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बाजारवाद नामक हत्यारा

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बाजारवाद नामक हत्यारा

रघु ठाकुर


श्रीलंका मूल के छात्र मिरोशन ने 19 जनवरी 2012 को मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट एकादमी के छात्रावास के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. समाचार पत्रों की सूचना के अनुसार उसने लाटरी की रकम पाने के लिये 4 लाख रुपये कर्ज लिया था. कथित लाटरी देने वालों की ओर से उसे 50 लाख रुपये की रकम दिये जाने का आश्वासन दिया गया था. उनके कहने पर उसने कर्ज में ली गई 4 लाख रुपये की रकम कई बैंकों के खाते में जमा की थी परन्तु न तो उसकी लाटरी निकलनी थी और ना ही वह निकली. अंततः निराश होकर उसने आत्महत्या कर ली.

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मिरोशन ने कुछ माह से नियमित डायरी लेखन किया था जिसमें इस संबंध में अपनी व्यथा और गरीबी की स्थिति को दर्ज किया था. लेकिन उसकी व्यथा-कथा पर जाने से पहले एक सवाल बार-बार उठता है कि मिरोशन की आत्महत्या क्या केवल गरीबी की आत्महत्या है या कुछ और भी इसके कारक हैं ?

दरअसल मिरोशन की आत्महत्या के पीछे बगैर परिश्रम के, बगैर किसी उपक्रम के पैसा कमाने की इच्छा, उसका लालच भी कारण है. उसने जो कर्ज लिया, अपनी निजी जरूरत के लिये नहीं बल्कि 50 लाख की लाटरी पाने के लालच में लिया और यह लाटरी, एक प्रकार से नये समाज, नई सभ्यता का जुआ है तथा इसी सभ्यता की ही पैदाईश है.

आज छोटी सी रकम की टिकिट पर बड़ी बड़ी राशियों के पुरस्कार गरीबों और नवयुवकों को प्रलोभित करते हैं. कुछ समय पूर्व तक तो कई राज्य सरकारों की ओर से लाटरी निकाली जाती थी, जिनमें करोड़ों के पुरस्कार होते थे. इस पुरस्कार की रकम और उससे कई गुना रकम लाटरी खरीदने वालों के क्रय शुल्क से जमा हो जाती थी. ये लाटरियां सरकारी खजाने की आय का जरिया थी.

दरअसल इस लाटरी का चलन ही भाग्यवाद और अर्कमण्यता का पर्याय है. पिछले 3 -4 दशकों में जो बाजारू सम्यता का निर्माण हो रहा है, वह इंसान को लालच के समुद्र में डुबा रहा है. बगैर किसी परिश्रम से या कम परिश्रम से करोड़पति और अरबपति बनने की आकांक्षा पैदा करना, इस पूंजीवादी सभ्यता का हथियार है. ऐसे प्रयोगों से जहां एक तरफ व्यक्ति के समक्ष काल्पनिक संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ वह उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करना भूल जाता है, जो उसे गरीब और बेरोजगार बना देती है. इस संभावित आय के लिये वह जो सपनों का जाल बुनता है, वह सपनों का जाल उपभोक्तावाद और बाजारवाद का होता है.

जिनकी लाटरी खुलती है या खुलने की संभावनाओं के सपने देखते हैं, उनकी कल्पना की विवेचना करें कि आखिर वे क्या होती हैं ? उन्हें अपनी गरीबी के दिन मिटते हुए नजर आते हैं. वे बढ़िया मकान बनाने की कल्पना, बीबी को जेवर, हवाई यात्रा, बढ़िया कार जैसे ताने बाने बुनते हैं. याने लाटरी या जुआ उन्हें सपनों से लेकर कर्म तक बाजार का बन्दी बना लेता है.

टी.वी. पर एक कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ आता था, जिसके एंकर एक फिल्मी हीरो, जिनकी चर्चा आयकर चोरी के लिये भी हुई थी, अमिताभ बच्चन थे. इस कार्यक्रम के आरंभिक दिनों में अमिताभ बच्चन की खनकदार आवाज न केवल उत्तरदाताओं के उत्तरों को लॉक करती थी, बल्कि अमिताभ बच्चन के आकर्षण और नजदीकी, कार्यक्रम की भव्यता और पुरस्कार के लालच में उनके दिमाग को भी लॉक कर देती थी. इस कार्यक्रम के आरंभ के दिनो में पुरस्कार की रकम अकसर समाज के श्रेष्ठि वर्ग को मिलता था. इस कार्यक्रम के प्रायोजक देशी-विदेशी कम्पनियों के मालिक थे, जो अमिताभ बच्चन को भी प्रायोजन का पैसा देते थे. टी.वी. पर कार्यक्रम दिखाने का खर्च उठाते थे. उसके लिये अपनी कम्पनी का माल बेचने के बाजार तैयार करते थे.

इस कौन बनेगा करोड़पति को उसके हिस्से का शहरी मध्य वर्ग मिल चुका है. परन्तु उद्योगपतियों और कम्पनी के लिये नया बाजार चाहिये, इसलिये पिछले कुछ पुरस्कार झारखण्ड या बिहार के किसी कस्बाई व्यक्ति के लिये दिये गये हैं. इन चंद पुरस्कारों के बॅंटने से इस कार्यक्रम में हिस्सेदारी करने वाला, उसे देखकर विज्ञापन के माध्यम से बाजार बनने वाला, एक नया हिस्सा तैयार हुआ है. याने अब इस कार्यक्रम के माध्यम से बाजार की पहुंच छोटे-छोटे कस्बों तक हो गई है. पहले जो करोड़पति बनने का सपना शहरी मध्यवर्ग के सीने में उगाया गया था, वह अब दूर दराज के ग्रामीण कस्बों के मन में उगाया जा रहा है.
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