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ऐसे कैसे पीएम बनेंगे राहुल ?

बाईलाइन

 

ऐसे कैसे पीएम बनेंगे राहुल ?

एम जे अकबर


मैं उत्तर प्रदेश की जटिल पहेलियों में लिपटे एक सवाल से हक्का-बक्का हूं. आखिर राहुल गांधी को ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी कि उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावी नतीजों को पार्टी से ज्यादा अपने सम्मान से जोड़ लिया. उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी साख क्यों दावं पर लगा दी? इतना ही नहीं उन्होंने, अपने दावं को कई गुना बढ़ा ही लिया. वह भी उस वक्त जबकि अवध की अनिश्चितताओं पर अपना भविष्य दावं पर लगाने की कोई वाजिब वजह नहीं थी.

राहुल गांधी


कांग्रेस पार्टी ने उनसे ऐसी कोई मांग भी नहीं की थी. वे जब चाहें, पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा देगी. इसके लिए उन्हें चुनावी मुहर की जरुरत नहीं होगी. यह उन्हें अपनी वंशगत पात्रता के चलते हासिल हो जाएगा. क्या बिहार में मिली हार ने उनकी दावेदारी पर कोई असर डाला? नहीं.

मान लीजिए कि उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह निराशाजनक नतीजों का सामना करना पड़े, तो क्या उनके अंधभक्त उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की रट को विराम दे देंगे? नहीं. कांग्रेस के मौजूदा गणित में योग्यता प्राथमिक पैमाना नहीं है, परिवार है. अगर प्रणब मुखर्जी में भी सही जीन होते तो वे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर होते.

मतदाता राहुल गांधी की प्रधानमंत्री की दावेदारी पर कोई फ़ैसला उत्तर प्रदेश में मिले वोट के आधार पर नहीं करेगा. वह इस पहलू पर गौर करेगा कि उन्होंने विरासत में मिली समस्याओं का प्रबंधन किस तरह से किया. 2012 में ऐसी समस्याओं की कोई कमी नहीं होगी. जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस के एकमात्र प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने शपथ लेने से पहले भी 1937 और 1946 में चुनावी संघर्ष का सामना किया था. पहली जीत एक मायने में अधूरी थी तो दूसरा एक कड़वा अनुभव.

लाल बहादुर शास्त्री के पास ऐसा कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं था, जब वे जून 1964 में प्रधानमंत्री बने थे. जनवरी 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं, तब उनके पास भी ऐसा कोई अनुभव नहीं था. अपनी पहली चुनावी परीक्षा में इंदिरा बुरी तरह नाकाम रहीं थीं. 1967 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस अमृतसर से कोलकाता के बीच के हर राज्य को गंवा बैठी थी.

1984 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब तो वह पूरी तरह से नौसिखुआ ही थे. दो महीने के बाद हुए चुनावों में मिली अभूतपूर्व जीत में उनके वादों के असर से ज्यादा उनकी मां की शहादत का हाथ था. पीवी नरसिंह राव को कभी कोई जीत नहीं मिली. न ही 1991 के चुनाव में, जो उन्होंने लड़ा ही नहीं, और न ही 1996 के चुनाव में जिसके परिणाम आश्चर्यचकित करने वाले थे. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का कारण यह नहीं था कि वे अपने वक्तृत्व कला से जनता को प्रभावित कर सकते थे.

यूपी में अगर कांग्रेस कुछ ज्यादा सीट जीत लेती है, तो इससे क्या सिद्ध हो जायेगा? आम चुनावों का पूरा गणित किसी राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों की तुलना में बिल्कुल अलग होता है. मायावती को 2007 में यूपी में अभूतपूर्व जीत मिली, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों में वे फिसल कर कांग्रेस के पीछे हो गयीं. कांग्रेस को 2007 में विधानसभा की जितनी सीट मिली, उससे ज्यादा लोकसभा सीट उसने 2009 के लोकसभा चुनाव में हासिल की थी. 1989 में यूपी को गंवाने के बाद यह उसके पकड़ में नहीं आ पायी है. साफ है, उसके लिए लखनऊ से ज्यादा नजदीक दिल्ली है.

राहुल गांधी ने चुनाव की तैयारी के लिए विशेषज्ञों की बड़ी फ़ौज खड़ी कर ली है, जो छोटी से छोटी बातों पर नजर रख रहे हैं. वह जनांकिकीय विशेषज्ञों पर खूब पैसे खर्च कर रहे हैं. एक मायने में आने वाले यूपी चुनाव कांग्रेस के लिए लखनऊ की गद्दी पर दावेदारी जताने का वाजिब मौका हो सकता था. लेकिन हैरत की बात है कि उनके सलाहकार, खासकर दिग्विजय सिंह यह प्रचार ज्यादा कर रहे हैं कि अगर कांग्रेस को इन चुनावों में 60 सीट से ज्यादा मिलती है, तो वे इसे ‘जीत’ मानेंगे.

यह डरावना होने की हद तक बचकानी बात है. यूपी चुनावों को दिये जा रहे जरूरत से महत्व के पीछे राहुल के कद को ऊपर उठाने की रणनीति छिपी हुई है, जिसकी बदौलत वे प्रधानमंत्री कार्यालय में आसानी से दाखिल हो सकते हैं. लेकिन राहुल गांधी को ऐसे किसी सहारे की जरूरत नहीं है.

मनमोहन सिंह यह बार-बार कह चुके हैं कि राहुल जिस दिन चाहें, प्रधानमंत्री बन सकते हैं. क्या कांग्रेस के सहयोगी यूपी चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा यह तय करने के लिए कर रहे हैं कि वे अपनी किस्मत को उनके हवाले कर सकते हैं कि नहीं? नहीं. करुणानिधि और शरद पवार फ़िलहाल इतने कमजोर हैं कि वे मध्यावधि चुनाव का खतरा मोल ही नहीं ले सकते. जो भी फैसला लिया जायेगा, वे उसमें हामी भर देंगे.

इस कवायद के पीछे कोई तार्किक कारण दिखाई नहीं देता. इसका कारण निजी हो सकता है. कहीं सफलता को लेकर इस तरह की उत्कंठा, राहुल गांधी के भीतर इस असुरक्षा भावना के कारण तो नहीं कि उन्हें खुद को और राजनीतिक वर्ग को यह साबित करना है कि वे राजनीति में अपनी पहचान बना चुके हैं और उन्हें अपने पिता के नाम की कोई जरूरत नहीं? निःसंदेह यह उनकी उम्र के लोगों के लिए यह सामान्य बात है, खासकर जब दिखाने के लिए उनके पास सफलता का रिकॉर्ड न हो. यह उनके सलाहकारों का काम है कि वे उनके लिए सबसे सुरक्षित रास्ता तैयार करें, न कि उन्हें बेवजह के खतरों में डालें.

चीजों के सही जाने से उन्हें वही मिलेगा, जिसे वे कभी भी हासिल कर सकते हैं, लेकिन अगर चीजें उनके हिसाब से नहीं गयीं तो उनकी स्थिति जली माचिस के गंदे सिरे जैसी हो सकती है.
 

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
20.11.2011, 09.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Anil Mishra [anil.mishr25@yahoo.co.in] Varanasi - 2011-11-28 15:02:06

 
  महंगाई, भ्रष्टाचार, निरंकुशता और विदेशी निवेश जैसे मुद्दोँ की वजह से कांग्रेस और उसकी सरकार आम आदमी के निशाने पर है।
ऐसे में राहुल का जनता के बीच जाकर 1955 वाली खोखली बयानबाजी करना और दूसरों पर छिछले आरोप लगाना साबित करता है कि वह राजनीति में अभी नौसिखिया हैं। कांग्रेसियों को राहुल की व्यक्तिगत योग्यता पर लाख भरोसा हो, जनता अब वैसी बेवकूफ नहीं है। प्रधानमंत्री एक गंभीर पद है, कोई गुड़िया-गुड्डा का खेल नहीं।
 
   
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