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आलू के बहाने

मुद्दा

 

आलू के बहाने

देविंदर शर्मा


समय खुद को दोहरा रहा है. करीब 25 साल पहले पंजाब में आलू उगाने वाले किसान आलू की खड़ी फसल को उखाड़ने के लिए विवश हो गए थे, क्योंकि आलू की फसल तैयार होने के बाद उसे जमीन से निकालना बहुत महंगा हो गया था. अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए कुछ किसानों ने सैकड़ों बोरे आलू को सड़कों पर फैला दिया था. बाजार में आलू की भरमार थी, इसलिए आलू की कीमतें बहुत नीचे चली गई थीं, जिससे किसान अप्रत्याशित निराशा में चले गए थे.

आलू


आलू उगाने वाले किसानों की किस्मत पंजाब और हरियाणा के बासमती और कपास उगाने वाले किसानों से अलग नहीं है. पिछले वर्ष की कीमतों को देखते हुए इस साल भी बेहतर कीमतों की उम्मीद में किसानों ने खेतों में चावल उगाने की बजाए कपास और बासमती बोया. कपास वाले खेतों के क्षेत्रफल में 16 प्रतिशत और बासमती के खेतों के क्षेत्रफल में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई.

नतीजा यह हुआ कि दोनों ही चीजों की कीमतें जमीन पर आ गईं. किसान अभी अपनी उपज को अपने पास ही रोके हुए हैं, उन्हें बाजार में कपास और बासमती की कीमतों में वृद्धि का इंतजार है. यहीं मेरा केन्द्रीय सवाल खड़ा होता है. हमारे किसान आखिर कब तक बाजार के भरोसे रहेंगे?

ठीक इसी तरह की स्थिति दक्षिण में भी हुई है, पिछले साल की धान की उपज को भी जब खरीदार नहीं मिले, तो आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी और पश्चिमी गोदावरी जिले के किसान "क्रॉप हॉलीडे" पर चले गए, मतलब उन्होंने नई फसल नहीं बोई. बाजार की अनिश्चितता ने आंध्र प्रदेश में पिछले डेढ़ महीने में ही 90 किसानों को अपना जीवन समाप्त करने को विवश कर दिया. कपास का अत्यधिक उत्पादन और उससे बाजार में गिरी कीमतों का परिणाम यह हुआ है कि आत्महत्या के लिए बदनाम विदर्भ क्षेत्र के एक दर्जन से ज्यादा किसानों ने पिछले पखवाड़े भर में आत्महत्या कर ली है. यहां-वहां हम रिपोर्टे पढ़ रहे हैं कि टमाटर किसान, प्याज उगाने वाले और यहां तक सरसों उगाने वाले किसान भी अपनी फसल को सड़कों डंप कर रहे हैं.

पंजाब में आलू की हालत पर अगर लौटें, तो पिछले कुछ दिनों में समाचार पत्रों में रिपोर्टे हैं कि आलू की अधिकता की वजह से किसान अपनी फसल को सड़कों पर डालने को विवश हो रहे हैं. पिछले साल उत्पादित 2.5 लाख टन की अनबिकी फसल का बोझ और इस पखवाड़े बंपर उत्पादन के अनुमान की वजह से आलू का बाजार बहुत गिर चुका है. पिछले साल के 800 रूपए प्रति क्विंटल के मुकाबले इस साल मात्र 100-150 रूपए प्रति क्विंटल नसीब हो रहे हैं. कीमतों में इतनी ज्यादा गिरावट ने आलू उगाने वाले क्षेत्रों में उदासी फैला दी है.

लगता है, 25 साल बाद भी किसानों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. मुझे अभी तक याद है, तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने कोल्ड स्टोरेज के लिए 5 करोड़ रूपए आवंटित किए थे. पिछले वर्षो में निवेश बढ़ा है और कोल्ड स्टोरेज की संख्या 500 से ज्यादा हो चुकी है. अगर केवल कोल्ड स्टोरेज से समस्या का समाधान होना होता, तो किसान अब तक सुखी हो गए होते. हालात प्रतिकूल हैं, बाजार में तगड़ा घाटा पहुंचाने वाली कीमत की वजह से किसान कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालने के इच्छुक नहीं हैं. पंजाब में ही करीब 20 लाख क्विंटल आलू कोल्ड स्टोरेज में पड़ा है.

इस समस्या पर खूब संपादकीय लिखे गए हैं, जिनमें मुख्यत: तीन सुझाव रहते हैं. पहला, अतिरिक्त कोल्ड स्टोरेज निर्मित हों. दूसरा, चिप्स और फ्रेच फ्राइज जैसे आलू प्रसंस्करण में सार्वजनिक व निजी निवेश को बढ़ावा दिया जाए. तीसरा, वोदका निर्माण के प्लांट लगाए जाएं. ये सुझाव बहुत कारगर नहीं हैं. मैं दोष अकेले संपादकीय लेखकों को नहीं दूंगा, कृषि अर्थशिस्त्रयों ने भी इससे आगे बढ़कर नहीं देखा है.

हर बार ऎसा होता है, जब मुश्किल बढ़ जाती है, तो नाराज किसान मदद के लिए सरकार पर निर्भर हो जाते हैं. आलू उगाने वाले किसानों को पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने समय दिया, वे उनसे मिले और उन्होंने निवेदन किया कि कोल्ड स्टोरेज में पड़े 20 लाख टन आलू को बेचने में सरकार सहायता करे. दूसरी ओर, कपास के किसान उच्च खरीद मूल्य की मांग कर रहे हैं.

आश्चर्य की बात है किसी ने भी यह मांग नहीं की कि रिलायंस फ्रेस या भारती जैसी रिटेल कंपनियां उनके अतिरिक्त आलू को खरीदें. शायद किसान जानते हैं, बड़ी रिटेल कंपनियां केवल अच्छे दिन की ही साथी हैं. ऎसे में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या कोई ऎसा रास्ता है, जिससे किसानों को बाजार के बर्ताव या सनक से बचाया जा सके?

मेरे तीन सुझाव हैं, सबसे पहले, सबसे जरूरी है बाजार ज्ञान को सुदृढ़ करना. यह देश का एक उपज मानचित्र बनाने का समय है. यह देश की जरूरतों पर आधारित होना चाहिए कि किस उपज की देश को कितनी जरूरत है. इसके लिए कृषि विभाग, राज्य मार्केटिंग एजेंसियों और उत्पादक संघों को मिलकर काम करना चाहिए. अगर किसी एक फसल की ज्यादा उपज की जरूरत नहीं है, तो उसके उपज क्षेत्र को बढ़ने से रोकना चाहिए. किसानों को शिक्षित करने की जरूरत है कि वे एक दूसरे की नकल में एक ही फसल न बोएं. बहु-फसल उगाने को अवश्य बढ़ावा देना चाहिए, इससे किसान केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहेंगे और कृषि जोखिम कम होगा.

हर राज्य को एक राज्य किसान आय आयोग बनाना चाहिए. यह आयोग किसानों के लिए मासिक आय पैकेज सुनिश्चित करेगा. जो किसान ज्यादा उत्पादित करेगा, उसकी ज्यादा आय होगी. आय का इस बात से कोई लेना-देना नहीं होगा कि उस उपज को बाजार मिलता है या नहीं मिलता.

13.12.2011, 00.35 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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