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विचार | शबाना का आशियाना

विचार

 

शबाना का आशियाना

 

राम पुनियानी

फिल्म अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री शबाना आज़मी लंबे समय से गरीब लोगों के आवासीय अधिकारों के लिए लड़ती रही हैं. यह सचमुच बिडंबनापूर्ण है कि इस अत्यंत मेधावी अभिनेत्री और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता को एक बार नहीं, दो बार अपनी पसंद के इलाके में मकान नहीं खरीदने दिये गये.

अपने दर्द को शबाना ने एक टीवी कार्यक्रम में यह कहकर व्यक्त किया कि भारतीय प्रजातंत्र मुसलमानों के साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर रहा है. मुसलमान संदेह की निगाह से देखे जा रहे हैं. शबाना का यह कहना था कि अन्यों के अतिरिक्त, फिल्मी दुनिया के कई लोग उन पर मानों टूट पड़े. उनके वक्तव्य को झूठा, गैर-जिम्मेदाराना और साम्प्रदायिक कहा गया. यहाँ तक कि शत्रुघन सिन्हा जैसे जाने माने फिल्म अभिनेता ने भी शबाना को जमकर लताड़ा.

एक प्रमुख समाचार पत्र के पत्रकार ने शबाना को झूठा साबित करने के लिए अपने दफ्तर से कुछ प्रमुख बिल्डरों को फोन लगाया और इस नतीजे पर पहुँच गए कि मकानों को बेचने के मामले में मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा है. फिल्मी दुनिया से जुडे एक सज्जन ने तो शबाना आज़मी के घरों की गिनती कर डाली और यह कहा कि अगर मुसलमानों को वाकई घर नहीं मिलते तो उन्हें तो सड़को पर रहना चाहिए. एक संवेदनशील सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे पर इस तरह के कुतर्क की आशा उन्हीं से की जा सकती है जिनके मकान इतने ऊँचे हैं कि वे सामाजिक यथार्थ से पूरी तरह कट गए हैं.

कोई बिल्डर ऐसा बोर्ड तो लगाएगा नहीं कि उसकी कालोनी में मुसलमानो के लिए जगह नहीं है. यह तो दबे-छुपे ढंग से किया जाता है. इस तथ्य को अनेक स्टिंग आपरेशनों ने भी सामने लाया है.


दरअसल, प्रश्न यह नहीं है कि शबाना आज़मी कितने मकानों की मालिक हैं, सवाल यह है कि वे एक विशेष मकान को खरीदना चाहती थीं और उन्हें ब्रोकर ने कहा कि वे उस मकान को नहीं खरीद सकती क्योंकि वे मुसलमान हैं. मुसलमान सड़कों पर तो नहीं रह रहे हैं परंतु उनमें से अधिकांश झुग्गी बस्तियों में रहने के लिए मजबूर हैं.यह तथ्य सभी को पता है, सिवाय उनके जो भगवा चश्मे पहने हुए हैं. पारसियों और जैनियों की अपनी अलग कालोनियाँ हैं, जिनमें वे किसी और समुदाय के सदस्यों को मकान नहीं खरीदने देते परंतु इस प्रवृत्ति की तुलना मुसलमानों के साथ हो रहे भेदभाव से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि ये समुदाय बहुत छोटे हैं और उनके कुँए के मेंढ़क होने के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं. मुसलमानों को यह समस्या सन् 1990 के दशक के बाद से झेलनी पड रही है जब सांप्रदायिक राजनीति परवान चढ़ी और सांप्रदायिक दंगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई.

मुंबई में 92-93 में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद बड़ी संख्या में मुसलमानों ने मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों से पलायन कर दिया. या तो डर के चलते और या फिर अपनी सुरक्षा की खातिर, मुसलमान मुँबरा, जोगेश्वरी और भिन्डी बाजार जैसे इलाकों में रहने लगे. दंगों के पहले मुँबरा की आबादी एक लाख थी. अब वहाँ सात लाख लोग रहते हैं. मेरे अनेक मुसलमान मित्रों ने मिश्रित आबादी वाले इलाकों के अपने मकान बेचकर मुस्लिम-बहुल इलाकों में रहना शुरू कर दिया.

गुजरात में भी यही सब हुआ है. वहाँ भी, जिन्हें बाल ठाकरे, ''मिनी पाकिस्तान'' कहते हैं, बड़ी संख्या में बन गए हैं. जैसे-जैसे मुसलमानो के प्रति पूर्वाग्रह बढ़ते हैं, वैसे-वैसे दोनों समुदायों के बीच मानसिक दीवारें खिंच जाती हैं. इन मानसिक दीवारों को ईंट और सीमेंट की दीवारें बनने में देर नहीं लगती. यह सांप्रदायिक विभाजन दंगो का नतीजा होता है.

गुजरात में हिंसा के शिकार लोगों को उनके घरों में वापस नहीं आने दिया गया. उनसे यह लिखित आश्वासन माँगा गया कि वे उनके साथ हुई हिंसा के संबंध में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करेंगे. सांप्रदायिक हिंसा से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है. सन् 1990 के दशक के बाद से मुसलमानों को मकान नहीं बेचना एक अलिखित नियम सा बन गया है. क्या बिडंबना है कि जो स्त्री दुसरों के सिर पर छत के लिए लड़ती रही हो, उसे ही मकान न मिले और वह भी केवल इसलिये क्योंकि वो मुसलमान है.

दूसरी विडंबना यह है कि आर एस एस की राजनीति, जो ब्राम्ध्णवादी मूल्यों और मनुवादी व्यवस्था की पोषक है, ''समन्वित राष्ट्रवाद'' के नाम पर एक समुदाय के सदस्यों के एक साथ रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही है. पारंपरिक वर्ण व्यवस्था में दलितों और अछूतों के लिए कोई स्थान नहीं था और इसलिए उनके घर गांवों से बाहर हुआ करते थे. महाराष्ट्र में गांवों के बाहर दलितों के मुहल्ले को ''महारबाडा'' कहा जाता था. आज वही सब कुछ मुसलमानों के साथ हो रहा है. मध्यमवर्गीय मुसलमानों को भी अपने समुदाय के बीच रहने को मजबूर किया जा रहा है.

शबाना आज़मी की निंदा करने वाले शायद यह नहीं जानते कि बढ़ती हुई सांप्रदायिक हिंसा और सांप्रदायिक सोच ने किस नये सामाजिक यथार्थ को जन्म दिया है. दु:खद यह है कि यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है और आतंकवाद को इस्लाम और मुसलमानों से जोड़ा जाना इसी प्रवृत्ति का अंग है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं का मुसलमानों के प्रति भेदभाव से अक्सर साबका पड़ता रहता है. कोई बिल्डर ऐसा बोर्ड तो लगाएगा नहीं कि उसकी कालोनी में मुसलमानो के लिए जगह नहीं है. यह तो दबे-छुपे ढंग से किया जाता है. इस तथ्य को अनेक स्टिंग आपरेशनों ने भी सामने लाया है. शबाना आज़मी के अनुभव से यह साफ हो गया है कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि भारतीयता में पूरी तरह रची-बसी और मानवीय अधिकारों के लिए समर्पित किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मकान से वंचित किया जा सकता है क्योंकि उसका मुस्लिम नाम है.

सामान्यत: तो यह किसी भी मुहल्ले के निवासियों के लिये गर्व की बात होनी चाहिए कि उनके इलाके में इतनी जानी मानी व प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता रहती हैं. अगर शबाना को भी आशियाना नहीं मिलता तो हम बेशक इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि सांप्रदायिकता की दीवारें आसमान से भी ऊँची हो गई हैं.

 

16.09.2008, 17.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशि



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