है. हमें पैसे जमा कर जहांगीरनामा की एक-एक प्रति योजना आयोग के हर सदस्य को दीवाली के उपहार के तौर पर भेजनी चाहिए.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
09.10.2011, 03.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Harender Singh butola [hbutola@gmail.com] Ashok Vihar Delhi - 2013-09-29 08:20:04

 
  32 per day income is not healthy growth. 
   
 

ओम वर्मा [om.varma17@gmail.com] देवास 455001 ( म.प्र.) - 2011-10-15 17:05:40

 
  वे सचमुच बड़े महान हैं | उन्हें देश की जनता का बार-बार प्रणाम है | उनमें कई पी.सी.सरकारों की आत्माएं प्रवेश कर गईं हैं | वे इतने मायावी हैं कि उन्होंने देश से एक झटके में गरीबी दूर कर दी है | वही गरीबी जिसके नाम पर कई चुनाव लड़े गए,वही गरीबी जिसको हटाते हटाते कई सरकारें हट गईं ...वही गरीबी अब सदन में दिए गए एक बयान के बाद एक झटके में ख़त्म हो गई है |
गरीब यानी वह शख्स जो गरीबी की रेखा के नीचे गुजर बसर करता है ...लेकिन गरीब है कौन ? इस जटिल प्रश्न का हल फ्रांसीसी गणितज्ञ फर्मेट (Fermat) के उस अंतिम व जटिल प्रमेय (Theorem) की तरह था जो वर्षों तक अनुत्तरित रहा | मगर योजना आयोग ने यह बताकर कि जो शख्स शहर में रहकर 32 रु. और गाँव में रहकर 26 रु. प्रतिदिन खर्च कर सकता है, वह गरीबी रेखा से ऊपर है.. यानी बीपीएल या गरीब नहीं है , वर्षों से चले आ रहे अनुत्तरित प्रश्न का हल आखिर खोज ही लिया है |
हमारे देश में कुछ लोगों को गरीब कहलाने या गरीब दिखने का कुछ ज्यादा ही शौक़ है | गरीबों की जमात में शामिल होकर ये लोग बिला वजह सरकार व योजनाकारों के लिए परेशानी पैदा करते रहे हैं | आज बत्तीस रु. तो बड़े शहरों का भिखारी भी कमा लेता है | तो देश में कहाँ बचा कोई गरीब ! सारे सुदामा एक झटके में गरीबी रेखा को पार कर गए हैं ! योजना आयोग ने कृष्ण सा मायावी रूप धारण कर उनके लिए महल न भी खड़े किए हों तो भी कम से कम एक मूल्य सूची पूरे भोजन मीनू के साथ जारी कर दी है | खबरदार ! कोई इधर से उधर हुआ तो ...136 ग्रा.चावल 3 रु....85 मिली. दूध 2 रु.30 पै.,90 ग्रा.प्याज, 180 ग्रा. आलू या कद्दू 1 रु.60 पै. में उपलब्ध हैं ( इन दुकानों को ढूढ़ने का थोड़ा परिश्रम आपको भी करना होगा ) ...जो इससे ज्यादा भाव लेगा उसके खिलाफ आतंकवाद के खिलाफ़ उठाए जा रहे कदमों जैसे \\\'ठोस\\\' कदम उठाए जाएंगे |
जिस योजना आयोग में दो महान अर्थशास्त्री मौजूद हैं उसकी बात पर हमें विश्वास करना ही होगा | अगर 32 रु. में निर्वाह करने में किसी को जरा भी कठिनाई आएगी तो हर घर में कुंती के अक्षयपात्र की तरह योजना आयोग के बयान या मूल्य सूची की एक-एक प्रति रखवा दी जाएगी , जिससे की अन्न का सिर्फ एक दाना ही सभी को मनचाहा सुख प्रदान कर देगा | सभी रचनाकर्मियों से भी अनुरोध है कि वे अब गरीब और गरीबी को बार बार भुनाना छोड़ दें | या गरीब के बारे में लिखने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि उसकी आय सचमुच 32 रु. या ग्रामीण हो तो 26 रु. प्रतिदिन से कम ही है | इससे अधिक खर्च करने वालों पर आयकर का शिकंजा भी कसा जाना चाहिए | जैसे 32 रु.खर्च करने वालों के दिन फिरे , ऐसे दुनिया में सबके फिरें...
 
   
 

अरूण सिँह [oasisald2@yahoo.com] बलिया - 2011-10-11 14:36:58

 
  यह एक बार फिर इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जिन संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण हमने प्रजातंत्र को मजबूत करने और जनता के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए किया था वे न केवल बुरी तरह असफल सिद्ध हुई हैं, बल्कि जन सरोकारों से भी उनका नाता पूरी तरह टूट चुका है। 
   
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