हिन्दी जातीयता के सवाल
विचार
हिन्दी जातीयता के सवाल
हितेन्द्र पटेल
जातीयता का प्रश्न अगर उठता है तो यह राष्टीयता के प्रश्न से भी जुड़ता है. इन
दोनों के बीच क्या रिश्ता हो सकता है ?
रामविलास शर्मा ने जातीयता के प्रश्न पर 40 के दशक में तब विचार किया था, जब उन्हें
लगा था कि जन और राष्ट्रवाद की विचारधारा का सीधा संबंध नहीं बनता. विदेशी शासन का
विरोध करते हुए भारतीय जनता ने 1857 से लेकर 1947 तक जो संग्राम किया था, उस
संग्राम में 'इंटेलिजेंसिया' ने जिस विचारधारा का निर्माण किया था, वह एक प्रकार से
यूरोपीय राष्ट्रवाद का एक 'डेरिवेटिव डिस्कोर्स' यानी यूरोपीय धारणा पर आधारित
विमर्श था. इसके बनने के क्रम में एक सांस्कृतिक पहचान यानी जातीयता का विकास भी
हुआ था. ये जातीयताएँ क्षेत्र की भाषिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विकास पर जोर
देती थी, जिसके साथ शिक्षित, अर्द्ध-शिक्षित और अशिक्षित सभी जन का सम्पर्क बनता
था.
मसलन, बंगाल में स्वदेश प्रेम की पहली अनुभूति के साथ ही राष्ट्रीय भावना और
बंग-प्रेम एक साथ प्रकट हुए. बंकिमचन्द्र ने देश प्रेम का पहला पाठ का आधार बंग देश
की शस्य-श्यामला धरती को बनाया. जिस भाषा में यह स्वदेश-प्रेम प्रकट हुआ, वह देश की
भाषा थी.
सुदीप्त कविराज ने लिखा है कि राष्ट्रवाद का प्रस्फुटन भारत में बंग्ला, हिंदी,
तमिल, मराठी आदि भाषाओं में हुआ, न कि अंग्रेजी में. देश की जनता देश की भाषा में
ही जगी, इस बात को याद रखते ही इस पहचान- बंग जातीयता या फिर मराठी जातीयता, का बोध
उभर आता है. इस जातीयता की जो भी सीमाएँ हों, ये अंतत: राष्ट्रवाद को उभारने में
सहायक सिद्ध हुईं, यह महत्त्वपूर्ण है.
रामविलास जी का योगदान इस अर्थ में ऐतिहासिक महत्त्व का है कि उन्होंने हिंदी
प्रदेश के साहित्य और संग्राम में एक जातीयता को चिन्हित किया और इसके ऐतिहासिक
विश्लेषण के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपस्थित किया. उन्होंने 1857, भारतेंदु युगीन
साहित्य, द्विवेदी-प्रेमचंद-रामचन्द्र शुक्ल युग और फिर निराला तक इस जातीय
सांस्कृतिक पहचान को विकसित होते हुए दिखलाया.
यह आज हमें चकित करता है कि एक जीवन में इतने बडे काल-खंड के विपुल साहित्य का इतना
सम्यक विश्लेषण किया गया और इस प्रदेश के लोगों को एक जातीय बोध से परिचित कराया
गया. हिन्दी नवजागरण के ऐतिहासिक विवरण के माध्यम से रामविलास शर्मा ने यह दिखलाया
कि कैसे इस क्षेत्र के साहित्य में परंपरा और प्रगतिशीलता के बीच के जटिल संपर्क के
बीच से इतिहास बना.
रामविलास जी ने यह दिखलाया कि भक्ति का महत्त्व कम हुआ और तर्क और वैज्ञानिक चिंतन
का बढा. हिंदी साहित्य 1870 के दशक में जहाँ था, वहाँ से 1884 में गुणात्मक रूप से
भिन्न हो गया था. 1920 तक आते-आते यह नवजागरण अपने उत्कर्ष तक आ चुका था.
इस हिन्दी जातीयता को रामविलास जी ने इतिहास के जिस विश्लेषण के माध्यम से
प्रतिष्ठित किया, उसमें भक्तिकालीन भारतीय समाज और प्राचीन भारतीय समाज की जो समझ
थी, उसके बारे में एक-दो बातें स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है. प्राचीन काल के
भारतीय समाज की एक नकारात्मक समझ और मध्यकालीन भारतीय समाज की एक सकारात्मक
व्याख्या के आधार पर जो दृष्टि प्रगतिशील या उदार दृष्टि के व्याख्याकारों के यहाँ
देखने में आती हैं (मसलन क्षितिमोहन सेन् से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी तक और राहुल
सांकृत्यायन से लेकर रामशरण शर्मा तक) उनसे रामविलास जी भिन्न हैं.
रामविलास शर्मा प्राचीन युग के भीतर भी प्रगतिशीलता के लक्षण देखते हैं और
वेद-उपनिषद से लेकर आर्य समाज तक में उस प्रगतिशील धारा को लक्षित करते हैं, जिसका
निर्माण और वहन का भार जनता करती है. एक तरह से रामविलास जी के यहाँ प्रगतिशीलता और
परंपरा-प्रेम का फ्यूजन है- जो उनकी शक्ति भी है और उनकी कमजोरी भी है. इस अर्थ में
वे उन आधुनिक विद्वानों से भिन्न हैं, जो यह मानते हैं कि प्रगतिशीलता एक आधुनिक
विचार है, जिसके लिए प्राक आधुनिक संदर्भों को लेकर चलना अंतत्: नकारात्मक हो जाता
है.
प्राय: ऐसे आधुनिक चिंतक बौद्ध, इस्लाम, फ्रांस की राज्यक्रांति आदि को महत्त्व
देते हैं. उन्नीसवीं सदी का भारतीय इतिहास राममोहन राय, सैयद अहमद खान, कांग्रेस
आदि का विश्लेषण करके समझते हैं और चेष्टापूर्वक 1857, दयानंद, अरविंद, विवेकानंद
और तिलक आदि की विचारधारात्मक पड़ताल का जोखिम नहीं उठाते. यहाँ रामविलास जी का
फ्यूजन उन्हें एक विशिष्ट चिंतक बनाता है. उनके लिए राममोहन राय भी महत्त्वपूर्ण
हैं और 1857 भी. वे दयानंद को भी महत्त्व देते हैं और विवेकानंद के महत्त्व की भी
अनदेखी नहीं करते. निराला के साहित्य के आंतरिक विश्लेषण के अपने अनुभव से रामविलास
जी ने यह देख लिया था कि विवेकानंद साहित्य और निराला के साहित्य के अंत:सूत्रों का
क्या महत्त्व है.
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रामविलास जी की असुविधाएँ बहुत सारी थीं. वे एक ऐसे हिन्दी समाज के चिंतक थे, जिनके
इतिहासकार, दार्शनिक और साहित्यिक जातीय बोध से रहित थे. ऐसे में उन्हें खुद कभी
भाषा वैज्ञानिक, कभी इतिहासकार और कभी दार्शनिक बनना पड़ता था. यह कितनी अद्भुत बात
है कि वे कवि रूप में इतने संभावनाशील थे कि अज्ञेय के प्रथम तार-सप्तक के कवि भी
थे ! साथ ही, हिन्दी के रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे बडे और प्रभावी आलोचक भी !
रामविलास जी के हिन्दी जातीयता संबंधी विचार को बहुधा स्टालिन के भाषा केन्द्रिक
जातीय चिंतन के साथ जोड़ कर देखा जाता है. हो सकता है कि शुरू में यह प्रभाव हो
लेकिन यह कहना ज्यादा सही होगा कि 40 के दशक के उत्तरार्द्ध में जब रामविलास जी ने
हिन्दी जातीयता की अवधारणा को एक सुचिंतित आकार दिया, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ इसके
लिए दायी थीं.
भारतेन्दु, प्रेमचन्द, निराला आदि का अध्ययन करने के बाद, कम्युनिस्ट पार्टी और
प्रगतिशील लेखक संघ के अपने अनुभवों और 1946 के नाविक विद्रोह आदि जैसे अनुभवों के
उस दौर में वे कई अन्य संवेदनशील वामपंथी लेखक-चिंतकों की तरह महसूस करते होंगे कि
मार्क्सवाद का एक देशी स्वरूप विकसित किए बिना जनसमर्थन नहीं मिल सकता.
जन को क्रांति के स्वप्न से जोड़ने की इस आकांक्षा के कारण ही राहुल ‘भागो नहीं,
दुनिया को बदलो’ लिखते हैं, स्वामी सहजानंद ‘महारूद्र का महातांडव’ लिखते हैं और
बलराज साहनी जैसे लोग नुक्कड़ नाटकों में नेहरू का मज़ाक उडाते हैं. रामविलास जी
हिन्दी प्रदेश के इतिहास और भाषा के लिए आंग्ल-भाषा प्रेमी और शहरी मानस के वामपंथी
बुद्धिजीवियों के प्रति शंकालु बने रहे. यही कारण है कि वे सज्जाद ज़हीर और मुल्कराज
आनंद से लेकर यशपाल तक के प्रति अनुदार बने रहे.
अभागे हिन्दी प्रदेश की जातीय चेतना का इतिहास लिखने का और हिन्दी के साहित्यकारों
के प्रगतिशील विश्लेषण की इस चाह को उन्होंने जिस ऐतिहासिक स्वीप ऑव इमेजिनेशन के
सहारे अपनी असंख्य पुस्तकों में व्यक्त किया है, उसमें जितनी भी सीमाएँ हों, यह कहा
जाना चाहिए कि उन्होंने विद्वानों को और अपने पाठकों को उस ओर जाने के लिए प्रेरित
किया, जिसे परंपरा के गदलखाते में डाल रखा था.
अगर हिन्दी प्रदेश के ऐतिहासिक महत्त्व को समझना हो तो प्राचीन साहित्य, प्राचीन
शहर और प्राचीन युगीन विद्वानों को महत्त्व दिया जाना चाहिए. उन्नीसवीं शताब्दी की
शुरूआत तक यूरोप में भी शॉपेनॉर जैसे विद्वानों ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों के
महत्त्व को समझा था. वहाँ से लेकर मैक्समूलर आदि के समय तक वेद-उपनिषद आदि के बारे
में बहुत कुछ लिखा गया था.
वेद को हिन्दू समाज की 'प्राचीन किताब' बनाकर दयानंद ने वेद के बारे में जो धारणा
तैयार की थी, उससे इतर रामविलास जी ने वेद को किसान जीवन के महाकाव्य के रूप में
देखा, प्राचीन भारत की दार्शनिक परंपराओं के बीच अनेकता में एकता के सूत्र को
पकड़ा. प्राचीन समाज में ज्ञान-विज्ञान के विकास और दूसरे समाजों के साथ संपर्क का
एक बडा समृद्ध विवरण दिया. कुछ तो बहुत ही चौंकाने वाले हैं.
इतिहासकार के रूप में रामविलास शर्मा की उपलब्धियों की चर्चा यहाँ संभव नहीं लेकिन
यह कहना जरूरी है कि उनके लेखन में इतिहास को देखने की चेष्टा की विशेषता यह है कि
वे यूरोकेन्द्रिक इतिहास दृष्टि से अलग हो जाते हैं स्वत: ही एशिया और अफ्रीका की
उन्नत सभ्यताएँ और उनके आपसी संपर्कों को इस विवरण में आ जाते हैं. मार्टिन बर्नाल
नामक विद्वान ने ब्लैक एथेना नामक पुस्तक लिख कर यह दिखलाने का प्रयास किया है कि
यूरोप केन्द्रित विश्व इतिहास का पूरा खाका कैसे आधुनिक युग में तैयार हुआ.
दरअसल, यूनान को ही सभ्यता और ज्ञान के पुंज के रूप में देखने की यूरोपीय दृष्टि के
कारण पाँचवी सदी ईसा पूर्व के पहले का इतिहास छुप-सा जाता है. क्रीट होते हुए मिश्र
और मध्य एशिया के साथ यूनान के संपर्कों का हवाला देकर बर्नाल ने सबको चकित कर दिया
था.
रामविलास शर्मा की दृष्टि में भी यह आता है और वे यूरोप के प्रभाव विस्तार के पूर्व
के इतिहास को जिस सकारात्मक दृष्टि के कारण देखते हैं, उससे भारत का पाठक समृद्ध
होता है. जिसे कई विद्वान रामविलास जी का हठाग्रह कहते हैं. उसके कारण ही रामविलास
जी पूँजी के प्रसार के मार्क्सवादी तर्क को सामने रखकर मध्यकाल के शुरूआती दौर में
पूँजी के सम्पर्कों , सिक्कों के चलन आदि की जो बातें कहते हैं. उसे पढ़ते हुए लगता
है कि संजय सुब्रह्मण्यम जैसे विद्वान जिन विद्वतापूर्ण हस्तक्षेपों के माध्यम से
भारतीय इतिहास लेखन की धारा को परिवर्त्तित कर रहे हैं, उस तरह के हस्तक्षेप
रामविलास जी के यहाँ भी है. सौदागरी पूँजीवाद की धारणा के आधार पर जिस तरह से
रामविलास जी ने औद्योगिक पूँजीवाद के पूर्व जाति के उदय के सम्बन्ध में जो लिखा है,
वह इतना चर्चित है कि उसकी यहाँ अलग से चर्चा करना जरूरी नहीं लगता.
25.12.2011, 01.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित