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शिक्षा:जीवन या नौकरी के लिये

मुद्दा

 

शिक्षा:जीवन या नौकरी के लिये

राहुल राजेश


आज अगर स्कूल-कॉलेज-युनिवर्सिटी जाने वाले किसी भी छात्र से सवाल करें कि वह पढ़ाई क्यों कर रहा है तो एकदम सहज उत्तर मिलेगा- नौकरी पाने के लिए! शायद ही कोई कहे कि ज्ञान या दृष्टि पाने के लिए! वस्तुत: ऐसे उत्तर की अपेक्षा करना भी बेमानी है, क्योंकि आज की शिक्षा, आज की आधुनिक शिक्षा ज्ञान नहीं, डिग्री देती है, नौकरी पाने की योग्यता देती है, प्रतियोगिताओं में अव्वल आने के लिए, परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के लिए सूचनाएँ देती है. आज की शिक्षा हमें आर्ट ऑफ अर्निंग सिखाती है, आर्ट ऑफ लिविंग नहीं. आज की शिक्षा डिग्री पाने तक सीमित है, नौकरी पाने तक सीमित है. आज की शिक्षा में सामाजिक नवजागरण की कोई अवधारणा नहीं है, बल्कि बड़ा से बड़ा उपभोक्ता, बड़ा से बड़ा खरीदार बनाने की अवधारणा है इसमें. इसलिए आज की शिक्षा पैसा कमाने के काबिल बन जाने तक सीमित है. आज की शिक्षा में आजीवन शिक्षा का कोई भी सूत्र, कोई भी सिद्धांत समाहित नहीं है.

शिक्षा


सामाजिक नवजागरण एक व्यापक और सामूहिक उपक्रम और उद्यम है. लेकिन आज की शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक इकाई के रूप में नहीं, वरन् एक उत्पादक इकाई में ढालती है. यह व्यक्ति की चेतना और पहचान को हम यानी वी से मैं यानी आई में रिड्यूस करती है. आज की शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक-सामूहिक नहीं, एकाकी, एकांगी और इकहरा बनाती है. इस आधुनिक शिक्षा की नींव में मैकाले की आत्मा वास करती है, न कि भारत के आमजन की आत्मा. इस शिक्षा में राज-काज, शासन, कर-उगाही, कानून और व्यवस्था के लिए क्लर्क, सिपाही, सैनिक, अधिकारी आदि तैयार करने के लिए एक बेहद संकीर्ण, औपनिवेशिक और अस्थायी दृष्टिकोण अपनाया गया था, जिसे दुर्भाग्यवश आज तक नहीं बदला गया. पर सवाल यह है कि राजकाज चलाने के लिए एक बड़ी आबादी का कितना प्रतिशत हिस्सा चाहिए?

मुझे लगता है, एक बहुत बड़ी आबादी का एक बेहद छोटा हिस्सा चाहिए राजकाज चलाने के लिए. फिर सवाल उठता है कि राजकाज चलाने के लिए एक छोटे से हिस्से को तैयार करने के लिहाज से डिजाईन की गई शिक्षा-प्रणाली को पूरी की पूरी आबादी पर क्यों थोपा गया? मेरे खयाल से, फैलते पूंजीवाद को, बढ़ते औद्योगिकीकरण को देखते हुए मैकाले की इस संकीर्ण शिक्षा-प्रणाली को पूंजीवादी नजरिए से माकूल समझा गया, जिससे उत्पादक और उपभोक्ता- दोनों प्रकार के लोगों की सतत आपूर्ति होती रहे. इस शिक्षा-प्रणाली से भारत जैसे कृषि-प्रधान देश को बहुत क्षति पहुँची और एक ही देश में भारत और इंडिया जैसे दो विपरीत समाज तैयार हो गए. अर्थात इस शिक्षा-प्रणाली से देश का एक हिस्सा तो समर्थ, समृद्ध, शक्तिवान और उन्नत हुआ पर देश का बड़ा हिस्सा पराश्रित, पंगु और जीवन-यापन के परंपरागत साधनों और तरीकों से वंचित हो गया.

आधुनिक शिक्षाविदों और आधुनिक अर्थशास्त्रियों का यह तर्क हो सकता है कि आधुनिक शिक्षा ने देश के विकास और प्रगति में बड़ा योगदान किया है, जीडीपी दर में बढ़ोतरी की है, देश को बहुत लाभ पहुँचाया है. पर आधुनिक शिक्षा ने देश को जितना लाभ पहुँचाया है, उससे भी कहीं ज्यादा क्रूरतम नुकसान पहुँचाया है. इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है- देश के, समाज की पहुँच में मौजूद जीवन-यापन के परंपरागत साधनों और तरीकों को बेहद चालाकी से, चमकदार छल से नष्ट कर देना और बेरोजगारों की एक बहुत बड़ी फौज या कहें, श्रम का स्रोत खड़ा कर देना, जिनका श्रम औने-पौने दामों में खरीदा जा सके. आधुनिक शिक्षा ने देश की कृषि-व्यवस्था को उपेक्षित किया, किसानों को मजदूरों में तब्दील किया और गाँवों को लेबर-स्टॉक में बदल दिया.

शिक्षा का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति को आत्म-सम्मान से संपन्न, सकारात्मक विचारों से लैस और स्वंय और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाना होना चाहिए, न कि सिर्फ आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर. लेकिन इस शिक्षा ने व्यक्ति को और अकेला, एकांगी, आत्म-केंद्रित, बुजदिल, भीरू, असामाजिक, असुरक्षित और जड़ों से कटा हुआ बनाया है. आज जो व्यक्ति जितना पढ़ा-लिखा है, वह अपनी जड़ों से अपने समाज से, अपनी परंपराओं से उतना ही अधिक कटा हुआ है.

सच कहा जाए तो हम पढ़े-लिखे लोगों ने खुद को अपनी संस्कृति-सभ्यता, भाषा और परंपरा को नष्ट करने में अग्रणी भूमिका निभायी है. प्रतिष्ठित साहित्यकार यू.आर. अनंतमूर्ति ने ठीक ही कहा है- "मैं इस देश की निरक्षर जनता को प्रणाम करता हूँ, जिनके कारण इस देश की सभ्यता और संस्कृति बची हुई है!"

इसे यूं भी कहा जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा ने भाषा की महत्ता को भी रिड्यूस किया है और उसे मीडियम ऑफ मार्केट यानी बाजार की भाषा बना दिया है. जबकि भाषा बाजार का संदेशवाहक नहीं, संस्कृति और लोक की थाती और समाज की अस्मिता की परिचायक है. लेकिन नौकरी का लालच पैदा करने वाली इस शिक्षा ने हम भारतीयों को इतना नीच, लालची, अंधा और आजीवन गुलाम बना दिया है कि हम अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के प्रति भी अभद्र, अशालीन और निर्मम हो गए हैं. यह कितनी शर्मनाक और हताशाजनक है कि आज हम अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा नहीं जानने पर कतई शर्मिंदा नहीं होते. हम अंग्रेजी नहीं जानने पर शर्मिंदा होते हैं! इसे कहते हैं गुलामी!

अब आइए, इस आधुनिक शिक्षा के नतीजों पर विचार करें. कहा गया कि देश शिक्षित होगा तो समाज विकसित होगा. समाज विकसित होगा तो समृद्धि और संपन्नता आएगी. कुल मिलाकर, आधुनिक शिक्षा को विकासवाद का नारा और संवाहक बनाया गया. हर कोई एम.ए., बी.ए. की डिग्रियाँ बटोरने लगा. लेकिन विकास का मॉडल पूंजीवादी था, इसलिए नतीजे भी पूंजीवादी ही आए. यह तो सर्वमान्य है कि जिस ढंग की शिक्षा-दीक्षा होगी, वैसा ही व्यक्तित्व होगा, वैसा ही समाज होगा. तो चूंकि हमारी शिक्षा-प्रणाली पूंजीवादी सोच की थी, इसलिए विकास का नजरिया भी पूंजीवादी हो गया. यानी जिसमें मुनाफा हो, उसे ही विकसित करो, उस पर ही ध्यान दो.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नफीस आलम [nafisalam2006@yahoo.co.in] नागपुर - 2012-01-27 15:06:39

 
  राहुल राजेश जी ने अच्छा प्रयास किया हैं । दरअसल स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति सामाजिक, आर्थिक व रातनीतिक विषमता को समाप्त करने व समावेशी व्यवस्था बनाने की कोई कोशिश नही हुई । अगर कोई कोशिश हुई भी तो हमारे समाज के शीर्ष नेतृत्व ने कभी उसे कुचलने की हरसंभव मेहनत की ।  
   
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