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भोजन पर कुछ-कुछ

मुद्दा

 

भोजन पर कुछ-कुछ

मनोज कुमार झा

भोजन


मुख्यधारा की मीडिया में खाना आमतौर पर टीवी के चमकीले पर्दे पर, चमकते रसोइघर के, चमकते बर्तन में, चमकता दिखता है या अखबार के रंगीन पृष्ठों पर किसी सजावटी शै की तरह, मगर इसके बाहर एक ऐसा संसार है जहाँ रोज भोजन के लिए संघर्ष है और रोज उसको प्राप्त करने का उल्लास है. ऐसी भी रहने की जगह है, जहाँ अलग से रसोइघर नहीं है मगर आँगन में सीझते चावलों की महक है और पूरे मन को महमह कर देने वाले अन्न के स्पर्श की प्रतीक्षा है.

यदि हमें समकालीन भारत को ईमानदारी से समझना है तो इधर भी नजर दौड़ानी पड़ेगी. वे खाने में क्या हासिल कर पाते हैं, कैसे हासिल करते हैं और उपभोग के लिए इसे कैसे तैयार करते हैं, यह सब उनके पूरे जीवन-संसार को प्रभावित करते हैं. ये निवास-स्थल एवं स्वास्थ्य से लेकर गरिमा यानी डिग्नीटी तक का निर्धारण करते हैं एवं उल्लास के क्षण से गहरी तकलीफ के वक्त तक को अभिव्यंजित करते हैं.

हम लोगों की अनुभूतियों की बनक में जो आय एवं जाति के जल-थल पैबस्त हो रहे थे, जिसमें कई भँवर, आड़ी तिड़छी मेड़ें और काँटेदार नागफनीतुल्य पौधे अपनी जगह बनाने जा रहे थे, उसमें खाने के सवाल से जुड़े तथ्यों की परतदार उपस्थिति थी.

महथौड़ चौक वो जगह थी, जहाँ खाने-पीने की चीजों को लेकर घात-प्रतिघात चल रहे थे, नये किस्म के गतिशील सामुदायिक रिश्ते देह धर रहे थे. सवर्ण घरों में अस्पृश्य खेत मजदूरों के लिए अजब ढ़ंग से आरक्षित कनटूटी प्यालियों की धमक चौक तक पहुँचने वाली थी, जहाँ तरह-तरह के ग्लास रखने-रखवाने की कोशिश अपने खोखले पैरों पर ग्राहकों के सिक्के की चोट से ज्यादा दिन तक टिक न सकी.

मगर सुबह साँझ में नाश्ते की छोटी-मोटी चीजों के सहारे बदल रही यह दुनिया पूरी तरह मर्दो के बीच की थी, जहाँ अस्पृश्यता के पुराने काँच दरक रहे थे. चौक के इतिहास में वहाँ के आस पास के गाँवों की इबारते दर्ज रहती हैं. मगर मजदूरी के रूप में नकद, परदेस से घर लाए पैसों आदि के द्वारा किसानी वाले इलाके में स्थित इस चौक पर जो तब्दिलियाँ दर्ज हो रही थीं, वे स्थानीय कारकों के द्वारा ही संचालित न थे, बाजार के बड़े-बड़े आकाओं की इस पर गिद्ध-दृष्टि थी. ऐसे ही गरीब लोगों को ध्यान में रखकर वाल स्ट्रीट जर्नल के 26 अक्टूबर 2009 के अंक में छपा है ‘‘पूरी दुनिया में चार अरब लोग गरीब हैं. उसे उपभोक्ता में बदलने के लिए पश्चिमी देश संघर्ष का रहे हैं.’’ यहाँ संघर्ष कहने में जो अतिरिक्त उत्साह है, उसकी छायाएं हमारे गाँव के मुसहर बस्तियों पर भी पड़ रही थी.

पुराने संबंधों की जकड़नें टूट रही थीं, मगर नई बनती दुनिया की आसानियाँ भी बड़ी धोखादेह थीं, जो इन गरीब लोगों को सम्मान के प्रश्न को लेकर चली लंबे जद्दोजहद के कारण उपभोग को लेकर अतिरिक्त रूप से बाध्य बना रही थी.

अब आहार से संबंधित पवित्रता-अपवित्रता के पुराने चौखटों में दरारे आ रही थीं और उसके गिर्द उपभोग के साथ, उपभोक्ता-चिन्हों से जुड़े प्रेस्टीज के स्टीकर्स अपनी चमक के जरिये चस्पा हो रहे थे. मगर इस चमक की अपनी चोटें थीं. 2 रूपये के सरसों तेल को दो रूपये का शैंपू धमकाने लगा था और कोई ऐसी पहल नही हो पा रही थी, जो इसके बीच दो रूपये के विटामिन और खनिज लवण की खुराक भी जोड़ दें. कितना भी कुछ हो, खाने को लेकर अब भी मुश्किलें थीं. ‘है’ और ‘था’ के बीच के संबंध बहुत तरल एवं चंचल किस्म के थे, जो एक ही साथ कई तरह की जीवन-स्थितियों को दृश्यमान बना रहे थे.

खाना सब की जरूरत है, यह जगत को मिथ्या कहने वाले शंकराचार्य से भी ‘‘उदर निमित्तं बहुकृत वेशम’’ कहला चुका है. इसकी उसको भी जरूरत है, जिसे प्लेट में तैयार मिलता है एवं जिसके खाने की जरूरतें पूरी होने की प्रक्रिया उनको इस आधुनिकोत्तर समाज में खाद्य-सामग्री की वास्तविक उत्पादन-स्थल से कई पड़ाव दूर कर चुका है. और उसको भी, जिसे सीधे जल-जंगल-जमीन से प्राप्त करना है.

मुसहर एक ऐसा ही समुदाय है, जिसके खाने की जरूरतों का अधिकांश हिस्सा सीधे जल-जंगल-जमीन से प्राप्त होता है. ये खेत में छूट गए अनाज को तो चुनते ही हैं, उन पदार्थो को भी चुनते हैं, जो दूसरे समुदायों की अभिरूचि की सीमा के बाहर छूट रहते हैं. ये चूहा और घोंघा से लेकर आम की गुठली के भीतर पाए जानेवाले गूदा तक को अपने भोजन में शामिल कर लेते हैं. ये ऐसा करते तो हैं अपने साधनहीनता के चलते, मगर जरूरी नहीं कि जो ये प्राप्त करते हैं, वे स्वाद एवं पोषण के आधार पर कमतर ही हों.

मुसहर निचली जमीन या ताल-तलैयों में पाए जानेवाले जंतुओं एवं पौधो की प्राप्ति का समय, स्थल एवं उचित वातावरण के बारे में अच्छी तरह जानते हैं. हालाँकि ये जगहें अब सिकुड़ गयी हैं और सरकारी योजनाओं से प्राप्त अनाजों ने इनकी मदद की है. सैकड़ों कंदमूलों में कौन विषैला है, इसकी पहचान इन्हें रहती है. ये और बात है कि कभी-कभी चूक हो जाती है और दुर्घटनाएँ भी हो जाती हैं.

कौन-सी चीज स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उत्तम है, इसकी भी इनकी अपनी अवधारणाएं हैं, जो कई बार समकालीन अवधारणाओं से मेल खाती हैं और कई बार नही. जैसे कि ये घोंघा और कछुआ को ठंडी तासीर का मानते हैं और केकड़ा को गरम. घोंघा अगहन में ये चुन आते हैं और आषाढ़ में भी, कुछ खुद खाते हैं, कुछ बेच भी लाते हैं और स्त्रियाँ कुछ उपहार में भी बाँट आती हैं. खासकर उन स्त्रियों को, जिन्हें ये मालकिन के बजाय दीदी कहती हैं.

कभी-कभी लगता है, बहुत कुछ बदल गया और कभी लगता है क्या बदला आखिर ! वो एक पुरानी शीशी अब भी अधिकांश घरों में है, जिसमें दो रूपये का सरसो तेल आता है, महीना में दस दिन से भी कम दाल की उपस्थिति है, (वो भी तीस रूपये प्रति किलो मिलने वाले खेसारी का) भोज में भी पापड़ पैसे वाले ही परोसते हैं. अढ़ैया भर खेबइया तब बेद पढ़बैया (ढ़ाई किलो खाना तब वेद पढ़ना), भूखले छी, त सूतले छी, सूत के उठव त एंठके चलब (भूखा हूं तो सोया हूं सो के उठुंगा तो एंठकर चलूंगा) है. छोटी छोटी छलांगें हैं, दुःख को काँख तले दबाये सुख है, प्राकृतिक चीजों को पाने का सिकुड़ रहा घेरा है, सरकारी योजनाओं की मदद है, बड़े शहरों तक जाने वाले ट्रेनों की जनरल बोगी है, बीड़ी का धुआँ है, गप्पें हैं, पाखंड हैं और चितकबरी मनुष्यताएं हैं.

22.11.2011, 00.08 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mithileshray [mithileshray82@gmail.com] saharsa - 2011-11-26 06:52:28

 
  इस बात से भारतीय भी इंकार नहीं कर सकते कि आज भी ऐसे लोगों की तादात बहुत कम नहीं हैं जो दैनिक भोजन की सामग्री को 2-2 रुपये की खरीद कर जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं. 
   
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