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शयनकक्ष से बाहर

बाईलाइन

 

शयनकक्ष से बाहर

एम जे अकबर


हर बेहतर चुनाव, कथा-कहानियों में कुछ जोड़ जाता है. उत्तर प्रदेश किस्से कहानियों की धरती है. यहां के नेताओं की उग्रता और बेचैनी का मुकाबला सिर्फ़ यहां के मतदाता की उपहासपूर्ण हाजिरजवाबी ही कर सकती है. अवध की संस्कृति के कई आयाम हैं, लेकिन भाषा की नफ़ासत और बारीकियां उन्हें विरासत में मिली हैं. इसे आप उनके लेखन ही नहीं, बोलचाल में भी महसूस कर सकते हैं. अवधी लोग किसी बातचीत को छुरीबाजी में बदल सकते हैं.

नारायणदत्त तिवारी


लेकिन, इस दौरान छुरी इतनी बारीकी और सफ़ाई से मारी जायेगी कि वह आपके शरीर को कहीं से भी नुकसान नहीं पहुंचायेगी, बस आपके अहं को तार-तार कर देगी. अपमानित करना या कटाक्ष करना एक कला है. एक व्यवहार कुशल शख्स आपको मारता नहीं, यह बेहद अश्‍लील किस्म का होगा. वह दिखाई न पड़ने वाले जख्म दे जाता है.

एक कवि किसी दगाबाज प्रेमी को घायल करने के बजाय लाख बार खुद मरना चाहेगा. उसे कई बार अपने विरोधी को धराशायी करने का मन करेगा, लेकिन वह कभी यह कदम नहीं उठायेगा. लखनऊ इसी सोच और संस्कृति का केंद्र है.

स्थानीय जरूरतों और विशिष्टताओं को समाहित करते हुए यही सोच पूरे प्रदेश की रगों में दौड़ती है. इसकी चमक दांव-पेंच के दौरान उभार पर होती हैं, जहां बिना किसी विवाद में उलझे हुए कनखियों के जरिये, उपमाओं के जरिये अपनी बात कही जाती है.

जब हिसाब-किताब पूरा हो जाये तो जिंदगी को अपनी रफ्तार पकड़ लेनी चाहिए. गंगा और जमुना दोनों सैंकडों साम्राज्यों की धरती में दाखिल होते हुए एक दूसरे से मुकाबला करती हैं. यहां इंसानी कोशिशों से इतिहास, धर्म, दांव और जंग की गूंज परवान चढ़ती है या उसकी काहिली में खो कर रह जाती है.

ये दोनों नदियां बीते कल का ही नहीं, आने वाले कल का भी भार ढोती हुई इलाहाबाद में एक दूसरे से जा मिलती हैं. अवध की बेटियों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते. उनकी तनी हुई भवों, मेहंदी से रंगे घुंघराले बालों में किसी बंजर और सूखे हिस्से की कहानियों से ज्यादा कल्पनाएं शक्ल लेती हैं. उनकी हाजिरजवाबी और हलके-फ़ुल्के मजाक को बदकिस्मती से उपजे अवसाद से निकलने का क्षणिक रास्ता कहा जा सकता है.

इस दुर्भाग्य की वजह प्यार की ताकत या ताकत के प्रति प्यार हो सकता है. इस स्थिति से निकलने में सहज दिल्लगी जितनी काम आती है, उतना काम कोई और किस्सा नहीं आता. उम्र और पुरुषत्व की जंग के चलते मुश्किलों में पड़ते रिश्तों का किस्सा भी नहीं. यह खासतौर से उस नारी संवेदना के लिए भी सुखद है, जो मानती है कि पुरुष ही इसके शिकार हो सकते हैं. पुरुषत्व पर आदमी गर्व भी करता है और यही उसके पतन की राह भी तैयार करता है. यह गर्व इस तथ्य के बावजूद है कि यौनिकता के मामले में स्त्रियां पुरुषों पर हमेशा भारी पड़ती हैं.

दो साल पहले आंध्र प्रदेश के राजभवन में महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालत में आयी तसवीरों के बाद नारायण दत्त तिवारी को आंध्र प्रदेश के राज्यपाल का पद छोड़ना पड़ा था. उन्हें राजनीतिक संन्यास लेते हुए वापस लौटना पड़ा था.

देहरादून में लगातार एक शख्स उनके डीएनए सैंपल पाने के लिए संघर्ष कर रहा है, जो साबित कर सके कि वे ही उसके पिता हैं. तिवारी ने यह पितृत्व टेस्ट कराने से इनकार कर दिया है. कर्नाटक विधानसभा में अपने मोबाइल पर अश्‍लील तस्वीरें देखने के कारण तीन मंत्रियों को झेलनी पड़ी शर्मिदगी, तिवारी की तुलना में कुछ भी नहीं है.

लेकिन इसके बावजूद तिवारी उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के चुनावी अभियान के अगुवा रहे. रिपोर्टो के मुताबिक, भीड़ की प्रतिक्रिया ध्यान खींचने वाली थी. लोगों की उनके प्रति निजी प्रतिक्रिया और भी काफी प्रभावशाली थी. लोग संन्यास के पुरातन नियम-कायदे को शिकस्त देने वाले तिवारी की चुपके-चुपके सराहना भी करते दिखे.

भारतीय कभी भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और निजी जीवन के दबाव को लेकर दुविधा में नहीं रहते. वे गांधी को राष्ट्रपिता स्वीकार करते हैं, उनकी ऐसी स्वीकारोक्ति के बावजूद, जो किसी दूसरे समाज में पिता वाली उनकी छवि को तार-तार कर देती. कई भारतीय प्रधानमंत्रियों को लेकर अफ़वाहें सुनी जाती रही हैं.

लेकिन मतदाता को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. इस क्षणिक अपराध पर वे कभी-कभार हंस लेते हैं, लेकिन इस अधर्म की सजा ईश्वर पर छोड़ देते हैं. इसका यह मतलब कतई नहीं होता कि उन्होंने उनके इस दुराचरण के लिए उन्हें माफ़ कर दिया है. बिलकुल नहीं. कोई भी राजनेता बलात्कार का आरोप रहते बरी नहीं हो सकता. लेकिन भारतीय इंग्लैंड और अमरीका की तरह अपने नेताओं पर व्यवहार की संहिता नहीं थोपते.

मतदाता तिवारी को उनके राजनीतिक तर्को से परखेगा, न कि उनके शयन कक्ष के किस्सों से.यह ढलती उम्र की निशानी कही जा सकती है कि आप अधेड़ उम्र में मिले दाग से उबर जायें. निश्चित तौर पर तिवारी के पास कोई ऐसा माद्दा है, जिसकी बदौलत उन्होंने तसवीरों में दर्ज अपने अतीत को विस्मृति में ढकेल दिया है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
19.02.2012, 01.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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