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पश्चिमी देशों की दादागीरी

विचार

 

पश्चिमी देशों की दादागीरी

देविंदर शर्मा

 

 

विज्ञान, अर्थव्यवस्था और राजनीति का मजबूत सहसंबंध है. चाहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर चलने वाली सतत बहस हो या फिर ग्लोबल वार्मिग पर बढ़ती गरमी, यह राजनीति ही है, जो अंतिम कार्यसूची निर्धारित करती है. इसलिए जब नोबल पुरस्कार प्राप्त आरके पचौरी ने सप्ताह में एक दिन मांस सेवन से परहेज रखने की गुजारिश की तो यह बर्र के छत्ते को छेड़ना या फिर अनाजघर को हिला देने सरीखा रहा. अमेरिका और यूरोप के गौमांस उत्पादकों ने तुरंत ही तीखा हमला बोल दिया. आश्चर्य नहीं होगा यदि आने वाले दिनों में यह बहस धुंधली पड़ जाए.

कहा नहीं जा सकता कि डा. पचौरी ने इसका पूर्वानुमान लगाया था या नहीं. किंतु सच्चाई यह है कि जब भी कोई पश्चिमी जीवनपद्धति को चुनौती देने का साहस दिखाता है तो बदले में एक तीव्र और तीखी कार्रवाई होती है. कोई आश्चर्य नहीं कि जलवायु परिवर्तन पर पूरी बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि ग्लोबल वार्मिंग विकासशील देशों में भयावह विनाश का कारण बनेगी. भयावह बाढ़, जबरदस्त सूखा और जोरदार तूफानों में वृद्धि होगी और इनका सबसे अधिक कहर विकासशील देशों को झेलना पड़ेगा. इस बारे में चर्चा नहीं होती कि अमीर और औद्योगिक देशों पर इसका क्या असर होगा? इस प्रकार इसमें निहित संदेश साफ है. विकासशील देशों को ही पर्यावरण का बचाना और सुरक्षित रखना चाहिए. चूंकि इसकी मार सबसे अधिक गरीबों पर ही पड़ेगी इसलिए उन्हें इसे बचाने की दिशा में काम करना चाहिए.

यह बात इसलिए विस्मित करने वाली है कि विकासशील देश बाढ़, बारिश और सूखे के प्रकोप से भला कब बचे हैं. अचानक संसार गरीबों के प्रति इतना बेरहम क्यों हो गया है? संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के अनुमान का हवाला देते हुए डा. पचौरी कहते हैं कि मानव द्वारा उत्सर्जित कुल ग्रीनहाउस गैसों का 18 प्रतिशत हिस्सा मांस उत्पादन उद्योग की देन है. 2050 तक यह बढ़कर दोगुना हो जाएगा.

धान की पैदावार को भी पर्यावरण में मीथेन गैस बढ़ाने का जिम्मेदार बताया जाता है. विश्व की 97 फीसदी धान की पैदावार एशिया में होने के कारण यह आरोप चस्पा किया जाता है कि एशियाई किसान ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोतरी कर रहे हैं और जमीन का पानी सोखकर उसे सूखा रहे हैं.

 

यूके राष्ट्रीय गौमांस संघ इस विश्लेषण से सहमत नहीं है. उसका कहना है कि 18 फीसदी की अभी तक पुष्टि नहीं हुई है. यह आकलन पशुओं के चारे के लिए अमेजन जंगल की कटाई के आधार पर किया गया है. वह भी 2004 के उस वर्ष के मुताबिक जब 26 हजार वर्ग किलोमीटर जंगल का सफाया कर दिया गया था. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 18 प्रतिशत हो, 15 प्रतिशत या इससे भी कम, तथ्य यह है कि अधिक मीट हासिल करने के लिए अमेरिका में 70 प्रतिशत अनाज गायों और सुअरों को खिला दिया जाता है.

इसमें संदेह नहीं कि अमेरिकी और अन्य तीस धनी देशों के मांस उद्योग को फायदा पहुंचाने के लिए आर्थिक सहयोग और विकास संघ का गठन किया गया. पशुओं की तीव्र वृद्धि के लिए गायों और सुअरों को चरने के स्थान पर नियमित तौर पर अनाज खिलाया जाता है. यह धारणा है कि पशुओं को चरने के लिए छोड़ने से उनकी ऊर्जा का स्तर कम हो जाता है. इसलिए पशुओं के घूमने-फिरने के क्षेत्र को सीमित करके मांस कारखाने उनकी ऊर्जा को बचाते हैं.

 

औसतन एक अमेरिकी प्रतिवर्ष करीब 125 किलोग्राम मांस का सेवन करता है, जिसमें 46 किलोग्राम मुर्गियों का मांस होता है. भारतीय अब भी काफी पिछड़े हुए हैं जबकि चीन अमेरिकी जीवनपद्धति अपनाने के करीब तेजी से पहुंच रहा है. एक चीनी प्रतिवर्ष औसतन 70 किलोग्राम मांस का सेवन करता है, जिसमें मुर्गियों का मांस केवल 8.7 प्रतिशत ही है. भारतीय मात्र 3.5 किलोग्राम मांस ही खाते हैं, इसमें भी मुर्गियों के मांस की मात्रा 2.1 किलोग्राम है. इस प्रकार मुर्गियों का मांस छोड़ दें तो चीनी सबसे अधिक मांस खाने वाले हैं.

मांस के लिए पाले जाने वाले पशुओं द्वारा छोड़ी गई मीथेन गैस जलवायु परिवर्तन एजेंट के तौर पर कार्बन डाई आक्साइड से 23 गुना अधिक असरकारी है. इसे मांस उत्पादन के लिए दुनियाभर में मौजूद पाले जाने वाले 55 अरब पशुओं को इससे गुणा करने पर अंदाजा लग जाएगा कि पर्यावरण में अतिरिक्त गरमी बढ़ने का क्या कारण है.

कल्पना करें कि अगर चीन और अमेरिका अपनी मांस उपभोग में मात्र दस प्रतिशत की कमी कर दें तो विश्व का पर्यावरण काफी हद तक स्वच्छ और ठंडा हो सकता है. ग्लोबल वार्मिंग पर बहस का एक और पहलू है. धान की पैदावार को भी पर्यावरण में मीथेन गैस बढ़ाने का जिम्मेदार बताया जाता है. विश्व की 97 फीसदी धान की पैदावार एशिया में होने के कारण यह आरोप चस्पा किया जाता है कि एशियाई किसान ग्लोबल वार्मिंग में बढ़ोतरी कर रहे हैं और जमीन का पानी सोखकर उसे सूखा रहे हैं. चूंकि एक किलो चावल उगाने के लिए पांच हजार लीटर पानी की जरूरत पड़ती है इसलिए भूजलस्तर में गिरावट के लिए एशियाई किसानों को दोषी ठहराया जा रहा है. हाल में सुझाव दिए जाते रहे हैं कि भूजलस्तर ऊंचा रखने और धरती को गरम होने से बचाने के लिए चावल की पैदावार में कमी लाई जाए.

कृषि उपज करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ी है और यह विश्व का प्रमुख खाद्यान्न भी है. दूसरी तरफ, मांस उत्पादन के लिए पशुपालन निश्चित तौर पर ऐसा उपक्रम नहीं है जिसे छोड़ा न जा सके. कुल मिलाकर, मांस मूल आहार नहीं है. यह खाद्यान्न में से प्रोटीन हासिल करने का भी अक्षम कवायद है. किसी भी सूरत में एक किलो गौमांस के उत्पादन के लिए 16 किलोग्राम खाद्यान्न खप जाता है.

इससे भी अधिक विनाशकारी है मांस उत्पादन के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत. एक किलोग्राम गौमांस के उत्पादन के लिए 70 हजार लीटर पानी की खपत होती है. एशिया के छोटे किसानों पर धरती को सुखा डालने का दोषारोपण लगाया जाता है, जबकि मांस उत्पादक कारखानों के पानी गटकने पर किसी को ऐतराज नहीं है. यह सही समय है कि विश्व के नैतिक संरक्षक खुद अपने अंदर झांकें और देखें कि संसार को रहने लायक शीतल और स्वच्छ स्थान बनाने की दिशा में क्या परिवर्तन किए जाने चाहिए?

19.09.2008, 00.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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