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हेलीकॉप्टर जैसी कार

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हेलीकॉप्टर जैसी कार

एम जे अकबर

ऑटो एक्सपो


प्रवक्ता दार्शनिक किसी के कहे शब्दों के पीछे के मकसद या धोखाधड़ी की भावना को समझने के लिए विखंडन का इस्तेमाल एक अकादमिक अस्त्र के तौर पर करते हैं. भारत में विखंडन राजमार्गो की महामारी है. हम विश्व बैंक या जापानी आर्थिक मदद से सुंदर सड़कों का निर्माण करते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे उसे तोड़ डालते हैं. उसमें एक-एक कर नये गड्ढे जोड़ कर. इसमें भारतीयों की दक्षता साफ झलकती है.

किसी चीज को नष्ट करने में भारतीयों को विदेशी सहायता की कोई जरूरत नहीं पड़ती है. यह भारतीयों की मूल क्षमता का हिस्सा है. हमारी सड़कें अपनी विचारधारा में समाजवादी हैं. वे किसी भी कार को बिना भेद किये खूब सजा देती हैं. उनका मकसद सभी कारों को सर्वहारा के स्तर पर ला देना होता है, ताकि कारों के बीच किसी किस्म की असमानता न रह जाये. सड़कों पर कहीं भी स्पीड ब्रेकर बना दिये जाते हैं, जिन्हें बनाने के लिए हो सकता है कि किसी की इजाजत भी न ली गयी हो.

ये अकसर इतने ऊंचे होते हैं कि कार की चेचिस को खरोंच डालें. अगर कार का ढांचा इस हमले को सह पाने के हिसाब से मजबूत हो, तो यह तुरंत रोड़ों से भरे गड्ढे में घुस जाता है. आखिर मौत के ऐसे कुओं का निर्माण कौन करता है? क्या कोई रहस्यमय साजिशकर्ता है जो अंधेरी रात में सामान्य तौर से अच्छी सड़क को खोद डालता है? किसे पता? किसी को इसकी फ़िक्र भी क्या है? हम सभी को मालूम है कि उन्हें पहचाना जा सकता है, और वाकई ऐसे लोगों का अस्तित्व है.

भारत में महानगरों की चौहद्दी को पार करने के बाद कानून-व्यवस्था अपना काम करना बंद-सा कर देती है. ऐसे में राजमार्गो पर फैली अराजकता पर किसी का ध्यान जाये, इसका सवाल ही नहीं पैदा होता. महानगरों के बाहर वाले भारत में कोई ऐसा बल ही नहीं, जो किसी चीज को लागू कर सके. अगर पुलिस की उपस्थिति सांकेतिक किस्म की हो भी, तो हमारी व्यवस्था का आधारभूत सिद्धांत वहां काम करने लगता है- भ्रष्टाचार की ताकत कानून की शक्ति से कहीं ज्यादा बड़ी होती है.

अगर आप हरियाणा से गुजर रहे हों, तो अपनी आंखें मूंदे रहना ही सफ़र को पूरा करने के लिहाज से ज्यादा मुफ़ीद है. आपको राज्य महामार्ग के सहारे जगह-जगह पर सड़क की खस्ता हालत और उस पर फैले कीचड़ के रूप में नगरीय अवरोधों का सामना करना पड़ेगा. भारत में कई राज्य हैं, जो पिछड़े हुए हैं और वहां पर आधारभूत संरचना का विकास पूरी तरह से नहीं हुआ है.

हरियाणा एक विकसित राज्य है, लेकिन वहां की अवसंरचना नकारात्मक प्रभाव डालने वाली है. इसका विकास कुछ इस तरह किया गया है ताकि यह इंसान और मशीन को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचा सके. यह बहुत मुमकिन है कि आप किसी दुर्घटना में अपनी टांगें तुड़वा बैठें, लेकिन अगर आप कार के हिचकोलों से अपनी दांत तुड़वा बैठें तो इसे दुर्घटना नहीं कहा जा सकता.

आखिर तब ऐसा क्यों है कि भारतीयों में गाड़ियों को लेकर इस तरह की दीवानगी है, जबकि उन गाड़ियों को चलाने के लिए सड़कें ही नहीं हैं. अगर हरियाणा की सड़कें आपकी कमर तोड़ देती हैं तो, दिल्ली की सड़कें आपके भीतर बचे-खुचे धैर्य को भी समाप्त कर दे सकती हैं. अगर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान खरीदी गयी बसों से दिल्ली की सड़कें पूरी तरह से जाम नहीं हुई हों, तो जुलूसों ने यह कसर भी पूरी कर दी है. दुनिया भर में भारतीय एकमात्र ऐसे लोग होंगे, जो मौका मिलते ही सड़क का निजी संपत्ति के तौर पर इस्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं.

किसी भी देश में किसी शादी को यह हक नहीं दिया गया है कि उसमें शामिल होने वाले सड़क पर अपना अधिकार जमा लें. लंदनवासी क्रिसमस के दौरान दुकानों को पाट देते हैं और नये साल में चीनी बाजार को भर देते हैं, लेकिन भारतीय पर्वो की तरह सड़कों को जागीर समझ कर उसका चक्का नहीं जाम कर दिया जाता. इंग्लैंड का शाही परिवार इसे कभी अपना अधिकार समझता था. लेकिन अपने इस लोकतांत्रिक समय में हमारे यहां यह हर किसी का अधिकार बन गया है.

दिल्ली में लगे ऑटो मेले के लिए उमड़ी भीड़ का कारण क्या है? क्या हम सचमुच किसी कार के नये मॉडल को उसी शिद्दत से देखते हैं, जिस शिद्दत से घर खरीदते वक्त यह देखते हैं कि पानी आ रहा है या नहीं या घर के प्रवेश पर पानी तो नहीं जमा हो जाता है? क्या यह अनुभवों के ऊपर आशाओं की जीत है ? मेरे ख्याल से नहीं. हमारे कारण ख्वाहिशों से जुड़े हैं, न कि उसकी उपयोगिता से. मेले की नयी कार आपको एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने के लिए नहीं होती.

हरियाणा और दिल्ली के अनुभव से साफ़ है कि कोई कहीं नहीं जाना चाहता, कार में बैठा बंदा बस सामने वाले से ज्यादा तेज गाड़ी चलाना चाहता है. मैंने सुना है कि हरियाणा वाले ऐसी कार बनाना चाह रहे हैं, जो हेलीकॉप्टर की तरह उड़ सके. यह कार जरूर दिल्ली में हजारों की संख्या में बिकेगी. लेकिन इससे बीच आकाश में खूब दुर्घटनाएं भी होंगी, क्योंकि वहां भी चालक एक दूसरे को पीछे छोड़ने की अपनी ख्वाहिश से बाज नहीं आयेंगे.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
08.01.2012, 08.08 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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