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  पहला पन्ना >मनोज कुमार झा Print | Share This  

बंदिशें टूटी हैं मगर...

मुद्दा

 

बंदिशें टूटी हैं मगर...

मनोज कुमार झा


2002 की दूर्गापूजा की एक घटना बार-बार जेहन की दीवारों पर दस्तक देती है. उस साल अष्टमी के दिन हमारी बहन अपनी सहेली स्वाति के साथ पूजा देखने गई. अब तो अन्य दिनों में भी, गाँव में भी नजदीक के बाजार में तरह-तरह की चीजें तक मिल जाती है मगर वो संधिकाल था, जब चीजें आनी ही शुरू हुई थी और लोग लकदक चमकदार शै की तलाश में मेलों में चक्कर लगाते थे.

संस्कृति


पाँच चीजें घर के जरूरी समानों की होती थी तो साथ में एक सामान सजावट का या बच्चों के खेलने का भी होता था, जिसे देखकर घर की वृद्धा भी प्रसन्न हो जाती थी. अब तो गाँव के चौक पर भी हर दिन चमकीली चीजें मिल जाती हैं, जिसे देखकर कभी किसी का मन कभी खीझता है तो कभी रीझता है- ‘उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पर दम निकले’.

बहरहाल मेरी बहन और उसकी सहेली मेले का आनंद ले रही थी कि तभी उसकी नजर मुसहर टोली के महालक्ष्मी पर पड़ी. वो एकटक देखती ही रह गई. लगा जैसे कोई बड़ी घटना घट गई हो. बात बस इतनी थी कि महालक्ष्मी ने वहीं साड़ी पहनी हुई थी, जो स्वाति ने पहन रखी थी.

स्वाति का मूड खराब हो गया ओर वो मेले से तुरंत लौट आई और बहन बताती है कि उसने उस साड़ी को फिर कभी नहीं पहना. यह उपभोग के सामानों के बीच जातिगत और आर्थिक आधार पर तय मान ली गई भिन्नताओं का टूटना था, जो स्वाति को भौचक कर गया. इसी का एक सिरा वहाँ तक जाता है, जहाँ कोई चप्पल पहन कर दरवाजे पर नहीं आ सकता था ओर दूसरा सिरा वहाँ जाकर मिलता है, जहाँ कोई चंदेश्वर मिश्र किसी भी जाति के दरवाजे पर बँधे सुन्दर बैल को जबर्दस्ती खरीद लाता था.

लोकजीवन में इस तरह की धन-आधारित व जाति-आधारित उपभोग की बंदिशों का एक पूरा संसार दिखता है, जो उसके गीतों में, रूपकों, मिथकों, प्रतीकों, बिंबों, मुहावरों में, उसके दर्शनों, विचारों, विवचनों में इस तरह शामिल रहे है कि उन्हें अलग से पहचानना कई बार बहुत मुश्किल है.

नथुनी मल्लाह के बारे में पूरे गाँव में प्रचलित था कि उन्हें सुगंधित चावल खाने पर उल्टी हो जाती है और पता नहीं हम बच्चे भी कब उसे ‘महकौआ चावल, नथुनी भागल’ (सुगंधित चावल देखकर नथुनी भाग गया) कह-कह कर चिढ़ाने में शामिल हो गए.

उपभोग पर लगी बंदिशों को ढ़ीला होने की प्रक्रिया काफी जटिल है, इसके लिए प्रदीर्घ समाजशास्त्रीय विवेचन की आवश्यकता है. बहरहाल, इतना तो तय है कि पूंजीवादी एवं आधुनिकोत्तर संस्कृति ने ‘दाम दो, सामान लो’ की संस्कृति को जन्म दिया. यह जिसके पास ‘दाम’ नहीं है, उसके लिए पीड़ादायक तो है किन्तु जो पहले किसी भी सूरत में कुछ सामानों का उपयोग नहीं कर सकते थे, उनके लिए नया संसार खुला है. मगर जब एक बार यह संसार खुल गया है तो फिर उपभोग का पूँजी आधारित होना एक अलंघ्य एवं पीड़ादायी सीमा रेखा है, खासकर उस क्षेत्र में जहाँ एक बड़ी संख्या कल के खाने के लिए भी निश्चिंत नहीं रहती. जो समृद्ध हैं, वे अपने जीवन भर के खाने का डाइट चार्ट बना सकते हैं या नेट पर अलग-अलग होटलों के मेनू देखकर अगले साल के पहले दिन का खाना तय कर सकते हैं मगर जो विपन्न हैं, उन्हें हिस्से में तो यह भी तय नहीं है कि कल के कलेवा में क्या रहेगा या रहेगा भी या नहीं ?

उपभोग के भेद को टूटना उस जगह सबसे ज्यादा स्पष्ट है, जहाँ पैसा प्रतिबंधक तत्व बनकर सामने नहीं आता है और इससे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं मनोरंजन के क्षण, जहाँ एक ही तरह के गीतों पर विभिन्न आय, जाति वा धर्म के लोग नाचते नजर आते हैं. जिसे कुछ लोग जनसमूहात्मक संस्कृति या मास कल्चर का अंश कहते हैं.

एक जनवरी के उत्सव से लेकर पूजा तक अलग-अलग टोलों और अलग-अलग गाँवों में प्रायः एक ही तरह के गाने बजे नजर आते हैं. कमलू मिश्र कहते हैं कि अब गानों को बजते सुनकर यह निर्णय करना कठिन है कि किस टोले में विवाह हो रहा है. एक चिंता स्वाभाविक है कि इधर लोक की गढ़ंत जिस तरह से बदल रही है, कालांतर में वे समय की लपटों के बीच कपास की तरह काली राख छोड़कर विलीन न हो जाएं. लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि हमारी जो प्राचीन लोकसंस्कृति थी, उसके अच्छाइयों के रेशे भी जगह-जगह उघड़े हुये नजर आते हैं.

रामलीला में भाग लेने वाले कलाकार, संगीत से संबंध रखनेवाली यथा पमरिया, डफाली, चमार (ये सुअवसरों पर शहनाई बजाते थे) जाति के लोग हमेशा संगीत का भी दंश झेलते रहे और कभी भी बहुत सम्मानित नहीं माने गए. फिल्म ‘मिर्च-मसाला’ में एक दृश्य है, जहाँ नसीरूद्दीन शाह ग्रामोफोन दिखाकर स्मिता पाटिल को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं. यह विदित है कि सांस्कृतिक उपादान भी इसके धारकों को एक ताकत देती है, जिसका वे नाजायज इस्तेमाल भी कर सकते हैं.

वे दिन मुझे अच्छी तरह याद हैं, जब दूरदर्शन पर आनेवाले रामायण सीरियल या क्रिकेट मैच के लिए बाबू-बबुआनों के यहाँ भीड़ लगी रहती थी और बाबू-बबुआन बीच-बीच में टीवी वाले कमरे को बंद कर देते थे और लोग परदे के बजाय घर की चमकती हुई किवाड़ ताकते रह जाते थे.

अब तो पर्व-त्योहार पर या अन्य दिनों में पूरे गाँव के लोग चंदा करते हैं और कहीं बैठकर भर रात सीडी देखने का लुत्फ लेते हैं और कुछ बुजुर्गों के द्वारा अवज्ञाकारी माने जाने वाले इस काम में उन्हीं लोगों की ज्यादा हिस्सेदारी रहती है, जिन्हें पहले के दिनों में सेवा करने वाला माना जाता था, जो कि मैथिली कहावत के अनुसार ‘बाभनक छोट और राड़क मोट’ (ब्राह्मण के छोटे एवं शूद्रों के मोटे) के रूप में इंगित हैं.

समय बदल रहा है, चीजें बदल रही हैं. समय को चीजें और चीजों को समय तब्दील कर रहे हैं. अब स्त्रियाँ चप्पल पहनकर खाना बनाने लगी हैं और मर्द साथ देने लगे हैं. मगर मानव जाति ने अपनी लम्बी जीवन यात्रा में जिन परम्परागत मूल्यों को प्राप्त किया है, उनमें जो श्रेष्ठ हैं उन्हें भी हमें बचाना है.

निश्चय ही उपभोग पर आयद बंदिशों का टूटना और उपभोक्तावाद के भँवर में डूब जाना एक ही बात नहीं है (और बहुजन डूबेंगे भी नहीं क्योंकि यहाँ डूबने के लिए गर्दन से लटकी पैसों की थैली जरूरी है) और हमें यह भी ध्यान रखना होगा, जो अगली शाम की चुल्हे की धधक के लिए पत्ते चुन रही है, उसे क्या पता है कि टीवी पर अभी कौन सा विज्ञापन चल रहा है.

24.10.2011, 01.43 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mithilesh kumar ray [mithileshray82@gmail.com] saharsa - 2011-10-29 07:18:53

 
  आप सही कह रहे हैं मनोज जी. बंदिशें तो टूटी हैं लेकिन अब भी कुछ शेष हैं. 
   
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