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इस चुनाव में सब पानी में हैं

चुनाव चर्चा

 

इस चुनाव में सब पानी में हैं

रोमा सोनभद्र से


देश में राजनीतिक दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य उत्तरप्रदेश के चुनाव में काफी उतार चढ़ाव हो रहा है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं. चुनावी दौर की शुरुआत से बड़ी तेज़ी से दलबदुलओं में एक से दूसरी पार्टी में जाने की होड़ मची हुई है. मुख्यधारा का मीडिया अधिकांशतः राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा की ही हवा बनाने में लगा हुआ है. मुख्य धारा का मीडियातंत्र दिल्ली दरबार की तरफ मुखातिब है और दिल्ली दरबार चाहता है कि उत्तप्रदेश के चुनाव में राष्ट्रीय पार्टी ही प्रमुखता के साथ खबरों में रहे. आम लोगों की बात करने में मुख्यधारा के मीडिया की दिलचस्पी भी कम ही होती है.

उत्तर-प्रदेश चुनाव


जैसे जैसे चुनावी दौर आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे खबरे भी बदलती जा रही हैं. मीडिया इस सच्चाई को भी नजर अंदाज करना चाहता है, कि पिछले 22 सालों में उत्तरप्रदेश और केन्द्रीय शासक वर्ग के बीच एक द्वन्द्ध खड़ा हुआ है, जिसे राहुल गांधी बनवास का नाम दे रहे है. इस द्वन्द्ध के बारे में कोई वास्तविकता आधार पर लिखने को तैयार नहीं है.

देखा जाए तो इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की स्थिति काफी नाज़ुक है, जिनकी ताकत इन बीते सालों में लगातार कमज़ोर ही हुई है, जबकि क्षेत्रीय आधार की पार्टियां मजबूत हो रही हैं. यह भी तथ्य है कि राष्ट्रीय पार्टियां बिना उत्तरप्रदेश के समर्थन के राष्ट्रीय सरकार नहीं चला सकतीं. इसलिए राष्ट्रीय पार्टियां किसी भी तरह से जोड़-तोड़ करके सत्ता का हस्तांतरण चाहती हैं. लेकिन उन्हें कोई रास्ता नहीं मिल रहा है. इस दौड़ में कहीं मीडिया के सहारे, तो कहीं प्रशासन के सहारे, तो कहीं चुनाव आयोग के सहारे कांग्रेस जैसी पार्टी जैसे तैसे यहां सत्ता में आने की कोशिश़ में लगी हुई है.

भाजपा ने भी बड़े जोर-शोर से भ्रष्टाचार के विरोध में रथयात्रा निकाल कर चुनाव प्रचार शुरू किया था, लेकिन बाबूराम कुश्वाह कांड बुरी तरह से बेनक़ाब हो गई. अब हालत ये है कि अपना बचा-खुचा जनाधार भी बचाना उनके लिए मुश्किल हो गया है. इसलिए वह पिछड़ों को टिकट देकर प्रमुख भूमिका में रहना चाहती है. हालांकि ज़मीनी स्तर पर वास्तविक स्थिति देखकर आकलन किया जाए तो अभी भी असली लड़ाई बसपा और सपा में ही है. इसलिए यह राष्ट्रीय पार्टियां इन्हीं दोनों पार्टियों के जनाधार को तोड़ना चाहती हैं और अपने वोट को बढ़ाना चाहती है.

कांग्रेस के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का चुनाव है, इसलिए कई जगह यह देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर बसपा की टक्कर में आने के लिए अब सपा व बसपा के जनाधार को हड़पने की ही फिराक में है. इसलिए यह राष्ट्रीय पार्टियां भले ही विकास की बात कर रही हों लेकिन वे जातिगत आधार पर ही इन क्षेत्रीय पार्टीयों से निकले नेताओं को टिकट देकर अपने जनाधार को मजबूत करने की कूटनीति के तहत ही योजना बना रही हैं.

सोनभद्र की दुद्धी सीट से आदिवासी उम्मीदवार विजय सिंह गोण्ड को ऐन मौके पर सपा से कांग्रेस में शामिल कर कांग्रेस द्वारा उनकी बलि तो चढ़ाई ही जा चुकी है, जहां कांग्रेस चुनाव से पहले ही हार गई है, अब वहां कांग्रेस का कोई उम्मीदवार ही नहीं है. ज्ञात हो कि दुद्धी विधान सभा सीट को अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित करने का वादा दिला नामांकन करने से कुछ ही दिन पूर्व विजय सिंह गोंड़ को कांग्रेस में शामिल किया गया था. लेकिन इस सीट को अनुसूचित जनजाति में परिवर्तित करने के लिए चुनाव आयोग को समय की आवश्यकता थी, इस बात की जानकारी होते हुए भी कांग्रेस के उम्मीदवार जो कि अनुसूचित जनजाति से हैं, ने लखनऊ से अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवाकर धोखेबाज़ी करके नामांकन दाखिल किया तो उनका नामांकन खारिज कर दिया गया. ऐसे में जहां कांग्रेस इस सीट से अपनी जीत सात बार विधायक रहे विजय सिंह गोण्ड के बलबूते सुनिश्चित करना चाहती थी, वहीं अब जनपद की चारों सीटों से कांग्रेस पूरी तरह से साफ हो चुकी है.

वही हाल पश्चिमी उत्तरप्रदेश की सहारनपुर की सभी सातों विधान सभा सीटों व उससे सटे जिला मुज़फ्फरनगर विधान सभा की सीटों का होने जा रहा है. यहां भी पिछले 30 से अधिक वर्षों से कांग्रेस के धुर विरोधी और सपा से राज्य सभा के सदस्य रहे मुस्लिम नेता रशीद मसूद का कुछ ही दिन पहले अपनी डूबती हुई नैया को पार लगाने के लिए कांग्रेस में शामिल होना, कांग्रेस के लिए ही भारी पड़ सकता है.

ज्ञात हो कि 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा सहारनपुर विधानसभा और मुज़फ्फरनगर ज़िले में सभी सीटों पर हार गई थी व यह चुनाव रशीद मसूद के नेतृत्व में लड़े गए थे, यह सभी सीटें बसपा को मिली थीं. इसी तरह से 2007 के विधान सभा चुनाव में सपा में रहते हुए भी रशीद मसूद द्वारा अपनी ही पार्टी के दो उम्मीदवारों सहारनपुर व मुज़फ्फराबाद की सीट से लड़ने वाले संजय गर्ग और जगदीश राणा के खिलाफ जा कर उनको हराने में और भाजपा को जिताने में कूटनीतिक भूमिका निभाई थी.
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