पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >एम जे अकबर Print | Share This  

आप क्यों रोये?

बाईलाइन

 

आप क्यों रोये?

एम जे अकबर


सार्वजनिक जीवन में आंसुओं की हैसियत एक नाजुक हथियार की है. इनकी सफ़लता की दर इतनी कम है कि इनका प्रदर्शन कभी-कभार ही बुद्धिमानी भरा होता है. लोगों को संगठित करने के लिहाज से भावनाओं को ताकतवर हथियार माना जा सकता है, लेकिन भावुकता शायद ही कभी ज्यादा काम आती हो. बेबसी या पश्चाताप के आंसू लोगों की आलोचना को बुलावा देते हैं. पहला कमजोरी का प्रमाण माना जाता है, तो दूसरा बिना किसी काम का.

सोनिया गांधी


कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मुसलमानों को लुभाने की कोशिश में यह कह कर दोहरी गलती की कि जब उन्होंने सोनिया गांधी को बाटला हाउस इनकाउंटर की तसवीर दिखाई थी, तब वे रो पड़ी थीं. आतंकवादी होने के संदेह में जिन युवकों को पुलिस ने गोली से मार गिराया था, वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे.

खुर्शीद के इस दावे में दूसरे संकेत देने की मंशा के साथ ही सोनिया गांधी के साथ अपनी नजदीकी प्रदर्शित करने की भी कोशिश छिपी थी. अगर बाटला हाउस इनकाउंटर के वक्त सोनिया गांधी विपक्ष की नेता होतीं, तो खुर्शीद का यह दाव काम कर सकता था. लेकिन यह उलटा पड़ा. उनका बयान बाटला हाउस मामले पर कांग्रेस की दुविधा का जवाब होने की जगह नये और नुकसानदेह सवालों को जन्म देने वाला साबित हुआ.

अगर सोनिया गांधी युवा मृतकों की तसवीर देख कर इतनी ही पिघल गयी थीं, तो उन्होंने कुछ किया क्यों नहीं? वे बेबसी से घिरी नेता नहीं थीं. भारत के गृह मंत्री और दिल्ली की मुख्य मंत्री, दोनों ही उनकी पार्टी के थे. अगर कोई गलती हुई या इनकाउंटर में राजनीतिक ज्यादती नजर आयी तो उन्होंने इन दोनों के खिलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या सोनिया गांधी सिर्फ़ घड़ियाली आंसू बहा रही थीं?

खुर्शीद के बयान ने अनजाने में ही मामले के दोष को सोनिया के पाले में फेंक दिया. खुर्शीद का दावा है कि उन्होंने सोनिया गांधी को वे फ़ोटोग्राफ़ दिखाये थे, जिससे इनकाउंटर की पुलिसिया कहानी शायद ध्वस्त हो जाती है. फ़ोटो देखकर वे रो पड़ीं. उसके बाद? तीन साल बीत गये. कुछ भी नहीं किया गया.

सोनिया गांधी तुरंत ही इस कहानी में छिपे विरोधाभासों को समझ गयीं और उन्होंने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को खुर्शीद के बयान को कोरी कल्पना करार देने का आदेश दिया. शायद वे औरतों की भावुक और आंसू बहाने वाली परंपरागत छवि से खुद को बांधे जाने की कोशिश से भी असहज महसूस कर रही हों.

क्या सोनिया के किसी सहयोगी ने कभी किसी घटना के बाद उन्हें जोर-जोर से रोते देखा है, जबकि उन्होंने किसी भी नेता की भी तुलना में ज्यादा हादसे झेले हैं. सोनिया गांधी ने कुशलता से अपनी छवि को अपनी सास के सांचे में ढाला है. खुर्शीद भले अतिरेक के शिकार हो गये हों, लेकिन यह मामला उठाने के लिए उन्हें कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता.

बाटला हाउस इनकाउंटर की स्मृतियां उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को परेशान करती रही हैं और इसने उनके चुनावी फ़ैसलों को भी प्रभावित किया है. लेकिन यह भी सही है कि ये यादें 2009 के लोकसभा चुनावों में ज्यादा ताजा थीं.

इसके बावजूद उस समय कांग्रेस ने सबको हैरत में डालते हुए 2007 विधानसभा चुनावों के महज 22 विधानसभा सीटों से कहीं आगे निकल कर 22 लोकसभा सीटें जीती थी. यह भारतीय मतदाता के परिपक्व होने का एक और सबूत है. वह फ़ैसले लेने के मामले में उस आपाधापी में नहीं रहता, जिसमें हमारे नेता या मीडिया वाले दिखाई देते हैं.

उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में सोनिया गांधी के प्रति उदारता थी, क्योंकि वे बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए उन्हें कसूरवार नहीं मानते थे. लेकिन उन्होंने ही लगभग अविश्वास के भाव से सरकार की अनुमति से गृह मंत्री पी चिदंबरम को बाटला हाउस इनकाउंटर का बचाव करते देखा है. जबकि इस पूरे मामले में कोई स्वतंत्र जांच भी नहीं की गयी है. मुसलिम मतदाता उन लुभावने वादों से पूरी तरह से थक गया है, जो चुनावों के वक्त उनसे किये जाते हैं और चुनाव खत्म होते ही छू-मंतर हो जाते हैं.

उत्तर प्रदेश को लेकर राहुल गांधी की सारी आशाएं मुसलिम वोटरों के एक बार फ़िर कांग्रेस के पक्ष में लामबंद होने पर टिकी हैं. वे हर तरह के पत्ते चल चुके हैं. जिसमें उलमाओं से मिलने के वक्त दाढ़ी बढ़ाना भी शामिल है. यह सब बेहद रोचक भले हो, लेकिन यह जमीन पर की जाने वाली राजनीति की जगह नहीं ले सकता. परिणामों के बारे में कोई कुछ नहीं जानता. बहुत मुमकिन है कि जीत के लिए उम्मीदवार का कद पार्टी के वजन से ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो.

मेरी जानकारी में आंसुओं का सफलतापूर्वक इस्तेमाल करने वाले एकमात्र नेता कश्मीर के शेख अब्दुल्ला थे, जब वे 1977 के कश्मीर अभियान के दौरान भीषण दबावों से घिर गये थे. श्रीनगर में अपनी आखिरी रैली में उन्होंने अपने लोगों को आंसू से भीगी आंखों के साथ जीवन भर की कुर्बानियों और प्रतिबद्धताओं की याद दिलायी थी. वे भारी मतों से जीतने में कामयाब हुए थे. लेकिन उनकी आंखें भी दूसरी बार गीली नहीं हुईं.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
13.02.2012, 01.19 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in