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शिक्षा:जीवन या नौकरी के लिये
मुद्दा
शिक्षा:जीवन या नौकरी के लिये
राहुल राजेश
आज अगर स्कूल-कॉलेज-युनिवर्सिटी जाने वाले किसी भी छात्र से सवाल करें कि वह पढ़ाई
क्यों कर रहा है तो एकदम सहज उत्तर मिलेगा- नौकरी पाने के लिए! शायद ही कोई कहे कि
ज्ञान या दृष्टि पाने के लिए! वस्तुत: ऐसे उत्तर की अपेक्षा करना भी बेमानी है,
क्योंकि आज की शिक्षा, आज की आधुनिक शिक्षा ज्ञान नहीं, डिग्री देती है, नौकरी पाने
की योग्यता देती है, प्रतियोगिताओं में अव्वल आने के लिए, परीक्षाओं में उत्तीर्ण
होने के लिए सूचनाएँ देती है. आज की शिक्षा हमें आर्ट ऑफ अर्निंग सिखाती है, आर्ट
ऑफ लिविंग नहीं. आज की शिक्षा डिग्री पाने तक सीमित है, नौकरी पाने तक सीमित है. आज
की शिक्षा में सामाजिक नवजागरण की कोई अवधारणा नहीं है, बल्कि बड़ा से बड़ा उपभोक्ता,
बड़ा से बड़ा खरीदार बनाने की अवधारणा है इसमें. इसलिए आज की शिक्षा पैसा कमाने के
काबिल बन जाने तक सीमित है. आज की शिक्षा में आजीवन शिक्षा का कोई भी सूत्र, कोई भी
सिद्धांत समाहित नहीं है.
सामाजिक नवजागरण एक व्यापक और सामूहिक उपक्रम और उद्यम है. लेकिन आज की शिक्षा
व्यक्ति को सामाजिक इकाई के रूप में नहीं, वरन् एक उत्पादक इकाई में ढालती है. यह
व्यक्ति की चेतना और पहचान को हम यानी वी से मैं यानी आई में रिड्यूस करती है. आज
की शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक-सामूहिक नहीं, एकाकी, एकांगी और इकहरा बनाती है. इस
आधुनिक शिक्षा की नींव में मैकाले की आत्मा वास करती है, न कि भारत के आमजन की आत्मा.
इस शिक्षा में राज-काज, शासन, कर-उगाही, कानून और व्यवस्था के लिए क्लर्क, सिपाही,
सैनिक, अधिकारी आदि तैयार करने के लिए एक बेहद संकीर्ण, औपनिवेशिक और अस्थायी
दृष्टिकोण अपनाया गया था, जिसे दुर्भाग्यवश आज तक नहीं बदला गया. पर सवाल यह है कि
राजकाज चलाने के लिए एक बड़ी आबादी का कितना प्रतिशत हिस्सा चाहिए?
मुझे लगता है, एक बहुत बड़ी आबादी का एक बेहद छोटा हिस्सा चाहिए राजकाज चलाने के
लिए. फिर सवाल उठता है कि राजकाज चलाने के लिए एक छोटे से हिस्से को तैयार करने के
लिहाज से डिजाईन की गई शिक्षा-प्रणाली को पूरी की पूरी आबादी पर क्यों थोपा गया?
मेरे खयाल से, फैलते पूंजीवाद को, बढ़ते औद्योगिकीकरण को देखते हुए मैकाले की इस
संकीर्ण शिक्षा-प्रणाली को पूंजीवादी नजरिए से माकूल समझा गया, जिससे उत्पादक और
उपभोक्ता- दोनों प्रकार के लोगों की सतत आपूर्ति होती रहे. इस शिक्षा-प्रणाली से
भारत जैसे कृषि-प्रधान देश को बहुत क्षति पहुँची और एक ही देश में भारत और इंडिया
जैसे दो विपरीत समाज तैयार हो गए. अर्थात इस शिक्षा-प्रणाली से देश का एक हिस्सा तो
समर्थ, समृद्ध, शक्तिवान और उन्नत हुआ पर देश का बड़ा हिस्सा पराश्रित, पंगु और
जीवन-यापन के परंपरागत साधनों और तरीकों से वंचित हो गया.
आधुनिक शिक्षाविदों और आधुनिक अर्थशास्त्रियों का यह तर्क हो सकता है कि आधुनिक
शिक्षा ने देश के विकास और प्रगति में बड़ा योगदान किया है, जीडीपी दर में बढ़ोतरी
की है, देश को बहुत लाभ पहुँचाया है. पर आधुनिक शिक्षा ने देश को जितना लाभ पहुँचाया
है, उससे भी कहीं ज्यादा क्रूरतम नुकसान पहुँचाया है. इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है-
देश के, समाज की पहुँच में मौजूद जीवन-यापन के परंपरागत साधनों और तरीकों को बेहद
चालाकी से, चमकदार छल से नष्ट कर देना और बेरोजगारों की एक बहुत बड़ी फौज या कहें,
श्रम का स्रोत खड़ा कर देना, जिनका श्रम औने-पौने दामों में खरीदा जा सके. आधुनिक
शिक्षा ने देश की कृषि-व्यवस्था को उपेक्षित किया, किसानों को मजदूरों में तब्दील
किया और गाँवों को लेबर-स्टॉक में बदल दिया.
शिक्षा का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति को आत्म-सम्मान से संपन्न, सकारात्मक विचारों
से लैस और स्वंय और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाना होना चाहिए, न कि सिर्फ आर्थिक
रूप से आत्म-निर्भर. लेकिन इस शिक्षा ने व्यक्ति को और अकेला, एकांगी,
आत्म-केंद्रित, बुजदिल, भीरू, असामाजिक, असुरक्षित और जड़ों से कटा हुआ बनाया है.
आज जो व्यक्ति जितना पढ़ा-लिखा है, वह अपनी जड़ों से अपने समाज से, अपनी परंपराओं से
उतना ही अधिक कटा हुआ है.
सच कहा जाए तो हम पढ़े-लिखे लोगों ने खुद को अपनी संस्कृति-सभ्यता, भाषा और परंपरा
को नष्ट करने में अग्रणी भूमिका निभायी है. प्रतिष्ठित साहित्यकार यू.आर. अनंतमूर्ति
ने ठीक ही कहा है- "मैं इस देश की निरक्षर जनता को प्रणाम करता हूँ, जिनके कारण इस
देश की सभ्यता और संस्कृति बची हुई है!"
इसे यूं भी कहा जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा ने भाषा की महत्ता को भी रिड्यूस किया
है और उसे मीडियम ऑफ मार्केट यानी बाजार की भाषा बना दिया है. जबकि भाषा बाजार का
संदेशवाहक नहीं, संस्कृति और लोक की थाती और समाज की अस्मिता की परिचायक है. लेकिन
नौकरी का लालच पैदा करने वाली इस शिक्षा ने हम भारतीयों को इतना नीच, लालची, अंधा
और आजीवन गुलाम बना दिया है कि हम अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के प्रति भी अभद्र,
अशालीन और निर्मम हो गए हैं. यह कितनी शर्मनाक और हताशाजनक है कि आज हम अपनी
मातृभाषा या राष्ट्रभाषा नहीं जानने पर कतई शर्मिंदा नहीं होते. हम अंग्रेजी नहीं
जानने पर शर्मिंदा होते हैं! इसे कहते हैं गुलामी!
अब आइए, इस आधुनिक शिक्षा के नतीजों पर विचार करें. कहा गया कि देश शिक्षित होगा तो
समाज विकसित होगा. समाज विकसित होगा तो समृद्धि और संपन्नता आएगी. कुल मिलाकर,
आधुनिक शिक्षा को विकासवाद का नारा और संवाहक बनाया गया. हर कोई एम.ए., बी.ए. की
डिग्रियाँ बटोरने लगा. लेकिन विकास का मॉडल पूंजीवादी था, इसलिए नतीजे भी पूंजीवादी
ही आए. यह तो सर्वमान्य है कि जिस ढंग की शिक्षा-दीक्षा होगी, वैसा ही व्यक्तित्व
होगा, वैसा ही समाज होगा. तो चूंकि हमारी शिक्षा-प्रणाली पूंजीवादी सोच की थी,
इसलिए विकास का नजरिया भी पूंजीवादी हो गया. यानी जिसमें मुनाफा हो, उसे ही विकसित
करो, उस पर ही ध्यान दो.
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इस मामले में कृषि को सबसे उपेक्षित क्षेत्र माना गया. वैसे भी हमारे यहाँ
खेती-किसानी मूलत: जीवन-यापन का स्रोत ही रही. हमारे देश में ग्राम्य-समाज रोटी,
कपड़ा और मकान की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए ही श्रम करता था. हामारा
ग्राम्य-समाज जीवन-यापन के लिए धनोपार्जन, जीविकोपार्जन के लिए खटता था. साफ-साफ कहें
तो वह पेट भरने के लिए खटता था, पेटी भरने के लिए नहीं. वहाँ विलासिता,
सर्वमान्य-सर्वस्वीकृत नहीं थी. वह राजे-रजवाड़ों की रखैल थी. ग्राम्य-समाज में
एकांगी विलासिता नहीं, लोक-उत्सव सर्वमान्य था, सर्व-स्वीकृत था.
इसलिए लोग फसल-चक्रों के अनुरूप तय किए गए पर्व-त्योहारों, उत्सवों में अपना आनंद
बटोरते थे. मनोरंजन के लिए लोकगीत, लोकनृत्य आदि की सार्वजनीन और सामूहिक परंपरा
थी. मोची, लुहार, बनिया और किसानों के बीच अन्योआश्रय संबंध था और उनके बीच
बार्टर-सिस्टम प्रचलित था. वहाँ कोई किसी की उपेक्षा नहीं कर सकता था. वहाँ शिक्षा
का अर्थ धर्म, नीति, न्याय और समानता था. कई अर्थों में हमारा समाज आधुनिक और
चिर-लोकतांत्रिक था. वह आधुनिक तो था, पर बर्बर नहीं था.
लेकिन कृषि की रीढ़ तोड़ देने से ग्राम्य-समाज का ताना-बाना बिखर गया और लोग शहरों
में पनप रहे उद्योग-धंधों की तरफ मजदूर बनकर पलायन करने को विवश हुए. खेती–किसानी व
परंपरागत व्यवसायों में युवा होते-होते जुट जाने वाले लोगों को क्लर्क, मास्टर,
डॉक्टर, इंजीनियर, मेकैनिक, मजदूर, मिस्त्री बनने के लिए मैट्रिक, इंटर, बी.ए.,
एम.ए. जैसी शैक्षणिक योग्यता प्रदान करने वाली शिक्षा की शरण में जाने को मजबूर होना
पड़ा. और यहीं से एक पूंजीवादी, औद्योगिक, मिथ्या-विकासवादी दुष्चक्र शुरू हुआ जो
ब्रिटिशकाल से लेकर आजादी के साठ-पैंसठ बरस बाद भी बदस्तूर जारी है, जिसका नतीजा
विस्थापन, पलायन, बेरोजगारी, शहरी और ग्रामीण गरीबी, गाँवों के विनाश, जंगलों के
विनाश, अनैतिकता, असामाजिकता, असुरक्षा, आतंकवाद और नक्सलवाद के विकराल रूपों में
देखने को मिल रहा है.
पुराने जमाने में लोग नौकरी में नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि वे आत्म-निर्भर थे और
जीविकोपार्जन के परंपरागत साधनों और खेती-किसानी से उनका जीवन सुखपूर्वक चल जाता
था. इसके साथ ही उन्हें यह भी पता था कि नौकरी देने तक सीमित शिक्षा को अपनाकर अपनी
लोक-अस्मिता, अपना आत्म-सम्मान खोना अदूरदर्शिता होगी. लेकिन उनकी खेती छीन ली गई
और उन्हें भी नौकरी की शरण में जाना पड़ा.
आज आत्म-निर्भरता की परिभाषा और व्याख्या ही बदल गई है. आज जो नौकरीशुदा है, वह
ज्यादा आत्म-निर्भर, ज्यादा संपन्न, ज्यादा प्रतिष्ठित है. पर पुराने जमाने में
नौकरी को आत्म-निर्भरता का पैमाना नहीं माना जाता था, क्योंकि जीवन-यापन के लिए
स्वंय श्रम करना और धन-संग्रह नहीं, अन्न-संग्रह उस समय कहीं अधिक श्रेयस्कर माना
जाता था. उस समय किसान, किसान हुआ करते थे, व्यापारी नहीं.
आज जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, वे वस्तुत: किसान कम, व्यवसायी ज्यादा हैं.
किसान की मूल प्रवृति मुनाफाखोरी नहीं होती है. लेकिन ग्लोबलाईजेशन ने हरेक को
मुनाफाखोरी की तरफ धकेल दिया. नब्बे के दशक के शुरू होते ही शिक्षा भी शिक्षा न
रहकर व्यवसाय हो गयी. ग्लोबलाईजेशन के दौर में शिक्षा का मूल धर्म नष्ट हो गया. वह
जीवन के मूल मंत्र सिखाने की बजाय अमीर बनने, मुनाफा कमाने, उपभोक्ता बनने के मंत्र
सिखाने लगी.
वस्तुत: नब्बे के दशक से शिक्षा को सपने बेचने, झूठ और फरेब बेचने का माध्यम बना
दिया गया. हरेक डिग्री, हरेक कोर्स, चाहे एमबीए हो, एमसीए हो या कोई और चमकीला
कोर्स, सबमें यही दावा किया जाने लगा कि आप छह महीने में, बारह महीने में, अठारह
महीने में, चौबीस महीने में, छत्तीस महीने में इत्ता कमाने लगेंगे, उत्ता कमाने
लगेंगे, मतलब बहुत जल्द अमीर से अमीर हो जाएंगे!
लेकिन इस छल में, सबसे नुकसान में, गावों और छोटे शहरों के युवा फंसे. कोई खेत
बेचकर शहर आया, कोई माँ के गहने बेचकर शहर आया. किसी के बाप ने और घूसखोरी शुरू कर
दी, ताकि शहर भेजे बच्चे के खर्चे पूरे किए जा सकें. इस तरह गाँवों का पैसा शहरों
में जमा होने लगा और गाँव गरीब होते गए और शहर अमीर होते गए. शहरों में कई-कई
कॉलोनियाँ खड़ी हो गईं, जो बस परदेसियों के किराए से फलने-फूलने लगीं. कई-कई किराना
दुकानें परदेसियों के चूल्हों से चमकने लगीं. कपड़े-लत्ते, फोन-मोबाईल, फैशन की
दुकानों को भी बरकत मिल गई. इस तरह माईग्रेशन-बेस्ड इकॉनोमी का एक समानांतर ढाँचा
तैयार हो गया जो आज तक फल-फूल रहा है.
इन चमकीले सपनों का कारोबार करने वाले कोर्सों में किसी ने यह कतई नहीं बताया कि इन
कोर्सों को करने के बाद तुम्हें गाँव में नौकरी, रोजगार नहीं मिलेगा, बल्कि तुम शहर
के बंधुआ मजदूर हो जाओगे! इन चमकीले छलिए कोर्सों में यह तो खूब विज्ञापित किया गया
कि आप लाख रुपए की मासिक तनख्वाह कमा सकते हैं.
लेकिन यह बड़ी चालाकी से छुपा लिया गया कि किसी एक को मिलेंगे लाख रु. महीने और
हजारों-हजार बंधुआ मजदूरों को मिलेंगे हजार-दो हजार रु. महीने! यानी एक जो बॉस होगा,
उसकी सैलरी होगी लाख रु. महीना और उसके मातहत खटेंगे हजारों-हजार कोर्सधारी, जिनकी
तनख्वाह होगी हजार-दो हजार रु.. और उन्हें रोज सपना दिखाया जाएगा कि खटो, खटो, खटो,
जी-जान लगाकर खटो! और, और और खटो! तुम भी एक दिन उस लखटकिया बॉस की जगह होओगे! बस
कंपनी के शेयर बेचो, कंपनी की चीजें बेचो, नेटवर्किंग करो, फांसो-फंसाओ! खुद तक बेचो!
तो इस तरह हुआ शिक्षा का उदारीकरण! इस तरह हुआ शिक्षा का व्यवसायीकरण. शुक्र है, यह
अंधी दौड़ थोड़ी मंद जरूर हुई है और लोगों को असलियत का पता चलने लगा है!
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इस आधुनिक शिक्षा का सबसे खतरनाक दंश है- विस्थापन. हम जैसे मध्यमवर्गीय लोग,
तथाकथित संभ्रांत लोग शहर आकर बस(?) जाते हैं. यह नौकरीपेशा आबादी भी एक भावनात्मक
और सामाजिक विस्थापन का अनकहा दंश झेलती रहती है और अपने आप को एक पूंजीवादी विकास
के कुचक्र में स्वाहा कर देती है. मुझे लगता ही नहीं, मैं यह दावा करता हूँ कि भले
ही सब लोग शहरों में ठाट-बाट जुटाकर, फ्लैट-बंगला-गाड़ी-मोटर- बैंकबैलेंस के छद्म
में अघाकर एक सफल चेहरा ओढ़ लेते हैं, लेकिन उनके जीवन में हमेशा उनके गाँव हूक मारते
रहते हैं और इसी अतीतराग, इसी नॉस्टेलजिया और स्मृति-संबल के बूते वे शहरी संत्रास
झेलते रहते हैं. मैं तो आज तक भी खुद को महानगरीय जीवन का अंग नहीं बना पाया. मैं
तो एक तरह का विस्थापित जीवन ही जी रहा हूँ.
मेरा खयाल है, यदि लोगों के सामने यदि विकल्प हों कि वह अपनी-अपनी नौकरी छोड़कर
गाँव जाकर जीवन-यापन करने लायक साधन जुटाकर रहने को स्वतंत्र हो जायें तो संभवत:
मेरे जैसे हजारों लोग गाँव लौटने को तैयार हो जायेंगे. पर इसके लिए इस नकारा और
नकारात्मक विकास के पहिए को गाँवों की तरफ मोड़ना होगा. यह अनिवार्य नीति बनानी होगी
कि यथासंभव यह प्रयास किया जाये कि लोगों को अपने गाँव-शहर, अपने राज्य/प्रांत में
ही नौकरी की सुविधा मिले. जो विशेष शोध, अध्ययन करने के इच्छुक हों, सिर्फ वही उच्च
शिक्षा लें, वही परदेस कूच करें, बाहर जायें.
इससे आम धारणा के उलट, लोग ज्यादा स्थिरचित्त, ज्यादा समर्पित होकर अपना कार्य, अपना
कर्तव्य कर सकेंगे. इससे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा, क्योंकि शहरी और महानगरीय
जीवन लोगों को ज्यादा लालची और ज्यादा भोगी बनाता है. लेकिन ग्रामीण जीवन ऐसा नहीं
करता. वहाँ एक सधा हुआ और श्रम-आधारित संतोष पैदा करता है. शहरी जीवन हमें एकाकी और
एकांगी बनाता है, लेकिन ग्रामीण जीवन हमारे भीतर सामूहिकता का भाव बचाए रखता है.
जिस तरह मैनेजमेंट, आईटी, मेडिकल, इंजिनियरिंग, फाइनांस, इंश्योरेंस, एविएशन,
सर्विस आदि सेक्टरों में युवाओं को आकृष्ट किया जा रहा है, ठीक उसी तरह अनिवार्यत:
युवाओं को कृषि, कुटीर उद्योगों, ग्रामीण उद्यमों, जीविकोपार्जन के परंपरागत साधनों
की ओर आकृष्ट किया जाए, उन्हें इस दिशा में प्रेरित-प्रोत्साहित किया जाए.
आज का विकासवाद आधुनिक, असंवेदनशील, पूंजीवादी, उपभोक्तावादी और संकीर्ण
शिक्षा-दर्शन का परिणाम है. आप चाहें तो कह सकते हैं कि आज का विकासवाद नक्सलवाद से
कहीं कम घातक नहीं है. हम सैनिक ताकतों से नक्सलवाद को नहीं खत्म कर सकते क्योंकि
असली जड़ को तो हमारा यह उल्टा विकास ही सींच रहा है. इस विकास की प्रकृति और
प्रवृति दोनों ही शोषणकारी और दमनकारी है. इसलिए एक बहुत बड़ा असंतुलन पैदा होता जा
रहा है. वस्तुत: आज का विकासवाद महज उपभोक्तावाद को बढ़ावा दे रहा है. वह
जीवन-उन्मुख न होकर, शत-प्रतिशत बाजारोन्मुख हो गया है. इसलिए गाँवों में
खेती-बाड़ी को, जल-जंगल-जमीन को, किसानों को, बुनकरों को तबाह करके शहरों में
उपभोक्ताओं की लाचार लेकिन लोलुप फौज तैयार की जा रही है. पर सच तो यही है कि शहरों
में समाज नहीं, बाजार है और वहाँ जन-समुदाय नहीं, पहचान-विहीन उपभोक्ता बसते हैं.
मुझे लगता है, आज भी विकास के अंत:करण में गाँवों में बसने वाले लोग नहीं, बल्कि
शहरों, महानगरों में बसने वाले उच्चवर्गीय लोग ही हैं. ग्रामीण और शहरी गरीब आबादी
विकास के इस नृशंस पहिए में बस अपना खून-पसीना झोंकने को ही अभिशप्त है. वह कभी भी
इस विकास का स्वाद स्वयं नहीं चख पाती.
यहाँ यह गौरतलब है कि इस नृशंस विकास के दमनचक्र का शिकार पिछड़े राज्यों के गरीब
और निर्धन शिक्षित बेरोजगार लोग ही होते हैं. इसलिए वे विस्थापन का दंश सबसे ज्यादा
झेलते हैं. वे वस्तुत: पूंजीवादी उपनिवेश की शोषित आबादी के रूप में शासित भी होते
हैं. इनके हिस्से के संसाधनों का, इनके मानव-श्रम का दोहन और उपयोग, इनके उत्थान के
लिए न होकर, महानगरों-महाशगरों के लालन-पालन के लिए किया जा रहा है. अर्थात इंडिया
की चाकरी में पूरा भारत खट रहा है और खप रहा है.
कुल मिलाकर, जीवन को यदि सचमुच सुखमय बनाना है, सुंदर और सुगढ़ बनाना है तो सबसे
पहले इस पूंजीवादी शिक्षा को तिरस्कृत करना होगा. नवजागरण की बात तो दूर, यह सबसे
पहले समझना होगा कि हम जीवन को सुंदर बनाना चाहते हैं या जीवन को दूसरों के हाथों
सौंपकर इसे असुंदर बना देना चाहते हैं. फिर हर कक्षा में भगवद् गीता, कुरान,
बाइबिल, गुरूग्रंथ साहिब आदि को महत्वपूर्ण पुस्तकों के रूप में स्कूली पाठ्यक्रम
में अनिवार्यत: शामिल करना होगा. गाँधी को, उनके हिंद स्वराज को पढ़ना होगा. यहां
मैं जोर देकर कह रहा हूँ कि जब तक जीवन और जीना अप्रासंगिक नहीं हो जाता, तबतक
गाँधी भी अप्रासंगिक नहीं होंगे.
हम गाँधी जैसा सादा और कठिन जीवन न जी पाएं तो कोई बात नहीं, पर हमें उनके विचारों,
उनके सूत्रों, उनके सिद्धांतों और उनकी योजनाओं को अमल में लाना होगा. यह बस इस तरह
से होगा कि हम गाँवों की तरफ लौटें, वेदों की तरफ लौटें, परंपराओं की तरफ फिर
लौटें. हम यदि गाँधी का जीवन नहीं जी सकते तो कम से कम उनके हथियारों को अपने कंधों
पर तो अवश्य उठा सकते हैं- यानी हम सत्य, अहिंसा और ईमानदारी को अपनी ताकत, अपना
रक्षा-कवच, अपना हथियार तो बना ही सकते हैं.
हम स्वयं सत्यनिष्ठ, अहिंसक और ईमानदार रहकर लोभ, लालच और भ्रष्टाचार पर बहुत हद तक
काबू पा ही सकते हैं. यही नवजागरण का पहला कदम होगा. मेरे विचार से, सत्य, अहिंसा
और ईमानदारी का आजीवन निर्वहन ही आजीवन शिक्षा होगी. और ऐसे ही सुख आएगा, ऐसे ही
सौंदर्य आएगा, ऐसे ही समानता आएगी. और किसी रास्ते से नहीं, बस इसी रास्ते से
नवजागरण आएगा.
15.01.2012, 10.54 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | नफीस आलम [nafisalam2006@yahoo.co.in] नागपुर - 2012-01-27 15:06:39 | | | |
राहुल राजेश जी ने अच्छा प्रयास किया हैं । दरअसल स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति सामाजिक, आर्थिक व रातनीतिक विषमता को समाप्त करने व समावेशी व्यवस्था बनाने की कोई कोशिश नही हुई । अगर कोई कोशिश हुई भी तो हमारे समाज के शीर्ष नेतृत्व ने कभी उसे कुचलने की हरसंभव मेहनत की । | | | | | | |
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