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पाक के अलावा क्रिकेट के नापाक

बाईलाइन

 

पाक के अलावा क्रिकेट के नापाक

एम जे अकबर


निम्न मध्यवर्ग का होना क्या किसी अपराध को छोटा बना देता है? लंदन के साउथ वॉक क्राउन कोर्ट के न्यायाधीश जेरेमी कुक जब 19 वर्षीय पाकिस्तानी तेज गेंदबाज मोहम्मद आमिर को स्पॉट फ़िक्सिंग के मामले में सजा सुना रहे थे, तब उन्होंने काफ़ी उदारता दिखाई. उन्होंने आमिर को सजा का एलान करते वक्त उनकी पृष्ठभूमि का ख्याल रखा और उन्हें अपनी टीम के साथी खिलाड़ियों मोहम्मद आसिफ और सलमान बट से हल्की सजा सुनाई.

पाकिस्तानी क्रिकेटर


आमिर की मां नसीम अख्तर अपने परिवार के साथ चंगा बंग्याल गांव में रहती हैं. उन्होंने प्यार के कारण सच्चाई पर पर्दा डालने की कोई कोशिश नहीं की. वे न तो आक्रामक हुईं, न ही बचाव की मुद्रा में आयीं. उन्होंने अपने बेटे को निर्दोष बताने की जगह उसे यह कहते हुए माफ़ कर दिया, “हां उसने गलती की है, लेकिन अभी उसकी उम्र इतनी कम है कि उसे यह नहीं पता कि वह क्या कर रहा है?”

उन्होंने कहा कि बच्चे “गलतियां करते हैं. आमिर ने भले क्रिकेट में बड़ा नाम कमा लिया हो, लेकिन वह अभी बच्चा ही है.” उन पर हर मां गर्व कर सकती है.

हिंसा के तूफ़ान के बीच पली-बढ़ी वह पीढ़ी, जिसने सार्वजनिक जीवन के हर आइकॉन से धोखा मिलने की हताशा झेली है, क्रिकेटरों को चमकती रोशनी के तौर पर देखती थी. क्रिकेट टीम न सिर्फ़ व्यक्तिगत उपलब्धियों की प्रतीक थी, बल्कि उस उम्मीद की भी कि अगर पाकिस्तान को अपने रहनुमाओं के धोखों, फूट और लालच ने नहीं डसा होता, तो मुल्क ने कितनी तरक्की की होती?

पाकिस्तान में क्रिकेट के आभिजात्य तबके की गिरफ्त से निकल कर शहरों, गांवों और मोहल्लों तक में फ़ैल जाने से ऐसी खबर और खुशनुमा लगती थी. उन लोगों द्वारा विश्वासघात जिन्हें आप अपना मानते हों, सबसे ज्यादा दुखदायी होता है.

नसीम अख्तर के गांव के एक वेंडर ने एक अखबार के संवाददाता को बेहद सर्द आवाज में कहा कि वह खुश है कि स्कैंडल इंग्लैंड में सामने आया, क्योंकि पाकिस्तान में कभी भी न तो ढंग से मुकदमा चलता, न ही कसूरवारों को सजा मिलती.लोग इयान बॉथम जैसे खरी-खरी बात बोलने वालों की इस बात में यकीन करते हैं कि भ्रष्टाचार हर जगह है.

हमें मालूम है कि यह महामारी का रूप ले चुका है. जो बात बॉथम ने नहीं कही, वह यह कि यह महामारी काफ़ी समय से फ़ैली हुई है और क्रिकेट प्रशासकों ने लगातार न कुछ बताओ, न कुछ जानो की मुद्रा में इसे छिपाने की कोशिश की है. यह तभी सामने आया, जब इन्हें दबाना नामुमकिन-सा हो गया. भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में जहां क्रिकेट और राजनीति ग्लैमर इंडस्ट्री में बदल गये हैं और एक दूसरे का सहारा लेते रहते हैं, राजनीतिज्ञ वर्ग भी कसूरवारों को बचाने की जी जान से कोशिश करता है.

भारत के पूर्व कप्तान मो. अजहरुद्दीन पर बीसीसीआइ ने जीवन भर के लिए प्रतिबंध लगाया था. बात जब शुचिता की आती है तब बीसीसीआइ को शायद ही सबसे कट्टर संस्थान कहा जा सकता है. अजहर अब सांसद हैं और हो सकता है कि बीसीसीआइ के निर्णय के खिलाफ़ कानूनी अपील की कमजोर आड़ में एक दिन वे खेल मंत्री भी बना दिये जायें. सट्टेबाजों के साथ यात्रा करते हुए खिलाड़ियों की तसवीरें छपती हैं, लेकिन बीसीसीआइ इसे देख नहीं सकती. कहा जाता है कि एडमिरल नेल्शन एक आंख से अंधे थे. बीसीसीआइ दोनों आंखों से अंधी है.

ऑस्ट्रेलियाइयों ने तब क्या मिसाल पेश की थी, जब उन्होंने शेन वार्न और मार्क वॉ पर सूचनाएं एक सट्टेबाज को पहुंचाने के आरोप में 10000 डॉलर का जुर्माना लगाया था? उनकी कमाई की तुलना में यह जुर्माना कौड़ी के बराबर है. वार्न अब टीवी प्रसारण के हीरो हैं.

इंग्लैंड के कप्तान एंड्रयू स्ट्रॉस का कहना है कि क्रिकेट प्रशासक इच्छा शक्ति की कमी का प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन यह इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि हर कुछ के बिकाऊ होने का मामला है. इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तानी क्रिकेटर और इसके कर्ताधर्ता अपने आप में अलग ही श्रेणी के हैं.

कहानियां ऐसी भी हैं, जिनके मुताबिक पूरी टीम ने एक बार कराची में इंग्लैंड के खिलाफ़ टेस्ट में हार जाने का फ़ैसला किया था. इस टीम का एक गेंदबाज अब एक स्पोर्ट्स चैनल का चेहरा है. मो. आसिफ के पिता को जब बेटे की सजा के बारे में पता चला तो उन्होंने क्रिकेट को अपराधियों के खेल की संज्ञा से नवाजा. जाहिर है यह सच्चाई से काफ़ी दूर है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसमें इतना अपराध शामिल हो चुका है, जो लपटें पैदा कर रहा है.

अगर कारणों की खोज की जाये कि आखिर इमरान खान ने राजनीति की सीढ़ी पर इतनी ऊंची चढ़ाई कैसे की, तो बेशक एक कारण क्रिकेट होगा. भले ही खलनायकों की सूची लगातार बढ़ती जा रही हो, फिर भी क्रिकेट अभी भी वह मंच है जहां से आज भी नायकों का जन्म हो सकता है. अपने लंबे और चमकते क्रिकेट करियर के दौरान इमरान खान की बेदाग छवि उन सारी सही चीजों की प्रतीक है, जो सब कुछ के गलत होने के बीच भी हो सकती है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
11.09.2011, 00.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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