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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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हिन्दी जातीयता के सवाल

विचार

 

हिन्दी जातीयता के सवाल

हितेन्द्र पटेल


जातीयता का प्रश्न अगर उठता है तो यह राष्टीयता के प्रश्न से भी जुड़ता है. इन दोनों के बीच क्या रिश्ता हो सकता है ?

रामविलास शर्मा

रामविलास शर्मा ने जातीयता के प्रश्न पर 40 के दशक में तब विचार किया था, जब उन्हें लगा था कि जन और राष्ट्रवाद की विचारधारा का सीधा संबंध नहीं बनता. विदेशी शासन का विरोध करते हुए भारतीय जनता ने 1857 से लेकर 1947 तक जो संग्राम किया था, उस संग्राम में 'इंटेलिजेंसिया' ने जिस विचारधारा का निर्माण किया था, वह एक प्रकार से यूरोपीय राष्ट्रवाद का एक 'डेरिवेटिव डिस्कोर्स' यानी यूरोपीय धारणा पर आधारित विमर्श था. इसके बनने के क्रम में एक सांस्कृतिक पहचान यानी जातीयता का विकास भी हुआ था. ये जातीयताएँ क्षेत्र की भाषिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विकास पर जोर देती थी, जिसके साथ शिक्षित, अर्द्ध-शिक्षित और अशिक्षित सभी जन का सम्पर्क बनता था.

मसलन, बंगाल में स्वदेश प्रेम की पहली अनुभूति के साथ ही राष्ट्रीय भावना और बंग-प्रेम एक साथ प्रकट हुए. बंकिमचन्द्र ने देश प्रेम का पहला पाठ का आधार बंग देश की शस्य-श्यामला धरती को बनाया. जिस भाषा में यह स्वदेश-प्रेम प्रकट हुआ, वह देश की भाषा थी.

सुदीप्त कविराज ने लिखा है कि राष्ट्रवाद का प्रस्फुटन भारत में बंग्ला, हिंदी, तमिल, मराठी आदि भाषाओं में हुआ, न कि अंग्रेजी में. देश की जनता देश की भाषा में ही जगी, इस बात को याद रखते ही इस पहचान- बंग जातीयता या फिर मराठी जातीयता, का बोध उभर आता है. इस जातीयता की जो भी सीमाएँ हों, ये अंतत: राष्ट्रवाद को उभारने में सहायक सिद्ध हुईं, यह महत्त्वपूर्ण है.

रामविलास जी का योगदान इस अर्थ में ऐतिहासिक महत्त्व का है कि उन्होंने हिंदी प्रदेश के साहित्य और संग्राम में एक जातीयता को चिन्हित किया और इसके ऐतिहासिक विश्लेषण के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपस्थित किया. उन्होंने 1857, भारतेंदु युगीन साहित्य, द्विवेदी-प्रेमचंद-रामचन्द्र शुक्ल युग और फिर निराला तक इस जातीय सांस्कृतिक पहचान को विकसित होते हुए दिखलाया.

यह आज हमें चकित करता है कि एक जीवन में इतने बडे काल-खंड के विपुल साहित्य का इतना सम्यक विश्लेषण किया गया और इस प्रदेश के लोगों को एक जातीय बोध से परिचित कराया गया. हिन्दी नवजागरण के ऐतिहासिक विवरण के माध्यम से रामविलास शर्मा ने यह दिखलाया कि कैसे इस क्षेत्र के साहित्य में परंपरा और प्रगतिशीलता के बीच के जटिल संपर्क के बीच से इतिहास बना.

रामविलास जी ने यह दिखलाया कि भक्ति का महत्त्व कम हुआ और तर्क और वैज्ञानिक चिंतन का बढा. हिंदी साहित्य 1870 के दशक में जहाँ था, वहाँ से 1884 में गुणात्मक रूप से भिन्न हो गया था. 1920 तक आते-आते यह नवजागरण अपने उत्कर्ष तक आ चुका था.

इस हिन्दी जातीयता को रामविलास जी ने इतिहास के जिस विश्लेषण के माध्यम से प्रतिष्ठित किया, उसमें भक्तिकालीन भारतीय समाज और प्राचीन भारतीय समाज की जो समझ थी, उसके बारे में एक-दो बातें स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है. प्राचीन काल के भारतीय समाज की एक नकारात्मक समझ और मध्यकालीन भारतीय समाज की एक सकारात्मक व्याख्या के आधार पर जो दृष्टि प्रगतिशील या उदार दृष्टि के व्याख्याकारों के यहाँ देखने में आती हैं (मसलन क्षितिमोहन सेन् से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी तक और राहुल सांकृत्यायन से लेकर रामशरण शर्मा तक) उनसे रामविलास जी भिन्न हैं.

रामविलास शर्मा प्राचीन युग के भीतर भी प्रगतिशीलता के लक्षण देखते हैं और वेद-उपनिषद से लेकर आर्य समाज तक में उस प्रगतिशील धारा को लक्षित करते हैं, जिसका निर्माण और वहन का भार जनता करती है. एक तरह से रामविलास जी के यहाँ प्रगतिशीलता और परंपरा-प्रेम का फ्यूजन है- जो उनकी शक्ति भी है और उनकी कमजोरी भी है. इस अर्थ में वे उन आधुनिक विद्वानों से भिन्न हैं, जो यह मानते हैं कि प्रगतिशीलता एक आधुनिक विचार है, जिसके लिए प्राक आधुनिक संदर्भों को लेकर चलना अंतत्: नकारात्मक हो जाता है.

प्राय: ऐसे आधुनिक चिंतक बौद्ध, इस्लाम, फ्रांस की राज्यक्रांति आदि को महत्त्व देते हैं. उन्नीसवीं सदी का भारतीय इतिहास राममोहन राय, सैयद अहमद खान, कांग्रेस आदि का विश्लेषण करके समझते हैं और चेष्टापूर्वक 1857, दयानंद, अरविंद, विवेकानंद और तिलक आदि की विचारधारात्मक पड़ताल का जोखिम नहीं उठाते. यहाँ रामविलास जी का फ्यूजन उन्हें एक विशिष्ट चिंतक बनाता है. उनके लिए राममोहन राय भी महत्त्वपूर्ण हैं और 1857 भी. वे दयानंद को भी महत्त्व देते हैं और विवेकानंद के महत्त्व की भी अनदेखी नहीं करते. निराला के साहित्य के आंतरिक विश्लेषण के अपने अनुभव से रामविलास जी ने यह देख लिया था कि विवेकानंद साहित्य और निराला के साहित्य के अंत:सूत्रों का क्या महत्त्व है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Girish Pandey [girishpandey090@gmail.com] Bhagalpur - 2011-12-25 03:04:39

 
  Thought provoking. इस आलेख में जातीयता के प्रश्न को सही perspective दिया गया है. आभार. 
   
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