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ममता नामक गुब्बारे की हवा

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ममता नामक गुब्बारे की हवा

एम जे अकबर


भारत ग्रीक कथाओं के रचयिता एसोप ने अपने श्रोताओं से कहा था कि धमकी को अपना ब्रह्मास्त्र बनाना बेहद खतरनाक है. अगर आप हांफ़ते हुए यह वादा करें कि आप इस घर को ढहा देंगे, तब आपको यह सवाल अपने सामने रखना चाहिए कि कहीं यह आपका ही घर तो नहीं है?

ममता बनर्जी


ममता बनर्जी एक व्यग्र राजनेता हैं. वे जब किनारे पर धकेल दी जायें, तो सबसे खुश दिखायी देती हैं. उनका स्वभाव कुछ इस तरह है कि सुरक्षा के अहसास भर से वे नर्वस हो जाती हैं. वे राजनीति के मैदान को कसीनो की तरह देखती हैं, जहां हमेशा दाव खेले जाते हैं. शायद उनके अनुभवों ने उनके इस झुकाव को और मजबूती दी है.

बंगाल में वे अरसे से एक ही राग अलाप रही हैं. वे जब परास्त हुई, अपने दाव को बढ़ा दिया. इस उम्मीद में कि जब किस्मत का पहिया उनके नंबर पर रुकेगा, उन्हें अप्रत्याशित लाभ पहुंचायेगा.ऐसा ही हुआ भी. हर बड़े और मंझे हुए जुआरी के सामने एक बड़ा व मूल सवाल होता है, जीतने के बाद आप क्या करेंगे? खेल जारी रखेंगे या फ़िर हाथ में आयी दौलत को सहेज कर रखेंगे.

ममता मध्यमार्ग में यकीन नहीं रखतीं. वे ठीक इसके खिलाफ़ खेलती हैं. इस उम्मीद में कि अपनी शर्तो पर जिस किसी से कुछ हासिल हो सके, उसे निचोड़ लिया जाये. जब सब कुछ बेहतर चल रहा हो तब तो इसे समझदारी कह सकते हैं. लेकिन सार्वजनिक जीवन में अच्छी खबर क्षणिक होती है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि आपको अपने लिए कुछ ज्यादा ही समझदारी की दरकार होती है. ममता पर अब उस फ़िसलन भरे दायरे में दाखिल होने का खतरा है, जिसे जरूरत से ज्यादा बांह मरोड़ना कहा जा सकता है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने पेट्रोल की कीमतों के मुद्दे पर ममता की समर्थन वापसी की धमकी की न सिर्फ़ हवा निकाल दी, बल्कि सार्वजनिक तौर पर इसका एलान भी किया. उनका संदेश बिल्कुल साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता था- कांग्रेस के सभी सहयोगियों का स्वागत है. वे प्रधानमंत्री को मेल भेज सकते हैं. एक बेहतर जवाब की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री सौदेबाजी में वक्त जाया नहीं करेंगे. उन्होंने ममता की धमकी को अपने उन अनुभवी नेताओं के सहारे किनारे कर दिया, जो इस तरह शोर-शराबा करते बच्चों को देखने के आदी हो चुके हैं.

ममता नाम के इस गुब्बारे से निकलती आवाज कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग से लेकर रेड फ़ोर्ट के बीच फ़ैले मैदान तक सुनी जा सकती थी. सबसे ज्यादा बीचो-बीच बने प्रेस क्लब में. पत्रकार इस मुद्दे को कसौटी पर कसते हुए ममता बनर्जी की साख का नये सिरे से हिसाब-किताब लगाने में जुट गये. शायद राजनेता यह नहीं समझ पाते कि आम आदमी हमेशा ऐसी लुभावनी नीतियों के पीछे नहीं भागता,जिनमें तर्क की कमी होती है.

ममता मानती हैं कि वह जनता की भावनाओं को उकसा कर दिल्ली को परेशान कर सकती हैं. वे ऐसा पहले कर चुकी हैं. उन्होंने अपने चिड़चिड़े रवैये से बांग्लादेश के साथ तीस्ता पानी समझौते पर क्षेत्रीय कूटनीति में मनमोहन सिंह के लिए यादगार बनते क्षण को तार-तार कर दिया था.

मनमोहन ने शर्मिदगी और कुछ हद तक अपने सम्मान को लगी ठेस को पी लिया. लेकिन दूसरी बार अपने सम्मान को ठेस का मतलब था, पहले से ही कमजोर होती अपनी ताकत और अधिकार को और कम करना. फ़र्क साफ़ महसूस किया जा सकता था. कोलकाता से बंगाल टाइगर की तरह निकले ममता के सांसद प्रधानमंत्री के कमरे से बाहर आते हुए उनकी स्थिति मेमने की तरह थी. संदेश साफ़ है कि प्रधानमंत्री तीस्ता समझौते पर आगे कदम बढ़ायेंगे.

अगर ममता बनर्जी को यह पसंद नहीं आता, तो वे अपनी नाराजगी को अपने पास सहेज कर रख सकती हैं.बंगाल में ममता के पास भरपूर समर्थन है. साख का घड़ा तुरंत खाली नहीं होता. लेकिन बेहतर गवर्नेंस देने की उनकी क्षमता चाय की दुकानों पर चर्चा में शामिल होने लगी है. बंगाल के वोटर जानते हैं कि ममता के पास वादों को पूरा करने की कोई जादुई छड़ी नहीं है. लेकिन वे यह भी बखूबी जानते हैं कि कोलकाता के ट्रैफ़िक की समस्या से निबटने के लिए दिल्ली से मदद की जरूरत नहीं है. उनके मंत्री चाहे कोलकाता में हों या फ़िर दिल्ली में, फ़ैसलों में उनकी कोई भूमिका नहीं है. वे सब ममता के सनकीपन के आतंक में रहते हैं.

मूल चुनौती सालाना बजट है. वादों और संसाधनों के बीच गणित गड़बड़ाया है. एक उद्योगपति ने नये निवेश के लिए हवन का बंदोबस्त किया. लेकिन उद्योगपतियों को ईश्वरीय उम्मीद से ज्यादा जमीन की दरकार है. ममता के मंत्री साफ़ कर चुके हैं कि वे जमीन नहीं दे सकते. लेफ्ट के दौर में जिन पॉवर प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी गयी थी वे आगे नहीं बढ़े. जिस जमीन का वादा हुआ था वह उपलब्ध ही नहीं है. आप आकाश में फ़ैक्ट्री नहीं लगा सकते. कम से कम अभी तक तो नहीं.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
13.11.2011, 09.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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