एक ना की जरुरत
बात पते की
एक ना की जरुरत
प्रीतीश नंदी
मेरी सबसे बड़ी नाकामी यह है कि मैं ‘ना’ नहीं कह पाता. इस साल मैं अपनी इस खामी को
सुधारना चाहता हूं. मैंने तय किया है कि जब भी मेरी इनकार करने की इच्छा होगी तो
मैं बगैर किसी लागलपेट के सीधे ‘ना’ कह दूंगा. कोई कदाचित या किंचित नहीं; सीधा
दो-टूक ‘ना’.
हालांकि मेरे जैसे इंसान के लिए यह करना आसान नहीं है. हमें बचपन से ही यह सिखाया
गया कि ‘ना’ कहना अभद्रता और गुस्ताखी की निशानी है और व्यावहारिक रूप से भी उचित
नहीं है. इनकार करने के और भी कई बेहतर तरीके हैं. आप शालीनतापूर्वक इससे बच सकते
हैं. या फिर वैसा कुछ कर सकते हैं, जैसा मेरे मशहूर पेंटर मित्र हुसैन हमेशा किया
करते थे. वह हर चीज के लिए हामी भर देते और फिर गायब हो जाते.
आपको इसका सबूत चाहिए? एक बार लंदन में कुछ लोग एक समारोह के उद्घाटन के लिए उनका
इंतजार करते रहे और वह एक पार्टी के लिए न्यूयॉर्क रवाना हो गए. हुसैन साहब ने कभी
ऐसे किसी वादे की परवाह नहीं की, जो उन पर बोझ बन जाए.
वह खुशी-खुशी इनसे बच निकलते. वह जानते थे कि उन्हें अपनी इन गलतियों के लिए माफ कर
दिया जाएगा. वह इसके लिए अपनी कमजोर याददाश्त को दोष देते. लेकिन याददाश्त का इससे
कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि यह तो उनके बेफिक्र अंदाज की वजह से होता.
मेरा दोस्त मारियो भी ऐसा ही था. जब मैं संपादक था, उस दौरान उसने मेरे लिए सैकड़ों
कार्टून बनाए होंगे, लेकिन समय पर एक भी नहीं बनाया. आप मारियो को कोई भी डेडलाइन
दें, लेकिन वह इसे मिस कर देता. हालांकि उसने अपना हर असाइनमेंट पूरा किया, लेकिन
अपने समय के हिसाब से.
मुझे याद है कि वह एक बार मेरे पास इतनी देर बाद एक कार्टून लेकर आया कि तब तक मैं
भूल ही चुका था कि मैंने उसे किसलिए बनवाया था. वैसे उसकी एक खूबी थी. वह कभी किसी
बात के लिए ‘ना’ नहीं कहता. उसने हमेशा विनम्रतापूर्वक मेरे द्वारा तय की गई किसी
भी डेडलाइन के लिए अपनी स्वीकृति जताई क्योंकि वह जानता था कि उसे ऐसा करना तो है
नहीं.
एक बार हमने तय किया कि हम मिलकर एक किताब तैयार करेंगे, जिसमें भारतीय राजनीति पर
आधारित शरारती तुकबंदियां संकलित होंगी. उसके इसके लिए कुछ ड्रॉइंग्स तैयार करनी
थीं. मैंने इस काम के लिए उसका तीन साल तक इंतजार किया. लेकिन जब तक उसकी ड्राइंग्स
तैयार हुई, तब तक मेरी मूल पांडुलिपि खो गई. उन दिनों हमारे पास कंप्यूटर नहीं हुआ
करते थे और टाइप स्क्रिप्ट का खो जाना मामूली बात थी.
मैंने सात साल की उम्र में पहली सिगरेट पी, क्योंकि मैं इसके लिए ‘ना’ नहीं कह
पाया. नौ साल की उम्र में मैंने पहली बार व्हिस्की को हलक के नीचे उतारा, क्योंकि
इसके लिए भी मैं ‘ना’ नहीं कह पाया. सौभाग्य से मैं जल्द ही इन चीजों से उकता गया,
इसलिए सोलह वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते यह सिलसिला खत्म हो गया.
उस समय तक मैं अपनी शर्तो पर जिंदगी जीने के लिए तैयार हो चुका था. उसके बाद से
छोटी-मोटी लतों ने कभी मुझे विचलित नहीं किया. मैं विवाल्दी को सुनता हूं, डिलन
टामस का साहित्य पढ़ता हूं, यह जानने की कोशिश करता हूं कि आखिर डेमियन हस्र्ट इतने
ज्यादा ओवर रेटेड आर्टिस्ट क्यों हैं.
मैं कई बार ऐसे लोगों के लिए भी कमिटमेंट्स कर देता हूं, जिन्हें बमुश्किल ही जानता
हूं. यदि मैं इस तरह के लाखों बेतुके, असंबद्ध कमिटमेंट्स के लिए ‘ना’ कह पाऊं तो
सारा दिन मल्लिकाजरुन मंसूर को सुन सकता हूं और उनके बेमिसाल गायन पर मुग्ध हो सकता
हूं.
मेरे पिता का इसलिए निधन हो गया क्योंकि वह जबलपुर में एक डॉक्टर (जो पारिवारिक
मित्र भी था) को ‘ना’ नहीं कह पाए, जिसने उन्हें इस बात का यकीन दिलाया था कि
प्रोस्टेट सर्जरी इस दुनिया में सबसे आसान है और वह इसे अपने नर्सिग होम में अंजाम
दे सकता है. जब यह बात मेरे कानों तक पहुंची तो मैं तुरंत वहां पहुंचा, लेकिन तब तक
मेरे पिता कोमा में जा चुके थे, जिससे वह फिर कभी बाहर नहीं आए. कोलकाता में मेरी
मां को हमारा पारिवारिक आशियाना इसलिए खोना पड़ा क्योंकि वह मकान मालिक से ‘ना’
नहीं कह पाईं, जिसने उनसे अपनी दशकों की किराएदारी छोड़ने की गुजारिश की थी. मकान
मालिक का कहना था कि उसका परिवार बढ़ गया है, जिसके लिए उसे ज्यादा जगह चाहिए. इससे
पहले कि मां अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर मेरे पास यहां आ पातीं, मकान मालिक ने वह घर
बेच दिया. हां, जिंदगी हम सबको बुद्धू बनाती है. खासकर उन्हें जो ‘हां’ कहने वाले
होते हैं.
मैं हाल ही में एक पत्रिका की कवर स्टोरी पढ़ रहा था, जिसमें कहा गया था कि आप सबसे
अहम बात जो अपने डॉक्टर से कह सकते हैं, वह है ‘ना’. ज्यादातर लोग इसलिए पीड़ित
रहते हैं क्योंकि वे ‘हां’ कहते हैं और फिर ऐसी दवाओं के जाल में उलझ जाते हैं,
जिसकी उन्हें जरूरत नहीं होती है, उनके गैर-जरूरी टेस्ट करवाए जाते हैं और ऐसी
सर्जरियां की जाती हैं जिनके बगैर भी वे रह सकते हैं.
डिनर टेबल के अलावा किसी रेस्तरां में भी आपके लिए ‘ना’ कहना ही ठीक होगा. आप वहां
पर मौजूद लजीज व्यंजनों के लिए जितनी आसानी से ‘ना’ कह पाएंगे, आपकी सेहत उतनी ही
अच्छी होगी. जिस दिन हम मतदान के समय तमाम प्रत्याशियों को ‘ना’ कह सकेंगे, उसी दिन
हमारे राजनेताओं की गुणवत्ता सुधर जाएगी.
जिंदगी में जगह-जगह फंदे हैं. यहां हर कोई आपके ‘हां’ कहने का इंतजार कर रहा है.
जैसे ही आप यह करते हैं, वैसे ही आप आक्रामक मार्केटिंग के जरिए लुभावनी पैकेजिंग
में अपने समक्ष पेश की गई पूरी तरह बेतुकी चीजों के जाल में उलझ जाते हैं, जो आपकी
जिंदगी के लिहाज से बिलकुल अप्रासंगिक होती हैं. अक्लमंद लोग ‘ना’ कहते हैं, लेकिन
भोलेभाले इसमें उलझ जाते हैं. 2012 मेरे लिए ‘ना’ कहने का साल है.
एक स्पष्ट, आसान ‘ना’. ठीक उसी तरह, जैसे स्पीलबर्ग की बेमिसाल फिल्म ‘म्यूनिख’ के
आखिरी दृश्य में एरिक बाना अपने हैंडलर से कहते हैं. यदि आतंकियों से जूझते हुए
अपनी जान जोखिम में डालने वाला देशभक्त खुद अपने देश से यह कह सकता है, तो आप और हम
क्यों नहीं.
05.01.2012, 10.36 (GMT+05:30) पर प्रकाशित