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शहीद घोषित हुए त्रिवेदी

गौरतलब

 

शहीद घोषित हुए त्रिवेदी

रविशंकर रवि


जिस रेल मंत्री के रेल बजट के लिए प्रधानमंत्री प्रशंसा कर रहे थे, उसी रेल मंत्री का इस्तीफा लेना लोकतंत्र का एक ऐसा भौंडा मजाक है, जो आने वाले दिनों में राजनीतिक गंदगी की मिसाल के तौर पर याद किया जाएगा.

दिनेश त्रिवेदी


गठबंधन की राजनीति का खामियाजा पूरे देश भुगत रहा है. लगता तो यही है कि घटक दल के नेता ही अब देश की राजनीति को चला रहे हैं और उन्हीं की इच्छा के अनुसार केंद्र सरकार फैसले लेने को मजबूर है. भले ही उसका खामियाजा आम देशवासी भुगत रहा है. राजनीतिक फायदे के लिए देश की व्यवस्था में हस्तक्षेप कर किया जा रहा है.

एयर इंडिया के बाद अब भारतीय रेल दिवालिया होने की कगार पर है, लेकिन गठबंधन की राजनीति में लगता है कि भारतीय रेल को तृणमूल कांग्रेस के पास गिरवी रख दिया गया है. तृणमूल नेता सुश्री ममता बनर्जी इसका इस्तेमाल दलीय संपति के रूप में कर रही हैं. लगातार रेल हादसे हो रहे हैं. रेल सुविधाओं का बुरा हाल है, लेकिन ममता बनर्जी को रेल से होने वाले राजनीतिक लाभ चाहिए, भले ही रेल का चक्का बंद हो जाए.

दुर्भाग्य की बात यह है कि सबसे बड़े दल के नेता होते हुए भी प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह गठबंधन की राजनीति के नाम पर सब कुछ झेल रहे हैं और पूरे देश को झेलने को मजबूर कर रहे हैं. क्योंकि कांग्रेस को सरकार के गिरने का खतरा दिख रहा है. उसके लिए सत्ता ही सब कुछ है.

जिस रेल बजट के लिए उन्होंने रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की पीठ थपथपाई थी, उन्हीं का इस्तीफा स्वीकार करने और ममता के सुझाए दूसरे मुकुल राय को नया रेल मंत्री के रूप स्वीकार करने जरा-सा भी गुरेज नहीं किया. क्योंकि गठबंधन की राजनीति की यह मजबूरी है. उनके लिए देश का हित बाद में आता है, पहले सरकार को बचाने की जिम्मेदारी है, क्योंकि कांग्रेस देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता से दूर रह ही नहीं सकती है.

यह एक ऐसी राजनीति है, जिसमें नैतिकता का कोई स्थान नहीं है. किसी भी तरह सरकार को बचाए रखना सर्वोपरि है और इसकी लिए जरूरत पड़ने पर सांसद भी खरीदे जा सकते हैं.

रेल भाड़ा बढ़ने से कोई नाराज नहीं था, क्योंकि जिस तरह के रेलवे के संचालन का खर्च बढ़ा है, उस अनुपात में रेल का भाड़ा नहीं बढ़ा है. रेल की बिगड़ती आर्थिक स्थिति से उसके लिए काम करने वाले लाखों रेल कर्मचारी चिंतित हैं.

आम आदमी को बढ़ी सुविधाओं के नाम पर बढ़े हुए भाड़ा देने पर कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन ममता बनर्जी ऐसा नहीं चाहती हैं तो रेल भाड़ा नहीं बढ़ेगा. और इसी अपराध के लिए उन्हें रेल मंत्री पद से दिनेश त्रिवेदी को इस तरह हटने के लिए कहा, जैसे कि तिहाड़ी मजदूरों को अगले दिन से काम पर नहीं आने के लिए कहा जाता है.

ऐसे में दिनेश त्रिवेदी का यह बयान काफी मायने रखता है कि देश में राजनीति बहुत हावी है और देश में व्यवस्था को राजनीति से परे होना चाहिए. देश में राजनीति बहुत अधिक है और हर मामले में राजनीति हो रही है. मंत्री कोई भी जनहित से जुड़ा बड़ा फैसला नहीं ले सकता है. अधिकांश मंत्रालय का उपयोग व्यक्तिगत या दलीय फायदे के लिए हो रहा है और पूरा देश तमाशबीन बना हुआ है.

इससे बड़ी शर्म का बात प्रधानमंत्री के लिए क्या हो सकती है कि बजट पेश करने के बाद बिना उस बजट को पारित किए हुए किसी मंत्री का इस्तीफा देने को मजबूर किया जाता है. यह राजनीति नहीं समझौता है. जो देश हित के खिलाफ है. ममता के रेल मंत्री बनने के बाद से भारतीय रेल का चक्का धीमा पड़ने लगा.

वर्षों से रेलगाड़ी के सुरक्षित संचालन के लिए जरूर पद रिक्त पड़े हैं. अक्सर रेल हादसे हो रहे हैं और निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं. लेकिन रेल मंत्री बनने के बाद से उनकी चिंता रेलवे के विकास में नहीं, प. बंगाल की मुख्यमंत्री बनने को लेकर थी. इस इस मकसद के लिए उन्होंने रेलवे का जमकर दोहन किया. रेल दुर्घटनाओं में मारे गए लोगों के आश्रितों को मुआबजे देने से अधिक के बारे में सोचा नहीं जा रहा है, जबकि इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत रेलवे की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और सुरक्षित रेल यात्रा की व्यवस्था है. लेकिन ममता बनर्जी को प. बंगाल से बाहर सोचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका देश वहीं तक सीमित है.

यह भी सच है कि प्रधानमंत्री ने रेल मंत्री के रूप में दिनेश त्रिवेदी का इस्तेमाल किया और जब गठबंधन सरकार पर आफत आई तो उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल दिया. नैतिकता तो यह होती कि निदेश त्रिवेदी को बनाए रखने के लिए वे अड़ जाते. जबकि दिनेश त्रिवेदी बागी बनने के लिए संकेत दे रहे थे, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री की सहमति से उन्हें शहीद बना दिया गया. क्या यह प्रमाणित नहीं होता है कि देश का यह प्रधानमंत्री कितना कमजोर है?

20.03.2012, 07.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanju [sanjaycgt@gmail.com] - 2012-04-01 18:21:20

 
  त्रिवेदी जी ने जब इस्तीफा दिय़ा तो उनके पूरे तेवर गायब हो गए थे, शायद ममता ने माफिया ममता से समझाया हो जिसमें उनके परिवार को धमकी भी हो सकती है. 
   
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