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ईमेल का अंत

बहस

 

ईमेल का अंत

प्रीतीश नंदी


सच कहूं तो मैंने ईमेल को कभी पसंद नहीं किया. और अब, जब वे धीरे-धीरे सभी के लिए अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं, मैं उन्हें और भी नापसंद करने लगा हूं. हाथ से लिखे जाने वाले पत्रों और संदेशों की मृत्यु होने में अनेक सदियां लग गई थीं, लेकिन ईमेल डेढ़ दशक में ही दम तोड़ने लगे हैं. ईमेल के अंत की घोषणा करने वाला मैं अकेला नहीं हूं.

ईमेल


मार्क जकरबर्ग ने भी गत नवंबर में कुछ इसी तरह की बातें कही थीं. ईमेल खातों की संख्या भले ही तीन अरब को पार कर चुकी हो, लेकिन अब वे इतने लोकप्रिय नहीं रह गए. संभावनाएं जताई जा रही हैं कि अगले साल के अंत तक ईमेल खातों की संख्या चार अरब तक पहुंच जाएगी, लेकिन इसके बावजूद लगता नहीं कि उन्हें बचाया जा सकेगा.

ईमेल का एक औसत उपयोगकर्ता एक दिन में सौ से अधिक मेल प्राप्त करता और भेजता है. मुझे एक दिन में पांच सौ मेल मिलते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर मेल ऐसे होते हैं, जिनसे मेरा कोई सरोकार नहीं है और जिन्हें मैं कभी नहीं पढ़ना चाहूंगा.

मेरे दोस्त मुझे एसएमएस करते हैं. या ट्वीट करते हैं. या डीएम करते हैं. इन माध्यमों का उपयोग करने पर कोई उत्तर पाने की संभावना 50 फीसदी तक होती है. लेकिन यदि वे मुझे ईमेल करेंगे तो यह संभावना घटकर दस फीसदी रह जाएगी. क्यों? बहुत सारे लोगों का ईमेल से मोहभंग क्यों हो रहा है? जवाब सीधा-सा है.

हमें हद से अधिक तादाद में ईमेल मिलते हैं और उनमें से अधिकतर गैरजरूरी होते हैं. अलबत्ता फिल्टर्स अनेक गैरजरूरी मेल को हम तक पहुंचने से पहले ही रोक लेते हैं, लेकिन इसके बावजूद लोग फिल्टर्स में सेंध लगाकर आपके मेलबॉक्स तक पहुंच ही जाते हैं.

पहले जब हम किसी को मेल करते थे तो उसमें निजी संपर्क का अहसास रहता था. हम एक-दूसरे से अपने विचार, कल्पनाएं और अनुभूतियां साझा करते थे, लेकिन अब केवल मेल्स का एकतरफा ट्रैफिक है. प्रोडक्ट न्यूज. पोर्न. प्रमोशंस. रहस्यमयी उपहार, जिनकी मुझे कतई जरूरत नहीं. जोक्स. टैरो रीडिंग्स.

ऐसे-ऐसे देशों से इंवेस्टमेंट प्रपोजल्स, जिनका कभी नाम भी न सुना हो. और बेशुमार खबरें. पत्र, जो मुझे सूचित करते हैं कि मेरे कोई अमीर अंकल गुजर गए हैं और अपने पीछे मेरे लिए अच्छी-खासी जायदाद छोड़ गए हैं. मेल भेजने वाले रहस्यमयी बैंकर मुझसे केवल मेरा बैंक अकाउंट नंबर चाहते हैं.

यदि आप इस तरह के ईमेल्स का जवाब देते रहे तो आप खप जाएंगे, लेकिन वे खत्म न होंगे. यदि आप समझदार हैं तो इनके झांसे में न आएंगे, लेकिन इतनी तादाद में आने वाले मेल्स को नजरअंदाज भला कैसे करें? और सबसे बदतर होती हैं पोर्न साइट्स, जो बेहद भद्दे ढंग से आपके सामने अजीबोगरीब प्रस्ताव रखती हैं. ये साइट्स तो फोन पर पेड सेक्स चैट से भी बदतर हैं. केवल कोई विकृत मानसिकता का व्यक्ति ही इन्हें बर्दाश्त कर सकता है.

हाल ही के एक अध्ययन में बताया गया है कि हमें मिलने वाले मेल्स में से 15 फीसदी से भी कम हमारे लिए उपयोगी होते हैं. एक औसत इंटरनेट उपयोगकर्ता एक सप्ताह में 20 घंटे का समय इन गैरजरूरी मेल्स पर बर्बाद करता है. फ्रांस के पूर्व वित्त मंत्री, जो अब छह अरब यूरो की एक आईटी कंपनी के सीईओ हैं, हाल ही में भारत आए थे. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी कंपनी को इंटरनल ईमेल्स के बिना चलाने की शपथ ली है.

वे चाहते हैं कि उनके स्टाफ के 80 हजार लोग ईमेलिंग करना बंद कर दें और उसके स्थान पर अधिक प्रभावी सोशल नेटवर्किग टूल्स का उपयोग करें. ऐसे टूल्स, जो अधिक विनम्र, मैत्रीपूर्ण और निजी हों. जिनमें आपको अपने लिए जरूरी संदेश तक पहुंचने के लिए सैकड़ों गैरजरूरी संदेश हटाना न पड़ें.

टेलीकॉम क्रांति के प्रारंभिक उल्लास के बाद धीरे-धीरे लोगों को समझ आने लगा था कि आपके फोन नंबर तक सभी की आसान पहुंच के कारण कई बार आपको कितनी खीझ का सामना करना पड़ सकता है. यह भयावह है कि आपका नया फोन नंबर कितनी जल्दी सार्वजनिक हो जाता है और आपको कोई भी, कभी भी फोन लगा सकता है. आज हमें हर दिन, हर जगह अपनी निजता से समझौता करना पड़ रहा है और आपकी जिंदगी में ताकझांक करने वालों में केवल सरकार और उसकी एजेंसियां ही शामिल नहीं हैं.

कई लोग हैं, जो लगातार आप पर और आपके द्वारा की जाने वाली खरीदारियों, आपके इंवेस्टमेंट कॉल्स और उपभोग की आदतों पर नजर बनाए रखते हैं. ईमेल्स तो इससे भी बदतर हैं. कुकीज आपके हर कदम को ट्रैक करती हैं. फोन कॉल्स के विपरीत वे वैधानिक रूप से ऐसा करती हैं और आपको कानोंकान खबर भी नहीं होती.

एक-दूसरे से कम्युनिकेट करना लोगों की बुनियादी जरूरत बन गई है और मुझे इससे कोई समस्या नहीं है. लोग आमतौर पर कम्युनिकेट करते समय विनम्र नहीं रहते, लेकिन यह भी ठीक है. सभी की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं और जरूरतें होती हैं. लेकिन समस्या इस बात से है कि इनके कारण आपका बहुत वक्त जाया होने लगा है.

एक समय था, जब मैं अपने फोन की घंटी बजते ही दौड़कर उसे उठाता था. एक समय था, जब मैं बेसब्री से डाकिये का इंतजार करता था.

तब हर फोन और चिट्ठी के साथ एक उम्मीद बंधी रहती थी. यह उम्मीद कि इनके माध्यम से कोई सुखद खबर मिलने वाली है और अक्सर ऐसा होता भी था. इन संचार माध्यमों के कारण कई अद्भुत लोगों से मेरी मित्रता हुई. वह सब सुखद संयोग और जादू और रहस्य की तरह लगता था. अब वह बात नहीं रही. अब उस रहस्य की जगह एक अनजाने-से अंदेशे ने ले ली है.

सोशल नेटवर्किग साइट्स अब भी इस समस्या से अछूती हैं. यहां पर आप केवल अपने चुने हुए लोगों से ही संपर्क में रहते हैं. लेकिन जब सवाल ईमेल्स का आता है, तो मुझे लगता है कि मैं कोई गुलिवर हूं, जिसे लाखों बौने अजनबी लोगों ने धरती से जकड़ रखा है. और वे लगातार मुझे ऐसी चीजें बेचने की कोशिश कर रहे हैं, जिनके बारे में शायद मैं सुनना भी नहीं चाहता.

02.02.2012, 07.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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