पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

क्यों जन-विरोधी है हमारा मीडिया?

मुद्दा

 

क्यों जन-विरोधी है हमारा मीडिया?

जस्टिस मार्कंडेय काटजू


भारत में मीडिया जो भूमिकाएँ निभा रहा है, उसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ऐतिहासिक संदर्भों को समझना होगा. वर्तमान भारत अपने इतिहास में एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है: एक सामंती खेतिहर समाज से आधुनिक औद्योगिक समाज की ओर का संक्रमण.

मीडिया


यह एक बहुत पीड़ादायक और व्यथित कर देने वाला दौर है. पुराने सामंती समाज की चूलें हिल रही हैं और कुछ तब्दीलियां हो रही हैं; लेकिन नया, आधुनिक, औद्योगिक समाज अभी तक संपूर्ण ढंग से स्थापित नहीं हुआ है. पुराने मूल्य की किरचें बिखर रही हैं, सारी चीज़ें उबाल पर हैं. शेक्सपियर के मैकबेथ को याद करें; “रौशन चीज़ें धूल धूसरित है और धूल धूसरित रौशन है”. जिन्हें पहले अच्छा माना जाता था, मिसाल के लिए जाति व्यवस्था, वह आज बुरी है (कम से कम समाज के जागरूक तबक़े में) और जिन्हें पहले बुरा माना जाता था, जैसे प्रेम के ज़रिए/लिए शादी, वे आज स्वीकार्य हैं (कम से कम आधुनिक मानस में).

सभी देशप्रेमियों का, मीडिया सहित, यह फ़र्ज़ है कि वे इस संक्रमण से कम से कम पीड़ा और तत्काल उबारने में हमारे समाज की मदद करें. इस संक्रमण काल में मीडिया को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होती है क्योंकि इसका ताल्लुक विचारों से होता है, सिर्फ़ वस्तुओं से नहीं. अतः अपने मूल स्वभाव में मीडिया किसी अन्य साधारण व्यवसाय की तरह नहीं हो सकता.

ऐतिहासिक तौर पर, प्रिंट मीडिया का उद्भव यूरोप में सामंती शोषण के ख़िलाफ़ जनता के एक सक्रिय हस्तक्षेप के बतौर हुआ. उस वक़्त सत्ता के सभी स्थापित उपकरण दमनकारी सामंती अधिकारियों के हाथों में थे. अतः लोगों को एक नए माध्यम की ज़रूरत थी, जो उनका प्रतिनिधित्व कर सके. इसीलिए प्रिंट मीडिया को “चौथे स्तंभ” की तरह जाना जाने लगा. यूरोप और अमरीका में यह भविष्य की आवाज़ का प्रतिनिधित्व करता था, जो स्थापित सामंती अंगों-अवशेषों, जो कि यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे; के विपरीत था. इसीलिए मीडिया ने सामंती यूरोप को, आधुनिक यूरोप में परिवर्तित करने में एक अहम भूमिका अदा की है.

मेरे ख़याल से भारत की मीडिया को एक वैसी ही प्रगतिशील भूमिका का निर्वहन करना चाहिए, जैसी कि यूरोप की मीडिया ने उसके संक्रमण काल में निभाया था. ऐसा वह पुरातन, सामंती विचारों और व्यवहारों-जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंध-मान्यताओं पर आक्रमण करते हुए और आधुनिक वैज्ञानिक और तार्किक विचारों को प्रोत्साहित करते हुए कर सकता है. लेकिन क्या हमारा मीडिया ऐसा कर रहा है?

मेरी राय में, भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, ख़ासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया; जनता के हितों को पूरा नहीं करता. वास्तव में, इनमें से कुछ यक़ीनन, सकारात्मक तौर पर, जन-विरोधी हैं. भारतीय मीडिया में तीन प्रमुख दोष हैं, जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूँ-

पहला, मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से अ-वास्तविक मुद्दों की भटकाता है.

वास्तविक मुद्दे भारत में सामाजिक-आर्थिक हैं, भयंकरतम ग़रीबी जिसमें हमारे 80 फ़ीसदी लोग जीते हैं, कठोरतम महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा ज़रूरतों की कमी और पुरातन-पंथी सामाजिक प्रथाएँ जैसे ‘ऑनर किलिंग’, जातीय उत्पीड़न, धार्मिक कट्टरताएँ आदि. अपने कवरेज़ का अधिकांश हिस्सा इन मुद्दों को देने के बजाय, मीडिया अ-वास्तविक मुद्दों को केंद्रित करता है- जैसे फ़िल्म हस्तियाँ और उनकी जीवन-शैली, फ़ैशन परेड, पॉप संगीत, डिस्को डांस, ग्रह-नक्षत्र शास्त्र, क्रिकेट, रियलिटी शो और अन्य कई मुद्दे.

इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि मीडिया लोगों को मनोरंजन मुहैया कराता है, लेकिन इसे अतिरेक में नहीं परोसा जाना चाहिए. इसके 90 फ़ीसदी कवरेज़ अगर मनोरंजन से संबंधित हैं और महज 10 फ़ीसदी ही ऊपर उल्लिखित वास्तविक मुद्दों के हैं तब तो कुछ ऐसा है, जो गंभीर रुप से गड़बड़ है. इसके अनुपात की समझदारी उन्मादी हो चली है. स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, कृषि और पर्यावरण सबको मिलाकर मनोरंजन को नौ गुना ज़्यादा कवरेज़ मिलता है. क्या एक भूखे या बेरोज़गार व्यक्ति को मनोरंजन चाहिए या भोजन और रोज़गार?

उदाहरण के लिए, हाल ही में मैंने टेलीविज़न शुरू किया, और मैंने क्या देखा? कि मैडम गागा भारत आई हैं; करीना कपूर मदाम तुसॉद्स में अपनी मोम की मूर्ति के पास खड़ी हैं; एक व्यापारिक घराने को एक पर्यटक सम्मान दिया जा रहा है; फ़ॉर्मूला वन रेसिंग आदि इत्यादि. इन सारी बातों का जनता की समस्याओं से क्या लेना देना है?
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दुर्वेश [vichar2000@gmail.com] bhopal - 2011-11-30 03:00:13

 
  जो कुछ भी उपर लिखा गया वो हर किसी बुद्धजीवी को मालुम है. हर पत्रकार और मीडिया हाउस को इसकी खबर है. अगर मालुम नही तो सिर्फ यह कि मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता या मीडिया क्या आज भी संभव है. इसलिये मेरी गुजारिश है कि अगर यह आज भी संभव है तो कोई इसे करके दिखाये.
वैसे भी खतरा फ़िल्म हस्तियाँ और उनकी जीवन-शैली, फ़ैशन परेड, पॉप संगीत, डिस्को डांस, ग्रह-नक्षत्र शास्त्र, क्रिकेट, रियलिटी शो जेसे गलत दिखते कार्यक्रमों से नहीं है क्योंकी लोग उसे मनोरंजन के नाम पर देखते हैं और दूसरे दिन भूल भी जाते हैं. असली खतरा तो paid news से है, आधा सच दिखाकर जनता को बहकाने से है, दोषियों को महिमामंडीत कर उसे स्टार बनाने से है.
मीडिया और पत्रकारिता आज एक धंधा है. जिसे हर हाल में और किसी भी कीमत पर TRP का ग्राफ बडा हुआ चाहिये, जिससे धंधा और चमक सके. रही सही कसर paid news पूरी कर रहा है. आपने देखा नहीं मीडिया ने अन्ना को कांग्रेस का विलेन और भाजपा का हीरो बना दिया. क्या ही अच्छा होता कि अगर मीडिया अन्ना ...कांग्रेस ..या भाजपा के चुनावी गणित से परे लोकपाल से जुड़े असली मुद्दों पर जनता के बीच एक खुली बहस करता...काश ऐसा हो पाता.
 
   
 

R D katre [rdkatre@gmail.com] raigarh - 2011-11-20 06:50:49

 
  Media is serving the interest of Indian ruling class.They work to pull society into medieval age and it is inhuman approach. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in