पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

इंदिरा गोस्वामी का जाना

स्मरण

 

इंदिरा गोस्वामी का जाना

रविशंकर रवि गुवाहाटी से


असम डा. भूपेन हजारिका के निधन के सदमें से उबरने की कोशिश कर ही रहा था कि 29 नवंबर की सुबह मामोनी रायसम गोस्वामी के निधन की खबर ने लोगों को अंदर तक हिला दिया. विदा हो रहा यह वर्ष असम के लोगों को रुला गया.

इंदिरा गोस्वामी


वैसे असम के बाहर मामोनी बाइडेव को लोग डा. इंदिरा गोस्वामी के रूप जानते हैं और उन्हें जिंदा बचे लोगों में ऊपर का साहित्कार माना जाता था. भूपेन दा और मामोनी बाइडेउ का व्यक्तित्व और उनका रचना संसार पूरे देश को प्रभावित करता था. वे भले ही असमिया थे, लेकिन वे दोनों देश के लिए अमूल्य संपति थे. फिलहाल तो कला जगत में ऐसा कोई असमिया चेहरा नहीं है, जिसे पूरे देश जानता हो. वे दोनों असम के राष्ट्रीय चेहरे थे. एक सुर का प्रतिनिधित्व करते थे, दूसरा शब्दों का.

मामोनी बाइडेव ने भले ही असमिया साहित्य को अपनी लेखनी से समृद्ध किया है, लेकिन उन्होंने उतना ही समृद्ध भारतीय भाषाओं को भी किया है. यह सच है कि वह असमिया में लिखती थीं, लेकिन उनके लेखन का दायरा राष्ट्रीय होता था.

उन्होंने वृंदावन में अभिशप्त विधवाओं पर उपन्यास लिखा तो वाराणसी के घाटों का भी चित्रण किया. अपने शोध के विषय के रूप में कांदली रामायण और तुलसी दास के रामचरित मानस का तुलनात्मक अध्ययन को चुना और रामायणी बन गई. रामायण पर व्याख्यान देने लगी. इसके लिए वे देश-विदेश का भ्रमण किया और कई सम्मान प्राप्त किया. यह उनके व्यक्तित्व का एक अलग और महत्वपूर्ण आयाम था.

उनकी रचनाओं का अधिकांश भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है. ज्ञानपीठ का पुरस्कार मिलने के बाद उनकी रचनाओं की ओर देश का ज्यादा ध्यान गया और उनकी अनुदूति रचनाओं का मूल्यांकन गंभीरता से होने लगा. इसलिए हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में उनकी रचनाओं को उतना ही चाव से पढ़ा जाता है. यही वजह है कि किसी भी भाषा का साहित्य प्रेमी उन्हें उनकी रचनाओं के माध्यम से जानता है.

मामोनी बाइडेउ ने यह मुकाम काफी संघर्ष के बाद हासिल किया है. बाल्यावस्था में पिता की मौत से आत्महत्या के बारे में सोच रही व्यथित मामोनी ने एक दक्षिण भारतीय अभियंता से शादी करके अपनी पीड़ा को भूलने की कोशिश की, लेकिन डेढ़ साल बाद ही एक सड़क दुघर्टना में पति को खोना पड़ा. वह टूट चुकी थीं और विधवा के रूप में बाकी की जिंदगी गुजारने के लिए वृंदावन पहुंच गईं. लेकिन वहां से एक नई, सृजनशील मामोनी राइसम गोस्वामी का जन्म हुआ.

उन्होंने विधवा का परंपरागत वस्त्र का त्याग कर एक सामान्य नारी के रूप में जीना आरंभ कर दिया. भोगे हुए और देखे हुए यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने जो कलम उठाई, वह बीमार होने के पहले तक चलती रही.

उनकी रचनाओं का आधार मानवीय संवेदना, सामाजिक विषंगतियां, नारी सशक्तिकरण और शांति की चाहत रही. लेखन के प्रति उनके इस नजरिये ने अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों का ध्यान खींचा. वह अमृता प्रीतम के करीब पहुंच गईं. वह अपने समय के अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के बीच अपनी पहचान बनाने में सफल रही. उनकी इस पहल से असमिया साहित्य को एक नया फलक मिला.

कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के बाद ज्ञानपीठ सम्मान ने उनके साहित्यकार को ऊंचाई तक स्थापित कर दिया. असमिया साहित्यकार के रूप में ज्ञानपीठ पाने वाली वह दूसरी असमिया साहित्यकार बन गई. इसके पहले यह पुरस्कार बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य को मिला था. लेकिन वह एक साहित्यकार को मिले भारत के श्रेष्ठ सम्मान मात्र पाने से संतुष्ठ नहीं थीं.

सन 2000 में ज्ञानपीठ ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाली डा. इंदिरा गोस्वामी असमिया साहित्य की प्रतिष्ठित महिला लेखिका में रूप में स्थापित हो गईं. सिनाकी मरम (1962), कईना (66), हृदय एक नदिर नाम(90), मामोनी रायसमर प्रिय गल्प(98) आदि उनके लोकप्रिय कहानी संग्रह हैं. उन्होंने कई उपन्यासों की रचना की, जिनमें सेनाबर स्त्रोत(1972), नीलकंठी ब्रज, अहिरण, मामेर धोरा तरोबाल, संस्कार, उदयभानुर चरित्र इत्यादि, छिनमस्ता मानुहटे आदि प्रमुख हैं. उन्होंने असमिया अनुवाद के क्षेत्र में भी काफी काम किया. जिनमें प्रेमचंद की लघु कहानियां, आधा घंटा समय, जातक कथा आदि शामिल है.

वह असम और असमिया समाज की बेहतरी के लिए प्रयासरत थीं. किसी की हत्या उन्हें बर्दाश्त नहीं थी. वह हत्या चाहे आदमी की हो या मूक पशु-पक्षियों की. बलिप्रथा के खिलाफ उन्होंने चर्चित उपन्यास "छिनमस्ता' की रचना की तो अल्फा समस्या की वजह से जारी रक्तपात को रोकने के लिए अल्फा के सेनाध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक से संपर्क किया. क्योंकि वह असम में शांति चाहती थीं.

मामोनी बाइडेव का व्यक्तित्व हर किसी के लिए प्रेरणा का विषय है. इतना सहने के बावजूद उन्होंने जिस मुकाम को हासिल किया, वह अनुकरणीय है. उनका व्यक्तित्व विविधाओं से भरा रहा. वह हमेशा कुछ नया गढ़ने के लिए प्रयासरत रहीं. उनकी योजना बोड़ो समुदाय, बागानों में काम करने वाले मजदूरों और उल्फा के संघर्ष पर उपन्यास थी. जो पूरी नहीं हो सकी. गत बारह फरवरी को उनकी तबियत बिगड़ गई. उसके बाद वह कोमा में चली गईं. उन्हें बचाने के लिए तमाम प्रसास किए गए. लेकिन वह कोमा से नहीं लौट पाईं और अंत: उनतीस नवंबर की सुबह उनका जिंदगी का फुल स्टाफ हो गया. सफलता की ऊंची उड़ाने के बावजूद उनकी सरलता हर किसी को लिए सीखने की चीज है. वह बिना किसी औपचाकिता के अनजान व्यक्ति से भी फोन पर बात करती थीं, मिलती थीं. उनका यह चरित्र ही उन्हें महान बनाता है. उनकी कमी हमेशा खलेगी. अलविदा, बाइडेउ!
*असमिया में बड़ी बहन को बाइडेउ कहते हैं.

29.11.2011, 23.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

श्‍याम बिहारी श्‍यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] सी. 27 / 156, जगतगंज, वाराणसी ( उप्र ) - 2011-12-08 01:01:23

 
  इन्दिरा गोस्‍वामी के बारे में यह टिप्‍प्‍णी छोटी होने के बावजूद सूचनाओं से भरी हुई है। यह जानकर अच्‍छा लगा क‍ि वृंदावन की विधवाओं पर उपन्‍यास लिखते हुए उन्‍होंने वाराणसी के घाटों पर भी कलम चलाई है। यहां उपलब्‍ध विवरण से स्‍पष्‍ट है क‍ि जिन्‍दगी के विडम्‍बनापूर्ण संयोगों ने वृंदावन और विधवा जीवन के अभिशप्‍त जीवन-संदर्भ से स्‍वयं इन्दिरा जी को भी दारुण रूप में अवगत कराया था... जिस तरह उन्‍होंने इस चुनौती-संदर्भ से रचनात्‍मक मोर्चा लिया और सृजन-जगत में सर्वोच्‍च शिखर तक पहुंचीं, यह पूरा प्रसंग भारतीय समाज और साहित्‍य-संसार की अनोखी मिसाल है। सर्वथा बेमिसाल... रविशंकर रवि जी ने भावपूर्ण लिखा है। उनका और \' रविवार \' का आभार...  
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in