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मज़दूर वर्ग और साम्राज्यवादी युद्ध

विचार

 

मज़दूर वर्ग और साम्राज्यवादी युद्ध

यॉन मिर्डल


नोबल पुरस्कार विजेता गुन्नार मिर्डल के बेटे स्वीडिश लेखक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता यॉन मिर्डल इन दिनों भारत के दौरे पर हैं और विभिन्न स्थानों पर आम जनता को संबोधित कर रहे हैं. लगभग 80 किताबों के लेखक और जनपक्षधर लेखन के लिये विख्यात 82 साल के यॉन मिर्डल का जेएनयू में दिया गया यह वक्तव्य हमारे समाज की संरचना की परतों की नये तरीके से पड़ताल है.

माओवादी


सबसे पहले यह कहना जरूरी है कि मैं बोल रहा हूं तो किसकी ओर से. मैं कम्यूनिस्ट हूं. मगर अभी 60 साल होने जा रहे हैं कि मैं एक गैर-पार्टी कम्युनिस्ट रहा हूं. इसके कारणों की चर्चा मैं अपनी अनेक पुस्तकों में कर चुका हूं. मतलब यह कि मैं खास किसी संगठन का प्रवक्ता नहीं हूं, जिसे कि मेरी उन बातों के लिए जिम्मेदार माना जाये, जो मैं आपके सामने यहां रखने जा रहा हूं.

अभी कुछ ही समय हुआ है कि मैंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के आमंत्रण पर दण्डकारण्य के छापामार ज़ोन के अपने दौरे पर केंद्रित अपनी पुस्तक रेड स्टार ओवर इंडिया - ऐज़ द रेचेड ऑफ दि अर्थ आर राइजि़ंग प्रकाशित की. इसमें मैंने विवरण दिया है कि कैसे जंगलों से होते हुए लंबी यात्रा तय करने के बाद जब रात में हम दण्डकारण्य के एक कैंप में पहुंचे और हाथ में चाय का प्याला थाम चुके थे तो जंगल के बीच से एक टोली निकलकर हमारी ओर चलती दिखाई दी. कुछ समय बाद मुझे पता चला कि ये भाकपा (माओवादी) के महासचिव गणपति और उनके कॉमरेड हैं.

फिर उनके साथ हुई चर्चा में मैंने अपने अनुभवों से कुछ सुनाने की कोशिश की. दोनों तरह के अनुभव थे- सकारात्मक और नकारात्मक. स्वीडन जैसे छोटे से साम्राज्यवादी मुल्क में युद्ध और साम्राज्यवाद के खिलाफ एक सदी से भी ज़्यादा समय से किये गये राजनीतिक कार्यों के अनुभव. उस सभा में हमने दुनिया के हमारे हिस्से के मौजूदा हालात पर कुछ और ओपचाहिक चर्चा की. गहराते आर्थिक और सामाजिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और सषक्त किन्तु मुख्यतः स्वतःस्फूर्त लोकप्रिय जनसंघर्षों के बारे में.

वहां सरकारों की विध्वंसकारी आर्थिक नीतियों और पारराष्ट्रीय पूँजी का विरोध करने वाले तरह-तरह के नये संगठन हैं जो ज़्यादातर इंटरनेट के जरिये बनने वाले संपर्कों से बने हैं. ये संगठन सरकारों के मौजूदा और आगामी नीतिगत हमलों के खिलाफ ताकत के मामले में कितने कारगर सिद्ध हो पाते हैं, यह तो समय ही बता पायेगा. फिलहाल संगठनों का यह ढीला-ढाला रूप सरकारी दमन से अपनी रक्षा करने में कारगर है. मगर साथ ही साथ इससे सचेत किस्म की सामूहिक कार्रवाई असम्भव हो जाती है. लगभग आधी सदी से, जब से अन-औपनिवेशीकरण कम से कम औपचारिक तौर पर शुरू हुआ, तब से हमारे यहां के देशों से समर्थन जुटाने वाले अनेक संगठन खड़े हुए हैं. किस्म-किस्म के संगठन. इनमें से कुछ वास्तविक और राजनीतिक महत्व के सिद्ध हुए हैं. पार्टी के स्तर पर भी विभिन्न समूह हैं. इनमें से कई समूह बड़े हिम्मती हैं, लेकिन ज़्यादातर में संकीर्णतावादी कमियाँ पाई जाती हैं और ये अभी तक तो मजदूर वर्ग और उसके संश्रयकारियों तक अपनी पहँुच नहीं बना पाये हैं.

तथाकथित ‘वामपंथ’ की पारंपरिक और आधिकारिक पार्टियों, सामाजिक-जनवादी, लेबर और भूतपूर्व कम्युनिस्ट पार्टियों की बात करें, तो वे मजदूर वर्ग को बेहाल कर देने वाले आज के संकट के विरुद्ध कोई पारंपरिक किस्म की सुधारवादी नीति तक नहीं बना पाई हैं.

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि स्वीडन की भूतपूर्व कम्युनिस्ट पार्टी की ही तरह इन सभी की आर्थिक पूर्ति भी राज्य से होती है. ये संगठन अपने सदस्यों के योगदान से नहीं चलते. यही वजह है कि अपनी संरचना के स्तर पर ही इन संगठनों में वह सामर्थ्यनहीं रह गया है कि वे साम्राज्यवाद के नये युद्धों को जबानी समर्थन देने से ज़्यादा कुछ भी करें. विचारधारात्मक रूप से भी इन्होंने खुद को पूरी तरह शस्त्रहीन बना दिया है. आर्थिक कारणों से अखबार पत्रिकाएँ और पुस्तक बिक्री केंद्र बन्द कर देने के साथ ही इन्होंने अपना सैद्धांतिक अध्ययन भी बंद कर दिया है. फिर वे पारंपरिक किस्म के सुधारवादी हों या किसी हद तक क्रांतिकारी. केवल इक्का-दुक्का सदस्य ही कहीं-कहीं अपने तयीं स्थानीय पैमाने पर अध्ययन-चक्रों को जीवित रखे हुए हैं. राज्य द्वारा पोषित ये कार्यकर्ता और बाकी सदस्य इस प्रकार विचारधारात्मक रूप से मोटे तौर पर नारीवादी और हद से हद कहा जाये तो क्रांतिपक्षी हैं.

इनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनके पार्टी संगठन में साम्राज्यवादी समूहों की घुसपैठ हो चुकी है या आंशिक तौर पर उनकी गिरफ्त में आ चुके हैं. पचास के दषक में ‘समाजवादी इंटरनेशनल’ के संगठनों के साथ सी.आई.ए. ने ऐसा ही कर रखा था. पिछले साल गर्मियों में जर्मनी में ऐसा ही एक उदाहरण सामने आया जब Bundesarbeitskreises Shalom der Linksjugend नामक युवा आंदोलन (‘द लिंके’ नामक एक संसदीय राजनीतिक पार्टी की एक संघ-स्तरीय युवा शाखा) के अन्दर बड़ी फूर्ति से काम कर रहे कुछ शियनवादी एवं इज्राइल से प्रेरित धड़ों ने उसके संसदीय समूह को अपने काबू में कर लिया. इन धड़ों को फिलिस्तीन से आये युवाओं को काम दिलाने जैसे कामों को पार्टी-विरोधी करार देने में सफलता मिली और अब इस साल सर्दियों के दौरान ‘‘पार्टी-विरोधी आचरण’’ की परिभाषा में इन्होंने साम्राज्यवादी युद्ध का मुकाबला कर रही सीरिया और ईरान की जनता को समर्थन देना भी शामिल करा दिया है.

वहां की एक विशेषता यह भी है कि किसी हद तक जनाधार वाले, मुख्यतः उदारपंथी किस्म के शांतिवादी संगठन, जो कि कभी स्वतंत्र और ईमानदार रहे, या तो बेहद कमजोर हो चले हैं या फिर ’’मानवतावादी दखल’’ के दायरे में माने जाने वाले कार्यों को ही समर्थन देने वाले समूहों में तब्दील हो चुके हैं.

अगर आप मेरी वह पुस्तक पढ़ेंगे, तो पायेंगे कि मैंने शुरू से अंत तक इस प्रश्न की बराबर चर्चा की है. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है. आखिरकार विगत् सत्तर वर्षों से मैंने इन आंदोलनों को न केवल देखा है, बल्कि इनमें तरह-तरह से भाग भी लिया है. इसके अलावा मुझे जिन संघर्षों का तजुर्बा है उनमें से ज्यादातर विजयी रहे और कुछ पराजित भी हुए.

दण्डकारण्य के जंगल में एक रात मैं लेटे-लेटे मन ही मन एक ऐसी रचना का पाठ कर रहा था जो हमारी हालात का मेरी समझ से बहुत सही चित्रण करती है:

वह An die Nachgeborenen शीर्षक एक कविता है जिसे तीस के दशक में बर्तोल्त ब्रेश्त ने डेनमार्क में अपने निर्वासन के दौरान रचा था. अंग्रेजी में इसका अनुवाद To Posterity (आने वाली पीढि़यों के नाम) शीर्षक से छपा है. परंतु जो भी अनुवाद पिछली पीढि़यों तक की अवधि में साम्राज्यवादी मुल्कों में छपे हैं उनमें इस कविता की सबसे बहुमूल्य पंक्तियाँ मेरे ख्याल से स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाई हैं:-

“Gingen wir doch, öfter als die Schuhe die Lünder wechselnd
Durch die Kriege der Klassen, verzweifelt
Wenn da nur Unrecht war und keine Empörung”

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