मज़दूर वर्ग और साम्राज्यवादी युद्ध
विचार
मज़दूर वर्ग और साम्राज्यवादी युद्ध
यॉन मिर्डल
नोबल पुरस्कार विजेता गुन्नार मिर्डल के बेटे स्वीडिश लेखक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता यॉन मिर्डल इन दिनों भारत के दौरे पर हैं और विभिन्न स्थानों पर आम जनता को संबोधित कर रहे हैं. लगभग 80 किताबों के लेखक और जनपक्षधर लेखन के लिये विख्यात 82 साल के यॉन मिर्डल का जेएनयू में दिया गया यह वक्तव्य हमारे समाज की संरचना की परतों की नये तरीके से पड़ताल है.
सबसे पहले यह कहना जरूरी है कि मैं बोल रहा हूं तो किसकी ओर से. मैं कम्यूनिस्ट
हूं. मगर अभी 60 साल होने जा रहे हैं कि मैं एक गैर-पार्टी कम्युनिस्ट रहा हूं.
इसके कारणों की चर्चा मैं अपनी अनेक पुस्तकों में कर चुका हूं. मतलब यह कि मैं खास
किसी संगठन का प्रवक्ता नहीं हूं, जिसे कि मेरी उन बातों के लिए जिम्मेदार माना
जाये, जो मैं आपके सामने यहां रखने जा रहा हूं.
अभी कुछ ही समय हुआ है कि मैंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के आमंत्रण पर
दण्डकारण्य के छापामार ज़ोन के अपने दौरे पर केंद्रित अपनी पुस्तक रेड स्टार ओवर
इंडिया - ऐज़ द रेचेड ऑफ दि अर्थ आर राइजि़ंग प्रकाशित की. इसमें मैंने विवरण दिया
है कि कैसे जंगलों से होते हुए लंबी यात्रा तय करने के बाद जब रात में हम
दण्डकारण्य के एक कैंप में पहुंचे और हाथ में चाय का प्याला थाम चुके थे तो जंगल के
बीच से एक टोली निकलकर हमारी ओर चलती दिखाई दी. कुछ समय बाद मुझे पता चला कि ये
भाकपा (माओवादी) के महासचिव गणपति और उनके कॉमरेड हैं.
फिर उनके साथ हुई चर्चा में मैंने अपने अनुभवों से कुछ सुनाने की कोशिश की. दोनों
तरह के अनुभव थे- सकारात्मक और नकारात्मक. स्वीडन जैसे छोटे से साम्राज्यवादी मुल्क
में युद्ध और साम्राज्यवाद के खिलाफ एक सदी से भी ज़्यादा समय से किये गये राजनीतिक
कार्यों के अनुभव. उस सभा में हमने दुनिया के हमारे हिस्से के मौजूदा हालात पर कुछ
और ओपचाहिक चर्चा की. गहराते आर्थिक और सामाजिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और सषक्त
किन्तु मुख्यतः स्वतःस्फूर्त लोकप्रिय जनसंघर्षों के बारे में.
वहां सरकारों की विध्वंसकारी आर्थिक नीतियों और पारराष्ट्रीय पूँजी का विरोध करने
वाले तरह-तरह के नये संगठन हैं जो ज़्यादातर इंटरनेट के जरिये बनने वाले संपर्कों
से बने हैं. ये संगठन सरकारों के मौजूदा और आगामी नीतिगत हमलों के खिलाफ ताकत के
मामले में कितने कारगर सिद्ध हो पाते हैं, यह तो समय ही बता पायेगा. फिलहाल संगठनों
का यह ढीला-ढाला रूप सरकारी दमन से अपनी रक्षा करने में कारगर है. मगर साथ ही साथ
इससे सचेत किस्म की सामूहिक कार्रवाई असम्भव हो जाती है. लगभग आधी सदी से, जब से
अन-औपनिवेशीकरण कम से कम औपचारिक तौर पर शुरू हुआ, तब से हमारे यहां के देशों से
समर्थन जुटाने वाले अनेक संगठन खड़े हुए हैं. किस्म-किस्म के संगठन. इनमें से कुछ
वास्तविक और राजनीतिक महत्व के सिद्ध हुए हैं. पार्टी के स्तर पर भी विभिन्न समूह
हैं. इनमें से कई समूह बड़े हिम्मती हैं, लेकिन ज़्यादातर में संकीर्णतावादी कमियाँ
पाई जाती हैं और ये अभी तक तो मजदूर वर्ग और उसके संश्रयकारियों तक अपनी पहँुच नहीं
बना पाये हैं.
तथाकथित ‘वामपंथ’ की पारंपरिक और आधिकारिक पार्टियों, सामाजिक-जनवादी, लेबर और
भूतपूर्व कम्युनिस्ट पार्टियों की बात करें, तो वे मजदूर वर्ग को बेहाल कर देने
वाले आज के संकट के विरुद्ध कोई पारंपरिक किस्म की सुधारवादी नीति तक नहीं बना पाई
हैं.
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि स्वीडन की भूतपूर्व कम्युनिस्ट पार्टी की ही
तरह इन सभी की आर्थिक पूर्ति भी राज्य से होती है. ये संगठन अपने सदस्यों के योगदान
से नहीं चलते. यही वजह है कि अपनी संरचना के स्तर पर ही इन संगठनों में वह
सामर्थ्यनहीं रह गया है कि वे साम्राज्यवाद के नये युद्धों को जबानी समर्थन देने से
ज़्यादा कुछ भी करें. विचारधारात्मक रूप से भी इन्होंने खुद को पूरी तरह शस्त्रहीन
बना दिया है. आर्थिक कारणों से अखबार पत्रिकाएँ और पुस्तक बिक्री केंद्र बन्द कर
देने के साथ ही इन्होंने अपना सैद्धांतिक अध्ययन भी बंद कर दिया है. फिर वे
पारंपरिक किस्म के सुधारवादी हों या किसी हद तक क्रांतिकारी. केवल इक्का-दुक्का
सदस्य ही कहीं-कहीं अपने तयीं स्थानीय पैमाने पर अध्ययन-चक्रों को जीवित रखे हुए
हैं. राज्य द्वारा पोषित ये कार्यकर्ता और बाकी सदस्य इस प्रकार विचारधारात्मक रूप
से मोटे तौर पर नारीवादी और हद से हद कहा जाये तो क्रांतिपक्षी हैं.
इनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनके पार्टी संगठन में साम्राज्यवादी समूहों की घुसपैठ हो
चुकी है या आंशिक तौर पर उनकी गिरफ्त में आ चुके हैं. पचास के दषक में ‘समाजवादी
इंटरनेशनल’ के संगठनों के साथ सी.आई.ए. ने ऐसा ही कर रखा था. पिछले साल गर्मियों
में जर्मनी में ऐसा ही एक उदाहरण सामने आया जब Bundesarbeitskreises Shalom der
Linksjugend नामक युवा आंदोलन (‘द लिंके’ नामक एक संसदीय राजनीतिक पार्टी की एक
संघ-स्तरीय युवा शाखा) के अन्दर बड़ी फूर्ति से काम कर रहे कुछ शियनवादी एवं
इज्राइल से प्रेरित धड़ों ने उसके संसदीय समूह को अपने काबू में कर लिया. इन धड़ों
को फिलिस्तीन से आये युवाओं को काम दिलाने जैसे कामों को पार्टी-विरोधी करार देने
में सफलता मिली और अब इस साल सर्दियों के दौरान ‘‘पार्टी-विरोधी आचरण’’ की परिभाषा
में इन्होंने साम्राज्यवादी युद्ध का मुकाबला कर रही सीरिया और ईरान की जनता को
समर्थन देना भी शामिल करा दिया है.
वहां की एक विशेषता यह भी है कि किसी हद तक जनाधार वाले, मुख्यतः उदारपंथी किस्म के
शांतिवादी संगठन, जो कि कभी स्वतंत्र और ईमानदार रहे, या तो बेहद कमजोर हो चले हैं
या फिर ’’मानवतावादी दखल’’ के दायरे में माने जाने वाले कार्यों को ही समर्थन देने
वाले समूहों में तब्दील हो चुके हैं.
अगर आप मेरी वह पुस्तक पढ़ेंगे, तो पायेंगे कि मैंने शुरू से अंत तक इस प्रश्न की
बराबर चर्चा की है. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है. आखिरकार विगत् सत्तर वर्षों से
मैंने इन आंदोलनों को न केवल देखा है, बल्कि इनमें तरह-तरह से भाग भी लिया है. इसके
अलावा मुझे जिन संघर्षों का तजुर्बा है उनमें से ज्यादातर विजयी रहे और कुछ पराजित
भी हुए.
दण्डकारण्य के जंगल में एक रात मैं लेटे-लेटे मन ही मन एक ऐसी रचना का पाठ कर रहा
था जो हमारी हालात का मेरी समझ से बहुत सही चित्रण करती है:
वह An die Nachgeborenen शीर्षक एक कविता है जिसे तीस के दशक में बर्तोल्त ब्रेश्त
ने डेनमार्क में अपने निर्वासन के दौरान रचा था. अंग्रेजी में इसका अनुवाद To
Posterity (आने वाली पीढि़यों के नाम) शीर्षक से छपा है. परंतु जो भी अनुवाद पिछली
पीढि़यों तक की अवधि में साम्राज्यवादी मुल्कों में छपे हैं उनमें इस कविता की सबसे
बहुमूल्य पंक्तियाँ मेरे ख्याल से स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाई हैं:-
“Gingen wir doch, öfter als die Schuhe die Lünder wechselnd
Durch die Kriege der Klassen, verzweifelt
Wenn da nur Unrecht war und keine Empörung”
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इसका शाब्दिक अर्थ दरअसल यह है:
युद्धों से होते हुए चलते रहे हम वर्गों के बीच
मुल्कों को जूतों से भी ज्यादा बदलते हुए -
हताश, कि पाया केवल अन्याय और बग़ावत कोई नहीं.
उन रातों में जब मैं ‘जन मुक्ति छापामार सेना’ के युवा आदिवासी कॉमरेडों के बगल में
अपने स्लीपिंग बैग में पड़े-पड़े जगा रहता, हमारी इसी त्रासद ऐतिहासिक परिस्थिति के
कारणों के बारे में सोचता रहा. पाया केवल अन्याय ओर बग़ावत, कोई नहीं - क्यों है
ऐसा? तथाकथित वामपंथ से जुड़े राजनीतिक आंदोलनों में बीते सौ से ज्यादा सालों से
यही केंद्रीय सवाल रहा है, और आज भी यही सवाल केंद्र में है. यूरोप में 1848 की
क्रांति की पराजय, 1870 में फ्रांस और प्रशा के बीच हुए युद्ध, 1841 के कम्यून के
क्रूरतापूर्ण दमन और 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ जाने के संदर्भ में हम इसी
सवाल पर ठोस रूप से चर्चा करते आये हैं. साम्राज्यवादी राज्यों का मजदूर वर्ग इन
पराजयों और युद्ध को रोक पाने में अक्षम सिद्ध हुआ है. 1914-18 के दौरान उस समय का
मुख्यतः सामाजिक-जनवादी मजदूर वर्ग, लाखों की तादाद में फ्लैण्डर्स में अपनी मौत की
परवाह किये बिना मार्च करता रहा- वैसे ही जैसे बूचड़खाने की ओर चला जाता कोई बछड़ा.
तब से लेकर आज तक के पूरे अंतराल में हमारे मुल्कों में प्रदर्शनों का सिलसिला,
आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष ही आम विशेषता रही है. कई बार बड़ी-बड़ी आंशिक जीत हासिल
हुई. उदाहरण हैं स्वीडन में तीस के दशक में नाज़ी से प्रेरित प्रतिक्रियावाद की
पराजय; 1936 में फ्रांस में ‘पाप्यूलर फ्रंट’ की जीत; पचास के दशक में संयुक्त
राज्य अमरीका की परमाणु युद्ध की योजना को विफल करने वाला शांति आंदोलन;
अंतरराष्ट्रीय स्तर की एकजुटता कायम करनेवाला वह आंदोलन जिसने पचास वर्ष पहले
दक्षिण-पूर्वी एशिया की समूची जनता के खिलाफ युद्ध छेड़नेवाले अमेरिकी
साम्राज्यवादियों के पैरों में सचमुच बेडि़याँ डाल दीं. इन संघर्षों से जनता को जो
भी हासिल हुआ, हमें न तो उसे भूलना चाहिए और न ही नजरअंदाज़ करना चाहिए.
मगर जैसा कि हम सब जानते हैं, हमें कई बार निर्णायक पराजय का भी सामना करना पड़ा
है. जर्मनी में हिटलरी ताकतों का सत्तासीन हो पाना; स्पेन में फ्रांको की जीत;
सोवियत संघ में सत्ता का लाल रंग उतर जाना और फिर अधःपतन और विघटन; और अब, आज के
नये साम्राज्यवादी युद्धों को रोकने के लिए मजदूर वर्ग का संगठित न हो पाना. हमारे
साम्राज्यवादी मुल्कों का मजदूर वर्ग और उसके संश्रयकारी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े
होने में अब तक नाकाम सिद्ध हुए हैं, यह ऐतिहासिक तथ्य हमारे सामने है. त्रासद बात
यह भी है कि वे या तो सक्रिय रूप से या फिर चुप्पी साधकर शासक वर्ग की विध्वंसकारी
नीतियों का समर्थन करते रहे हैं.
लेकिन ऐसा हुआ क्यों? इसका एक उत्तर वह है जिस पर जुलाई 1920 में ‘कम्युनिस्ट
इंटरनेशनल’ की दूसरी कांग्रेस में ‘राष्ट्रीय एवं औपनिवेशिक प्रश्न के लिए आयोग’
में व्लादिमीर इल्यीच लेनिन और मानवेन्द्र नाथ राय ने चर्चा की थी.
एम.एन. राय का कहना था, ‘‘औपनिवेशिक जनता के शोषण के क्रम में यूरोपीय साम्राज्यवाद
अपने यहां के (मेट्रोपोलिटन) सर्वहारा को कई सारे फायदे पहुँचाकर लुभाने की क्षमता
रखता है.’’
अवश्य ही लेनिन यह समझ रहे थे कि यह समस्या बनी हुई है. कुछ ही वर्ष पूर्व जब
विश्वयुद्ध सामने खड़ा हो जाने पर अंतरराष्ट्रीय समाजवादी आंदोलन पतन का शिकार हुआ
था तब इस महाविपदा के विरुद्ध लेनिन ने न केवल सघन रूप से कार्य किया, बल्कि यह बात
भी दर्ज़ की कि:
‘‘हमारे आयोग में इंग्लैंड की समाजवादी पार्टी के कामरेड क्वेल्च ने इस प्रश्न पर
बात रखी थी. उन्होंने यह कहा था कि इंग्लैंड के मजदूरों की आम पाँतें गुलाम मुल्कों
में अंग्रेज शासन के खिलाफ किसी विद्रोह के मौके पर उन मुल्कों की मदद करने को
गद्दारी मानेंगी.’’
लेकिन यह स्थिति सामान्य रूप से ‘‘मजदूरों की आम पाँतों’’ की बन रही है, केवल
‘‘मजदूरों के अभिजनों’’ की ही नहीं, इस बात को लेनिन स्वीकारना नहीं चाहते थे.
वास्तविक समाधान के तौर पर भी नये इण्टरनेशनल का यह राजनीतिक दायित्व माना गया कि
वह इस स्थिति को बदले:
‘‘कम्युनिस्ट पार्टियों के सिर्फ अपने ही देश में नहीं, वरन् औपनिवेशिक मुल्कों में
भी और खास तौर से औपनिवेशिक अवाम को अपनी गुलामी के अधीन दबाये रखने के लिए शोषक
राष्ट्रों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले सैनिकों के बीच किये जाने वाले क्रांतिकारी
कार्यों के महत्व पर मैं बल देना चाहता हूं.’’
पीछे मुड़कर देखने पर मालूम होता है कि लेनिन ने जिस तरह का अंतरराष्ट्रीय
कम्युनिस्ट आंदोलन विकसित करने का प्रयास किया वह इंसानियत के बेहतर भविष्य के लिए
होने वाले संघर्षों के लिहाज़ से बड़ा ही विरोचित था. मगर ‘‘औपनिवेशिक और निर्भर
देशों’’ की समूची जनता के संघर्ष के साथ जिस जुझारू एकजुटता की ज़रूरत थी उसकी
पूर्ति करने में वह आंदोलन कामयाब नहीं हो सका, जैसा कि लेनिन बल देते थे.
इसीलिए 1924 में जब हो ची-मिन्ह ने ‘कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल’ की पाँचवीं विश्व
काँग्रेस के दौरान साम्राज्यी और उपनिवेशवादी ताकतों की कम्युनिस्ट पार्टियों की ओर
से सच्ची एकजुटता के अभाव की आलोचना की, तो उनकी इस बात को ऐतिहासिक रूप से उचित ही
माना जाना चाहिए.
इसके कारणों को समझने के लिए और यह समझने के लिए कि इसका हम सबके एक-समान भविष्य के
लिए क्या तात्पर्य है, पहली जरूरत यह है कि हम कुछ कदम पीछे की ओर लौटें, जिससे कि
हम आज के दौर को विहंगम् दृष्टि से देख सके और फिर इसे करीब से भी देखें.
मार्क्स ने ध्यानपूर्वक यह कहा था कि मैं पहला व्यक्ति नहीं हूं जिसने समझा हो कि
समूचा इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. तब एंगेल्स ने जबकि प्राक्-इतिहास का पहला
ही वास्तविक अध्ययन प्रकाशित हुआ था, अपना यह निष्कर्ष रखा कि मार्क्स का यह कथन
समूचे लिखित इतिहास के लिए सही है. अर्थात् यह वर्ग समाज की शुरुआत हो जाने के बाद
के इतिहास पर लागू होता है.
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वर्ग समाज के सिलसिले से पटे इस पूरे अन्तराल में आप अपनी निगाह रोम साम्राज्य पर
डालें या मुग़ल समाज पर, चाहे गृह-युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमरीका का वह
स्वर्ण-काल देखें या आज के भारत को, आप वर्गों को संघर्षरत ही पायेंगे. और तो और,
आप नाज़ी जर्मनी जैसी कठोर फासीवादी तानाशाही के प्रशासनिक हल्कों का विश्लेषण करने
लगेंगे, जहाँ कि बंदिश और दमन की गाज न केवल कम्युनिस्ट और समाजवादी प्रवृत्तियों
पर, बल्कि उदारपंथी प्रवृत्तियों पर भी गिरती थी, तो भी आप पायेंगे कि कैसे वर्ग
संघर्ष उनकी नीतियों को भी निर्धारित करता था. सभी स्तरों पर. बन्दी शविरों में
कार्यरत जेल के सिपाहियों के भी शासकों के साथ वर्ग हितों के ही अंतर्विरोध होते
हैं.
मार्क्स ने अपने समय में जो समझा वह यह था कि पूँजीवाद के उदय और पूँजीपति वर्ग की
विजय से ‘‘मुक्त‘‘ वेतनभोगियों के बढ़ते वर्ग का निर्माण हुआ - ऐसे सर्वहाराओं का,
जिनके पास जाने के लिए कोई रास्ता नहीं, सिवाय ऊपर उठने का. यही वह स्थिति है जिसमे
उनका संघर्ष लंबे दौर में पूँजीपति वर्ग द्वारा निर्मित समाज की अवधारण के ही खिलाफ
संघर्ष बनता है.
यूरोप में इस उग्र परिवर्तनकारी चुनौती को बारहवीं और सत्रहवीं सदियों के बीच तब
सूत्रबद्ध किया जाने लगा जब गरीब किसानों ने सामंती अधिकारियों के विरुद्ध बेहद
हिंसक और क्रूरतापूर्ण युद्धों का सिलसिला छेड़ रखा था. इन संघर्षों में अपनी
राष्ट्रीय और धार्मिक जड़ों को सींचते हुए यूरोप के इन गरीब किसानों ने जो
विचारधारा इजाद की थी वह उन्नीसवीं सदी के चीन में ताइपिंग विद्रोह के किसान
क्रांतिकारियों की विचारधारा से मेल खाती है. यह कोई चकित होने वाली बात नहीं है.
समान संघर्षों से समान विचारधाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं.
मैंने अपनी पुस्तक में भी इस बात का उल्लेख किया है - भारत के नक्सलवादी संघर्ष के
दौरान हुए विचारधारात्मक विकास को, इसकी आम तौर पर मार्क्सवादी, माओवादी जड़ों को
और इस क्रांतिकारी व्यवहार के जरिये सिद्धांत को लगातार तराषे जाने के संदर्भ में.
फ्रेडरिक एंगेल्स की निगाह में पांच सौ साल पहले के ये यूरोप के किसान-युद्ध
प्राक्-क्रांतिकारी युद्ध थे; इनका अंजाम पराजय ही हो सकता था. हम अगर इनकी तुलना
मजदूर वर्ग के वर्तमान युद्धों के साथ के साथ करें, तो अवष्य ही इनके लक्ष्य सीमित
कहलायेंगे. लेकिन स्वीडन और स्विट्जरलैंड में जो किसान-युद्ध हुए वे बड़े सफल रहे
और इन मुल्कों में समाज की रचना जिस प्रकार हुई वह यूरोपीय महाद्वीप पर आम तौर पर
उभर आने वाली समाजिक संरचनाओं से काफी भिन्न रही.
यह बात कि दौर विशेष के अपने दायरे को लाँघना सम्भव नहीं होता, जैसा कि हेगेल ने
लिखा है, सच ही है. ऐसा करना अपनी साया से भागने की कोशिश करने के समान होगा.
परन्तु इस परिप्रेक्ष में वर्तमान को समझना संभव है, यह पता लगाने के लिए कि हमारे
वर्तमान दौर की कुछ विशेषताएँ दरअसल किस जमाने की हैं.
मार्क्स ने कभी भविष्य की कोई रूपरेखा नहीं सुझायी. इससे ज़्यादा अहम् यह है कि,
जैसा कि एंगेल्स ने बताया है, मार्क्स के लेखन में परिभाषाएँ नहीं दी गई हैं.
उन्होंने विकास-क्रम ही दर्शाया है. यदि हम इतिहास के किसी दौर की बात करें, मिसाल
के तौर पर 1848 के यूरोप की या 1944 के भारत की, तो हम जो कुछ घटा था उसका वर्णन कर
सकते हैं और (अधिक मशक्कत करने पर) यह बता सकते हैं कि वैसा क्यों हुआ. इसके बाद हम
इसके कारणों को उजागर कर सकते हैं. लेकिन उस वक्त घटनाओं का जो सिलसिला देखा गया वह
कोई निर्धारित या अटल नहीं था. धार्मिक शब्दावली का प्रयोग करें, तो उसकी नियती तय
नहीं थी. उस वक्त के दायरे में जितनी संभावनाएँ मौजूद थीं उनसे तमाम सारे रास्तों
से घटनाएँ विकसित हो सकती थीं. इसी को दूसरे शब्दों में यूँ कह सकते हैं कि ऐसा
नहीं है कि इंद्रलोक में कोई शास्त्र रचे गए हों जिनमें वह सब कुछ लिखा हुआ मिले जो
आगे होने वाला है. मनुष्य खुद ही खुद को बनाता है और लगातार अपने इतिहास को रचता
चला जाता है. और मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ भी कहीं से ‘‘प्रेरित’’ होकर धरती पर
नहीं टपक पड़े थे; उन्होंने जो कुछ लिखा वह अपने दौर की संभावनाओं को लेकर था और
उन्होंने कार्य भी किये.
इतिहास यानि कि जो कुछ घटा है, उसका भी लगातार आकलन-मूल्यांकन होता रहता है. यह
कहानी अविश्वसनीय लग सकती है कि जब चाओ एन-लाई को फ्रांसीसी क्रांति के बारे में
बोलने को कहा गया, तो उनका जवाब था कि अभी इसका समय नहीं आया है. मुझे इस बारे में
उनसे पूछना चाहिए था, पर कभी नहीं पूछ पाया. पर वे सही कह रहे थे.
इसी प्रकार, इतिहास का अंत नहीं हो सकता. (यह दीगर बात है कि इंसानियत का अंत हो
सकता है, क्योंकि मेरे जीवन का अंत तो निश्चित ही है.) यह कहा जा सकता है कि
समाजवाद से हमारे समाज के प्राक्-इतिहास का अंत हो जाएगा और शुरुआत होगी सचेत
इतिहास की. लेकिन इससे कोई बहुत बड़ा सौहार्द कायम हो पाएगा, ऐसा नहीं है. इस तरह
का कोई सतत स्थायित्व या सौहार्द की अंतहीन अवस्था हो नहीं सकती. वर्गों के बीच
टकराहट तभी खत्म हो पाएगी जब वर्ग नहीं रह जायेंगे. लेकिन जैसा कि माओ का कहना था,
टकराव जारी रहेंगे. दस हजार वर्ष तक भी .
ये बातें आज के विषय से कोई भटकाव नहीं हैं. जवाबों के करीब पहुँचने का यह एक तरीका
है. क्योंकि सवाल है कि इस वर्तमान एतिहासिक दौर में मजदूर वर्ग और उसके
संश्रयकारियों के अनुभव क्या रहे हैं? ओर हम यहां किन युद्धों की चर्चा कर रहे हैं?
1914 में जब साम्राज्यवादी युद्ध हकीकत में छिड़ गया, तो आधिकारिक तौर पर,
शक्तिशाली ‘दूसरे इंटरनेशनल’ का (जिसने कि बेसल में 1912 की अपनी असाधारण कांग्रेस
में आसन्न युद्ध का सटीक अनुमान लगा लिया था). ऐसा पतन हो गया मानो वह ताश के
पत्तों से बना रहा हो. दशकों तक क्रांतिकारी लफ़्फ़ाज़ी करने वाले नेतृत्वकारी काडर
एक सिरे से शासक वर्ग के साथ को-आॅप्ट कर लिये गये और पूँजीपति वर्ग के हाथ की
कठपुतली बनी उस वक्त की लोकप्रिय संस्कृति की लोरी सुनाकर आम लोगों को असम्पृक्तता
की नींद सुला दी गयी. और इसके बदले उन लोगों को मिली सामूहिक मौत.
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व्यवहार में जो कुछ हिटलरी जर्मनी में घटा और बाद में, उत्तरी अफ्रीका में दूसरे
विश्वयुद्ध के बाद के अन-औपनिवेशिकरण के दौरान जो कुछ फ्रांस की बड़ी कम्युनिस्ट
पार्टी में हुआ, उससे एम.एन. राय और इंग्लैण्ड की समाजवादी पार्टी के कामरेड
क्वेल्च का पक्ष पुष्ट हुआ.
अब 'सार' की बात देख लीजिए! 1920 से ‘लीग आफ नेशन्स’ के प्राधिकार में रह चुके
'सार' की जनता ने 13 जनवरी 1935 को मतदान किया. चुनाव अंतरराष्ट्रीय निगरानी में
संपन्न हुए थे. जनता ने जर्मनी के साथ पुनः एकीकृत हो जाने और ‘लीग आफ नेशंस’ के
प्राधिकार के तहत स्वतंत्र रहने के बीच चुनाव करना था.
30 जनवरी 1933 को हिटलर के राइशस्कान्ज़लर के रूप में माशट्यूबरनाम के समय से (यानि
जब से हिटलर को जर्मन साम्राज्य के चान्सलर के रूप में सत्ता-हस्तान्तरण हुआ) तब से
उस नये जर्मनी अर्थात् तीसरे राइश में बढ़ते आतंक के चलते ट्रेड यूनियनों के
कार्यकर्ता, समाजवादी, कम्युनिस्ट, बुद्धिजीवी और यहूदी लोग भागकर सीमा पार सार में
बस आये थे.
सार में मजदूर वर्ग की पार्टियाँ कमज़ोर नहीं थीं. मतदाता हर सूचना से वाकिफ थे.
जर्मनी में उठ रही नाज़ी आतंक की लहर की जानकारी आम थी. बंदी शिविरों, जून 1934 की
‘‘तलवारों की रात’’ के दौरान हत्याओं, यहूदियों के विरुद्ध नस्ल-आधारित नरसंहारों,
आदि सभी घटनाओं के समाचार सर्वविदित थे. फिर भी 13 जनवरी 1935 को अंतरराष्ट्रीय
निगरानी के तहत हुए स्वतंत्र चुनावों में 90.3 प्रतिशत सार वासियों ने हिटलर के
पक्ष में वोट डाले. इसका कारण किसी किस्म का कोई ट्यूटोनी राष्ट्रवाद नहीं था. कारण
विशुद्ध रूप से आर्थिक ही था. आगामी युद्ध के लिए पैसों के नोट छाप-छापकर और तेज़ी
के साथ अपने शस्त्रों का जखीरा फिर से पाट देने की मुहीम चलाकर हिटलर की सरकार ने
जर्मनी में बेरोजगारी 1933 में 26.3 से घटाकर 1934 में 9 प्रतिशत तक पहुँचा दी थी.
(जैसे-जैसे युद्ध की तैयारियाँ आगे बढ़ीं, बेरोज़गारों की संख्या घटती चली गई -
1935 में 11.6 प्रतिशत, 1934 में 8.3 प्रतिशत, 1937 में 4.6 प्रतिशत, 1938 में 2.1
प्रतिशत) मज़दूर वर्ग और उसके संश्रयकारियों ने, उन कई सारे भूतपूर्व कम्युनिस्टों
और समाजवादियों को छोड़कर जो हिटलर पर थोड़ा-थोड़ा संदेह करते रहे, उसका इसलिए
समर्थन किया कि जर्मनी में सबको रोज़गार और समाजिक सुरक्षा हक़ीक़त बनने लगी थी और
स्कैंडिनेविया के समाजिक-जनवादी मुल्कों की तरह श्रमिकों के हित में कानून पारित
किये गये.
बेशक नाजि़यों का प्रतिरोध करने वाले कम्युनिस्टों और समाजवादियों पर (उदारपंथियों
और इसाइयों पर भी) और किसी भी सामाजिक मान्यता या हैसियत वाले यहूदियों का आतंक का
कहर अपनी पूरी क्रूरता के साथ टूट पड़ता था, लेकिन चुप्पी साधकर सामान्य तरीके से
जीते चले जाने वालों के लिए तीसरे राइश के अधीन जीवन पहले से बेहतर हो गया था.
बच्चों और माता-पिता को ठीक-ठाक और व्यवस्थित छुट्टियाँ मिल पाती थी. निस्संदेह उस
वक्त राजनीतिक वजहों से हमने इस बारे में कुछ नहीं लिखा. (युद्ध के दौरान तो हमने
ये कहानी भी रची थी कि आस्ट्रिया, जहाँ कि खौफ़नाक़ नाजि़यों का गढ़ कायम हो चुका
था, नाजि़यों के ‘‘आधिपत्य वाला मुल्क’’ रहा).
लेकिन मुझे स्वयं यह याद आता है कि कैसे सार के चुनाव नतीजे से मेरे अपने माता-पिता
और अन्य सामाजिक-जनवादियों जैसे लोगों को झटका लगा था. इसी चुनाव के कारण
‘कामिन्टर्न’ और सोवियत विदेश नीति, दोनों ही में बदलाव करना पड़ा था. जर्मनी में
पराजय के लिए जिम्मेदार पहले से संकीर्ण नीति को बदलने के लिए ‘कामिन्टर्न’ में
संघर्ष हुआ. प्राग में गोगानानग्राफिक जैसी पत्रिकाएँ, जो अभी तक इस तरह का लेखन
करती आई थीं मानो जर्मनी में इन्क़लाब की घड़ी करीब आ गई हो और अर्द्ध-सैनिक बल
‘एस.ए.’ व नाज़ी पार्टी ‘स्टूरमाबटाईलुंग’ भी हिटलर की विरोधी हो जाने वाली हो, अब
हक़ीक़त से ज्यादा मेल खाने वाले लेख छापने लगी थीं.
नाज़ी जर्मनी से खतरा उत्पन्न होने पर सोवियत विदेश नीति की दिशा बदल गई थी. पियेर
लावाल को मास्को आमंत्रित किया गया और 2 मई 1935 को फ्रांस और सोवियत संघ के बीच
परस्पर सहयोग की संधि तय हुई. फ्रांस की प्रेस में फ्रांसीसी पार्टी की विशुद्ध
सैन्य-विरोधी रणनीति का विरोध करते हुए पियरे लावाल का यह बयान छपा कि ‘‘श्रीमान्
स्तालिन राष्ट्रीय सुरक्षा की फ्रांसीसी नीति को समझ रहे हैं और वे उसका पूरा-पूरा
अनुमोदन करते हैं.’’
हम सभी यह जानते हैं कि आक्रमणकारी राज्यों जर्मनी, इटली, जापान के खिलाफ व्यापक
फासीवादी मोर्चा गठित करने के प्रयास सफल नहीं हो पाए थे. इस बात से यह तो नहीं
सिद्ध हो पाता कि इंग्लैण्ड और फ्रांस की सरकारों में इसके लिए इच्छाशक्ति नहीं थी,
बल्कि इसके विपरीत उनकी मुख्य दिलचस्पी उनके इन दुश्मनों को तुष्ट करने में थी,
जिससे कि हिटलर को और खुद उनको भी सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध में खुलकर उतरने का
अवसर मिल सके. फासीवाद के विरुद्ध व्यापक मोर्चे की विफलता के लिए इन्हीं
साम्राज्यवादी राज्यों में मज़दूर वर्ग को साझे मोर्चे में लामबंद कर पाने में
वास्तविक विफलता ही जिम्मेदार थी.
इस तरह के राजनीतिक नजरिये का हमारे सामने उदाहरण एक यह है कि कैसे भारतीय
स्वतंत्रता के प्रति इंग्लैण्ड के मज़दूर वर्ग का समर्थन कमज़ोर रहा; इंग्लैण्ड में
आम जनता में व्याप्त भावनाएँ वैसी ही रहीं जैसे बाद की पीढ़ी के देखादेखी अल्जीरिया
की स्वतंत्रता के प्रति फ्रांस में थी.
लोकतांत्रिक साम्राज्यवादी मुल्कों में मजदूर वर्ग के बहुत बड़े हिस्से की यही
समझदारी बन गई थी कि उपनिवेशवाद उन्हें भौतिक लाभ दे रहा है, लेकिन आगे चलकर जो हुआ
वह इससे भी बुरा था. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन अधिकारियों ने ऐसे इंतज़ाम
किये थे कि कोई साधारण सिपाही भी स्वयं लूटपाट कर अपनी जेबें भर सके. हरमन ग्वेरिंग
ने इसका विशेष ध्यान रखा हुआ था. किसी अधिकृत देश में तैनात किया गया कोई सिपाही
वहां की जनता से जो कुछ भी ऐंठ ले उसे साधरण डाक से ही सीधे अपने घर भेज सकता था.
साथ ही, जर्मन राज्य ने अधिकृत मुल्कों का शोषण तो किया ही, पर इस कमाई का एक छोटा
हिस्सा सीधे अपनी जनता में बाँटा भी. जर्मनी के इर्द-गिर्द अधिकृत किये जाने वाले
मुल्क जहाँ गरीबी और भुखमरी की चपेट में फँसते चले जा रहे थे, वहीं जर्मनी की जनता
यूरोपीय महाद्वीप के किसी भी दूसरे हिस्से की जनता से ज़्यादा बेहतर जीवन जीने लगी
थी. लूटपाट को संस्थागत रूप दिया गया था, जिससे कि जर्मन लोगों का जीवन-स्तर शासक
नस्ल के ऊँचे स्तर पर रहे. (बरसात की बौछारें मुर्गी की पीठ को तो भिगो देती हैं
मगर उसके चूजों पर तो बूँदे रिस-रिसकर ही गिर पाती हैं).
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मेरा तो यह पक्का मानना है कि अगर जर्मनी में 1945 के शुरुआती दिनों में ही
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो जाते, तो हिटलर को स्पष्ट बहुमत ज़रूर मिल जाता. उस
वक्त उसके प्रचार का बड़ा असर था. उन्नत किस्म के ‘‘कमाल के हथियारों’’ पर आम तौर
पर लोगों के मन में विश्वास था. सेना में भर्ती हुए प्रायः हर जवान को पूरब के
सफ़ाई अभियानों के जरिये हाथ साफ़ कर लेने और नाजि़यों के युद्ध अपराधों में अपने
हाथ खून से रंग लेने के निर्देश दिये गये थे. नतीजतन ऐसे कामों में शरीक रहे
आदमियों को डर था कि यदि हिटलर हार जाये, तो नई सरकार की बदले की कार्रवाइयाँ उन पर
कहर बरपा सकती हैं. मित्र देशों द्वारा की गई हवाई बमबारी के दौरान नागरिक बड़ी
तादाद में मार दिये गये थे. (जबकि जर्मन युद्ध-सामग्री को कोई खास नुकसान नहीं
पहुँचा था). हवाई बमबारी का शिकार होने वालों के लिए नाज़ी पार्टी द्वारा चलाई जा
रही सहायता सेवा बेहतरीन किस्म की रही. (इस विषय में अधिक जानकारी
विक्टर-क्लेम्पेरेर की डायरियों से मिल सकती है).
नाज़ी शासन में जनसंहारों को अंजाम दिया गया. अपराधों की भयावहता ज़रा भी काल्पनिक
नहीं थी. पर साथ ही साथ जो वैचारिक पाठ पढ़ाये जाते थे, उनका भी बड़ा असर था. इसके
अलावा सेना में कार्यरत आम जर्मन लोगों द्वारा भयानक अतिरेकी कार्रवाइयों में
साझीदार बन जाने के साथ ही जनता का आम जीवन-स्तर भी अधिकृत मुल्कों का दोहन किये
जाने के कारण अपेक्षाकृत ऊँचा उठा हुआ था. इस पूरे दौर में बुद्धिजीवी और नौकरशाह
किस्म के अभिजन, जो कि कई बार नाजि़यों की भोंडी हरकतों से नफरत करते थे, आम जनता
से ऊँचे जीवन-स्तर से लाभान्वित थे. इसी नाते बाद में जब नाज़ी शासक गिर चुका था और
फिर से जर्मन राज्य मध्य यूरोप की प्रभुत्वशाली ताक़त बन उभरा, तो वे उन
दिशा-निर्देशों के रचयिता बने जिनकी बदौलत यूरोपीय संघ की वर्तमान संरचना तैयार
हुई. इन उच्च-वर्गीय जर्मन अभिजनों की दरअसल उस युद्ध में कभी हार हुई ही नहीं थी.
यही थी वह परिस्थिति जिसमें बाद में सोवियत अधिकृत क्षेत्र में, जो कि बाद में
जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य बना, कम्युनिस्टों और अन्य नाज़ी-विरोधियों का राजनीतिक
कार्य बहुत मुश्किल हो गया. पचास के दशक की शुरुआत में मैंने युद्ध के दौरान मिले
कुछ बहुत ही स्पष्टवक्ता कामरेडों के साथ इस पर चर्चा की थी. पश्चिम जर्मनी के
हालात निश्चय ही इससे भिन्न थे. वहां आदेनाॅएर के काल में सत्ता फिर से पुराने
नाज़ीपंथियों के हाथ में चली गई थी. तब कम्युनिस्टों और मुझ जैसे लोगों को मात्र
लीक से हटकर सोचने और लिखने पर जेल हो जाती. जब मैं पश्चिम जर्मनी में ट्रेन से सफर
कर रहा होता, तो ध्यान रखता कि जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य से लाये गये अखबार और
अन्य सामग्री सहयात्रियों की निगाह से बची रहे. आज आर्थिक संकट गहन से गहनतर होता
जा रहा है. युद्ध के बाद के वर्षों में सुधारवादियों ने जनता को जिस कारपोरेट
समझौते के मार्फत सुरक्षा प्रदान किये जाने के प्रति आश्वस्त कर रखा था, वह अब
तितर-बितर हो चुका है. अमरीका में भी इसके खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं. यूनान
और स्पेन जैसे मुल्कों में, जो कि इस संकट की बड़ी बुरी मार झेलने के साथ ही
यूरोपीय संघ के नये हमलों का शिकार भी हैं, विरोध अवश्य ही हिंसक मोड़ ले रहा है.
वहां बेरोज़गारी की दर जर्मनी में 1932 के वाइमार गणराज्य के स्तर तक पहुँच रही है.
बदहवासी का आलम है. लोग संघर्षरत हैं. मगर संगठित नहीं हैं. यूरोप में अगर कोई एक
राजनीतिक शक्ति आज कमान संभालने को तैयार है और इसका सामर्थ्य रखती दिखाई दे रही
है, तो वह 1930 के शुरुआती वर्षों की ही तरह चरम दक्षिणपंथी हैं, जो कि अच्छी तरह
संगठित भी हैं. ल पेन की बेटी आज ‘फ्रंट नास्योनाल’ पार्टी में उन प्रश्नों को
उठाती है जो जनसाधारण के करीब हों, जबकि फ्रांस का वामपंथ अब वर्ग की भाषा बोल भी
नहीं पाता है और इस भ्रष्ट राज्य एवं उसकी पतनशील अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की
जरूरत को व्यक्त करने के लिए मुँह खोलने का साहस भी नहीं कर पाता है.
जिस परिस्थिति का मैं यहां बयान कर रहा हूं वह कोई नई नहीं है. उत्तर अमरीका के मूल
निवासी इंडियनों के जनसंहार को आधुनिक कानूनी दायरा प्रदान करने के तौर 28 मई 1830
को राष्ट्रपति ऐन्ड्रू जैक्सन ने ‘इन्डियन रिमूवल एक्ट’ (इंडियनों को हटाने के लिए
कानून) पर दस्तखत किये थे. इस कानून को भारी समर्थन मिला था, इसलिए कि इससे जमीनें
हासिल करने का रास्ता साफ हो गया था.
बाद के दशकों में इन्हीं जमीनों को लेकर बड़ी तीखी लड़ाइयाँ भी लड़ी गईं और ये
बढ़ती भी गईं - यूरोप से आ बसने वाले प्रवासियों और गुलामी-व्यवस्था चलान वाले उन
राज्यों के बीच जिनको कपास की खेती के लिए इसलिए अधिक जमीन की जरूरत थी कि पहले की
जमीनें अधिक दोहन किये जाने के कारण ऊसर हो चली थीं. (मसलन जार्जिया की जमीनों पर
कपास की खेती के बजाये गुलामों को पालने के लिए स्टड फार्म बना दिये जा रहे थे). यह
मामला गृह-युद्ध के दौरान 1862 के ‘होमस्टीड एक्ट’ के जरिये तय कर लिया गया था, जिस
पर अब्राहम लिंकन ने 20 मई 1862 को अपने दस्तखत किये थे. इससे 21 साल का कोई आदमी,
श्वेत हो या आजाद हो चुका गुलाम, जिसने संयुक्त राज्य अमरीका के विरुद्ध कभी हथियार
न उठायें हों, संघीय भूमि अनुदान का दावा करने का अधिकारी हो जाता था.
इस कानून को प्रगतिशील समझा गया. इससे यूरोप की निरंकुशशाही से पलायन करने वालों को
प्रवास में नया जीवन शुरू करने का अवसर मिल रहा था. इसी कानून से स्वतंत्र किसानों
का वर्ग वह पैदा हुआ जो गृह-युद्ध में उत्तर की विजय के फलस्वरूप उभरने वाले
गणराज्य का स्तंभ बना. लेकिन साथ ही साथ यह कानून जमीन कब्जाने वाली उस जनसंहारक
नीति का एक पड़ाव भी था जिसका अंत 29 दिसंबर 1860 को ‘वूण्डेड नी’ (घायल घुटना)
नामक स्थान पर सामूहिक हत्याकांड के साथ हुआ. इसी घटना से उन तथाकथित इण्डियन मूल
निवासियों ने, जिनकी की जमीनें कब्जाई जा चुकी थीं, अपना स्वतंत्र प्रतिरोध छेड
देने के फैसला कर लिया.
हमारे लिए यह बात प्रासंगिक है. उन्नीसवीं सदी के बाद के हिस्से और बीसवीं के पहले
हिस्से के दौरान अमरीका में बड़े महत्वपूर्ण वर्ग-संघर्ष छिडे थे. ‘प्रथम
इंटरनेशनल’ वहां एक सशक्त राजनीतिक ताकत रहा. उन्नीसवीं सदी में साठ के दशक से लेकर
हाल-फिलहाल तक व्यापक आधार वाली ट्रेड यूनियनें और मजदूर वर्ग के संगठन बार-बार
पूँजीवादी समाज के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए खड़े होते रहे हैं. बार-बार इन
संगठनों को ध्वस्त भी किया गया. संयुक्त राज्य अमरीका के मजदूर आंदोलन का अपना
बहादुराना इतिहास रहा है और जिसका अध्ययन किया जाना चाहिए.
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लेकिन हमें यह समझ लेना होगा कि इन आंदोलनों को संभव बनाया था उन्हीं नरसंहारों ने.
यूरोप में पराजय के बाद आ बसे क्रांतिकारी शरणार्थी अपने बिरादरों को, मजदूरों को
समाजवाद के लिए संगठित करने में लग जाते, एक ऐसे मुक्त पूँजीवादी जनवाद में जो मूल
निवासियों की बेदखली और हत्याओं के परिणामस्वरूप खड़ा हुआ था.
साम्राज्यवादी मुल्क आज उन्नीस सौ तीस के दशक के शुरुआती वर्षों के बाद, सबसे बुरे
आर्थिक और राजनीतिक की जद में हैं. इन पंक्तियों को लिखते वक्त 1939 में भयानक
पराजय को झेल चुके स्पेन की जनता की बेरोज़गारी की दर 21.5 प्रतिशत, जो कि जर्मनी
में 30 जनवरी 1933 को वाइमर गणराज्य के अंत और हिटलर द्वारा सत्ता हथियाने के समय
की दर के करीब है. लेकिन एक फर्क है. 1933 में जर्मनी में मज़दूर वर्ग के जो संगठन
पराजित हुए, वे मजबूत संगठन थे. स्पेन में हमारे यहां के सभी मुल्कों की तरह आज
पुराने संगठन कमजोर मालूम होते हैं और संगठित भी नहीं हैं. भेद भी केवल पारंपरिक
किस्म के नहीं हैं. आव्रजन के जरिये नये-नये एथनिक लोग भी यहां आकर बस गए हैं. पर
मज़दूर वर्ग और उसके संश्रयकारी चुप नहीं हैं, वर्ग-संघर्ष तीखा होता जा रहा है और
जन संगठनों के नये-नये रूप आकार ले रहे हैं. फ़ौरी तौर पर देखा जाये तो अभी कई
रास्ते खुले हैं.
इंग्लैण्ड और फ्रांस की क्या कहें, संयुक्त राज्य अमरीका को ही लें और इन मुल्कों
की पुरानी स्थिति के साथ तुलना करें, जब लगता था कि वे दुनिया पर राज कर रहे हैं,
तो आज वे निश्चित रूप से कागज़ी बाघ ही बने दिखाई देते हैं. लेकिन जैसा कि अध्यक्ष
माओ कहा करते थे, कागज़ी बाघ के पंजों के नाखून बिल्कुल असली होते हैं और यही
साम्राज्यवादी युद्धों में कुछ बदलाव भी ला रहे हैं.
इन पिछले दशकों में हुए नये साम्राज्यवादी युद्धों की तरह अपनी कुछ चारित्रिक
विशेषताएँ उजागर हुई हैं. इन युद्धों और षड़यंत्रों का लक्ष्य यूगोस्लाविया, इराक,
लीबिया जैसे राज्यों को केवल जीत लेना ही नहीं, इनको बुनियादी तौर पर ध्वस्त कर
देना भी रहा है. अभी फिलहाल ईरान और सीरिया का भी राज्य के रूप में वजूद मिटा देने
का प्रयास होता दिखाई दे रहा है. यह एक नया गुण है.
ये प्राकृतिक संसाधनों और बाजारों पर नियंत्रण कायम करने के लिए किये जाने वाले कोई
सामान्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी युद्ध नहीं हैं. निस्संदेह इसके आर्थिक कारण
हैं, जैसे तेल को लेकर. मगर इस तरह के हित के साथ एक हित और भी जुड़ा है. अब युद्ध
छेड़े जा रहे हैं, उन मुल्कों के राज्य के पूरे ढाँचे को ही नेस्तानाबूद करने के
लिए, जो अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके अधीनस्थ सहयोगियों या प्रतिद्वंदियों की
निगाह में अवरोध हों. अगर आप ईराक युद्ध में अमरीका की कुल आर्थिक लागत और लाभ की
तुलना करें, तो अतार्किक लगने वाले इस तथ्य का खुलासा हो जाता है कि भले ही शासक
वर्ग के कई हिस्सों ने उस युद्ध से खूब चाँदी काट ली हो, संयुक्त राज्य अमरीका को
जो कुल खर्चा उठाना पड़ा है, वह उसके लाभ से कहीं ज्यादा है. फिर भी यह युद्ध
अमेरिकी साम्राज्यवाद को तार्किक लगता है.
साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक युद्ध बड़े ही क्रूर रहे हैं और उनमें सैनिक बड़े
अमानवीय तरीकों से व्यवहार करते रहे हैं, यह कोई नई बात नहीं है. इन पिछली सदियों
में हुए युद्धों में इस तरह के उदाहरण हर किसी ब्यौरे में मिलते हैं. कुछ किस्म के
युद्धों में, औपनिवेशिक युद्धों और गृह-युद्धों में शासक वर्गों ने निर्दयी तरीके
अपनाये हैं. इसे कौन नहीं जानता ?
आप इसे भारत में अच्छी तरह जानते हैं. अंग्रेजों ने जिसे ‘म्यूटिनी’ (सिपाही
विद्रोह) कहा, उसके बाद की उनकी बदले की कार्रवाइयों के बारे में आप पढ़ चुके
होंगे. आज भी जनता के खिलाफ अपने युद्ध में सरकारी बल बलात्कार का प्रयोग
काउण्टर-इन्सरजेंसी हथियार के रूप में करते हैं. इस तरह का संगठित बलात्कार किसी
पौरुषी हवस और यौनिकता का मामला नहीं है. सचेत तौर पर इसका प्रयोग पीडि़त को धूल
चटाने के लिए किया जाता है. पूरे अवाम का गुरूर तोड़ने के लिए.
औपनिवेशिक युद्धों और नाज़ी युद्धों के तौर-तरीकों की विशिष्टता, खास कर पूरब में
यही थी कि इन तरीकों का इस्तेमाल नियमित रूप से किया गया. बलात्कार और यातना
राजनीतिक हथियार भी रही हैं. दूसरी ओर निजी मकसद के लिए बलात्कार ओर यातना और क़त्ल
जैसे कृत्यों की इजाज़त नहीं दी जाती रही है. इनको अपराध समझा जाता है.
नाज़ी-अधिकृत यूरोप में व्यक्तिगत तौर से किसी यहूदी की हत्या करने पर कानूनी तौर
पर दण्डित किया जाता था. बंदी शिविरों में कोई व्यक्ति यदि अपनी वहशी हवस को शांत
करता, तो उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाती थी. इस मामले में हिटलर का रवैया सख्त था.
(हालीवुड फिल्में इस बात से नावाकिफ मालूम होती हैं).
अब बीते दशक में इराक और अफगानिस्तान के अपने युद्धों में अमरीका का नया गुण सामने
आया है. (नाज़ी जर्मनी का) ‘एस.एस.’ अपने कर्तव्य-पालन के तौर पर यातना और बलात्कार
के तरीके अपनाता था. अबू ग़रीब के बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार, अफगानिस्तान में
दुश्मनों की लाशों पर पेशाब किया जाना, ग्वान्तानामो के जल सेना अड्डे में रस्मी
यातना हिटलर के ‘एस.एस.’ से भिन्न किस्म की फ़ौजी संस्कृति के लक्षण हैं.
लेकिन इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है किसी राष्ट्र को ध्वस्त करने का सचेत प्रयास.
इराक़ में अमरीका ने देष का पूरा इतिहास और पूरी विरासत ही जड़ से उखाड़ देने और
रौंद डालने का सोचा-समझा प्रयास किया और बहुत हद तक सफलता भी पाई. विश्व में उच्च
कोटि के अहम् अजायेबघरों एवं पुस्तकालयों की लूट और विध्वंस, सेना के प्रयोग से
दुनिया के सबसे पुराने और सर्वाधिक मूल्यवान ऐतिहासिक स्थलों को जमींदोज किया जाना,
योजनाबद्ध रूप से इराक के बुद्धिजीवियों के प्राण सुखा देना, एक-एक कर मार डालना -
ये सब ऐसे राज्य का नामोनिशान मिटा देने के लिए अपनाई गई नीतियाँ थीं, जिसके अपने
आप विकास कर पाने के लक्षण दिखाई देने पर ये माना जाने लगा था कि वे अमरीका के
क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकता है. संयुक्त राज्य अमरीका उसी तरह के
तौर-तरीके अपना रहा है जो रोम ने कार्थेज के खिलाफ अपनाये थे.
हम इस पर काम कर सकते हैं. हम संगठित कर सकते हैं और हमें ऐसा करना होगा. इस
अन्धकार युग में हम उसी कड़वाहट-भरी आशा के साथ ऐसा कर रहे हैं जिसने यूरोप में
नाज़ी आधिपत्य के दौरान प्रतिरोध के सदस्यों को और चीन में “सब को मार डालो” वाले
जापानी दौर में चीनी देशभक्तों को कम्युनिस्टों और उनके मित्र शक्तियों को गति दी
थी. मंजि़ल साफ़ तौर पर दिखाई दे रही थी, पर हम पक्के तौर पर नहीं बता सकते कि इस
कड़वाहट भरे युग में, जबकि कागज़ी बाघ विध्वंस करने को आमादा हैं, यह संघर्ष कितना
समय लेगा. निकट हो या दूर, आने वाली पीढियाँ इस सवाल का जवाब दे पायेंगी.
12.02.2012, 00.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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