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अप्रासंगिक देव आनंद

स्मरण

 

अप्रासंगिक देव आनंद

प्रीतीश नंदी


मैं कलकत्ते की संकरी गलियों में पलकर बड़ा हुआ. तब इस शहर की बात ही कुछ और हुआ करती थी. यह जादू और रोमांच से भरा-पूरा एक शहर था. स्कूल के दिनों में हमें कई चीजें रोमांचित और आकर्षित करती थीं. इन्हीं में शामिल थीं हिंदी फिल्में, जिन्हें मैं अपनी टिफिन मनी के दो आने बचाकर देखता था.

देवानंद


हमारे सबसे बड़े स्टार्स थे दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद. सभी के प्रशंसकों का एक वर्ग था. ये प्रशंसक अपने प्रिय सितारे की कोई फिल्म रिलीज होने से पहले ही एडवांस में टिकट खरीदने के लिए कतार लगाकर खड़े हो जाते थे. एडवांस बुकिंग के लिए अलग से काउंटर हुआ करता था और प्रशंसक अपनी वफादारी सिद्ध करने के लिए कभी-कभी तीन दिन तक लाइन में लगकर बुकिंग करवाने का प्रयास करते थे, ताकि अपने प्रिय सितारे की फिल्म ‘फर्स्ट डे फ शो’ देख सकें.

तब कोई कालाबाजारी नहीं होती थी, फिर भी यदि आप किसी व्यक्ति के लिए टिकट का भुगतान करने को राजी हो जाएं तो वह लाइन में लगकर आपके लिए टिकट खरीदने को तत्पर रहता था. और जब ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ का टिकट मिल जाता था, तो हम फिल्म देखने के बाद भी उस टिकट को सहेजकर रखते थे. वह हमारे प्रिय सितारे के प्रति हमारी निष्ठा का प्रमाण होता था.

सालों बाद जब मैं अपने पुराने ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ टिकट कूड़ेदान में फेंक रहा था, तो मैंने गौर किया कि उनमें से अधिकांश देव आनंद की फिल्मों के थे. देव आनंद कोई निष्णात अभिनेता न थे, लेकिन मौजूदा दौर के सलमान खान की ही तरह वे एक स्टाइल सेटर थे. उनकी अदा और उनका रवैया उनके जमाने के ट्रेंड्स तय करता था.

युवा एल्विस प्रेस्ले की तर्ज पर उन्होंने जो हेयर स्टाइल अपनाई थी, वह अपने दौर की सबसे लोकप्रिय हेयर स्टाइल थी. इसी तरह कॉलर खड़ी रखने का उनका अंदाज भी बहुत लोकप्रिय था. बाद में जयसिम्हा और अजहरुद्दीन जैसे क्रिकेटरों ने उनके इस मैनरिज्म को अपनाया था. लेकिन खुद देव आनंद जिस हीरो के हावभाव अपनाने का प्रयास करते थे, वे थे ग्रेगरी पेक. वे बिना किसी संकोच के उनकी स्टाइल की नकल करते
थे.

ग्रेगरी पेक की ही तरह वे भी अपनी बांहें फैलाते, कलाइयां गिरा देते और अपनी गर्दन को एक तरफ झुका देते. दिलीप कुमार महानतम अभिनेता थे और राज कपूर ग्रेट शोमैन, लेकिन देव आनंद Rहीरोञ्ज थे. वे हमारे ऐसे चहेते सितारे थे, जिनका हम अनुसरण करने का प्रयास करते थे और जिनके बारे में बातें करते हुए हम कभी न थकते थे.

देव आनंद की शख्सियत में एक जादू था और ‘गाइड’ बनाकर उन्होंने यह भी साबित कर दिया कि वे एक अच्छे अभिनेता और शोमैन भी थे. ‘गाइड’ एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म बनाने के भारत के प्रारंभिक प्रयासों में से एक थी. लेकिन ऐसे तमाम प्रयासों की तरह यह प्रयास भी विफल रहा. यह फिल्म आरके नारायण की कहानी पर आधारित थी. साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वालीं पर्ल एस. बक ने फिल्म के स्क्रीनप्ले पर काम किया था.

टैड दनीलेव्स्की ने फिल्म के अंग्रेजी संस्करण का निर्देशन किया और विजय आनंद ने हिंदी संस्करण का. एसडी बर्मन ने फिल्म के लिए अद्भुत संगीत रचा. ‘गाइड’ ने सभी पांच बड़े फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, लेकिन वह कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतनी बड़ी फिल्म नहीं बन पाई, जैसाकि देव आनंद ने सपना देखा था. इस नाकामी से उनका दिल टूट गया और इसके बाद वे फिर वैसी ही फिल्में बनाने लगे, जिसमें उन्हें महारत हासिल थी, जैसे कि ‘ज्वेल थीफ’ और ‘जॉनी मेरा नाम’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में.

वर्ष 1982 में जब मैं बंबई चला आया, तब तक देव आनंद अपनी प्रासंगिकता खोने लगे थे. राज कपूर फिल्में निर्देशित कर रहे थे, दिलीप कुमार चरित्र भूमिकाएं कर रहे थे, लेकिन देव आनंद ने उम्र के आगे हथियार डालने से इनकार कर दिया था. वे फिल्में बनाते रहे और उनमें नायक की भूमिकाएं भी करते रहे. उनके धुर प्रशंसक भी इससे असहज महसूस करने लगे थे, लेकिन देव आनंद के लिए यह समयातीत होने की एक चेष्टा थी. वे नश्वरता के विरुद्ध संघर्ष करने का यही तरीका जानते थे. हम उन्हें प्रेम करते थे, लेकिन हमें उनके लिए खेद भी होता था. दर्शकों की युवा पीढ़ी ने उन्हें नकार दिया. समय की गति क्रूर होती है.

यह बॉलीवुड का सबसे ‘जाहिर राज’ था कि देव आनंद की फिल्में देखने अब कोई नहीं जाता है. किसी को अब यह भी याद नहीं रह गया था कि अपने जमाने में इस अदाकार का क्या कद था. देव आनंद स्वयं के एक त्रासद व्यंग्यचित्र बनकर रह गए थे.

यह स्टारडम की त्रासदी है. हमें यह पता होना चाहिए कि हमें कब अलविदा कहना है. बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं. मैं देव आनंद और उनकी फिल्मों से प्रेम करता हूं. मुझे उनके गानों से लगाव है. देव आनंद पर फिल्माए अनेक गीत ऐसे हैं, जो आज हमारे सिनेमा के क्लासिक बन चुके हैं.

एसडी उनके पसंदीदा संगीत निर्देशक थे और देव आनंद के प्रशंसक आज भी उन्हें एसडी की मधुर धुनों के मार्फत याद करते हैं. देव आनंद के कई गीत आज भी दुख और क्षति के क्षणों में मुझे याद आते हैं. उनके अवसान पर हम अपने एक दोस्त और सिनेमा की एक किंवदंती ही नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर के लिए भी अफसोस करते हैं, जो अब गुजर गया.

वास्तव में देव आनंद अपनी मृत्यु से बहुत पहले अप्रासंगिक हो चुके थे, लेकिन तमाम साहसी व्यक्तियों की तरह उन्होंने डटकर मुकाबला किया. वे नश्वरता से संघर्ष करते रहे. मैंने अपने जीवन में जितने तन्हा व्यक्ति देखे हैं, वे उनमें से एक थे, लेकिन वे अमरत्व के आकांक्षी भी थे. हम उनका सम्मान करते थे, लेकिन उन्होंने कभी हमारे सम्मान की परवाह नहीं की. उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्डस की फिक्र न थी. उन्हें केवल हमारी सराहना चाहिए थी, जबकि हम बहुत पहले ही उनकी सराहना करना बंद कर चुके थे.

08.12.2011, 12.04 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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