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देविंदर शर्मा | बैसाखी वाला बाज़ार

विचार

 

बैसाखी वाला बाज़ार

देविंदर शर्मा

 

 

दुनिया की विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियां वित्तीय संकट में फंस गई हैं. पिछले छह माह में अमेरिका के शीर्ष पांच निवेश बैंकों में से तीन गायब हो चुके हैं. शेष दो-मोर्गन स्टेनली और गोल्डमैन सैश की सांसें अटकी हुई हैं. मोर्गन स्टेनली तो विलय के विकल्प पर विचार कर रहा है, जबकि गोल्डमैन के शेयर लुढ़क गए हैं. पूरे संसार में तगड़े झटके महसूस किए जा रहे हैं.

ऐसे में सरकारी-निजी भागीदारी का शास्त्रीय उदाहरण सामने आ रहा है. बहुराष्ट्रीय कंपनी एआईजी को बचाने के लिए अमेरिका ने आपातकालीन निधि से 85 अरब डालर डालर जारी किए और बदले में एआईजी के 79.9 फीसदी शेयर हासिल कर लिए.

जाहिर है कि विश्व की सबसे बड़ी बीमा कंपनी पर अमेरिकी सरकार का नियंत्रण हो गया है. वाल स्ट्रीट पर मारकाट मचाने वाले सप्ताह के बाद इंग्लैंड के सेंट्रल बैंक, यूरोपीय संघ, जापान, स्विट्जरलैंड, कनाडा, रूस और भारत ने बहुविध बचाव कार्यो में छह सौ अरब डालर खपा दिए. क्या यह विचित्र नहीं कि निजी क्षेत्र की विशाल कंपनियों को बचाने के लिए सरकारी खजाने खोल दिए गए?

पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी सरकार कंपनियों को बचाने के लिए 900 अरब डालर खर्च कर चुकी है. यही नहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख डोमिनिक स्ट्रास ने चेतावनी जारी कर दी कि इससे भी बुरा समय आने वाला है. अब पूरी दुनिया के करदाताओं को विशालकाय निजी कंपनियों के इस भारी-भरकम घाटे की भरपाई के लिए कमर कसनी होगी. इससे मुझे एक पुरानी कहावत याद आ गई है-चित्त भी तेरी, पट भी तेरी.

निश्चित तौर पर जीत बाजार की हुई है. अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश मात्र मूकदर्शक बने नहीं रह सकते. तुरंत मदद की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार का हस्तक्षेप निहायत जरूरी है. उन्होंने मदद के लिए एक हजार अरब डालर की पेशकश कर डाली. अमेरिका और विश्व के अन्य देशों की सरकारों द्वारा वित्तीय व्यवस्था को और अधिक बिगड़ने से बचाने की राजनीतिक बाध्यता दोहरे मापदंडों को उजागर करती है.

पूंजीवादी कारपोरेट जगत लाभ को डकारता रहता है. कुछ कारपोरेट घराने अरबों डालर कमाते हैं, झूठे और गलत आंकड़े और दलीलें पेश करते हैं और रकम अपनी जेब में भरकर चलते बनते हैं.

 

केवल एक सप्ताह में छह सौ अरब डालर की रकम से पूरी दुनिया से भुखमरी मिटाई जा सकती थी. कृषि एवं खाद्य संगठन के अनुमान के मुताबिक पूरी दुनिया में 85.4 करोड़ लोग रात को भूखे सोते हैं. पिछले साल भर के दौरान अमेरिका द्वारा खर्च की गई नौ सौ अरब डालर की अतिरिक्त राशि से दो अरब लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जा सकता था. एक हजार अरब डालर की जिस राशि की जार्ज बुश ने पेशकश की है उससे तो गरीबी, भूख और कुपोषण का दुनिया से नामोनिशान मिट जाता.

अगर वैश्विक नेतृत्व में ईमानदारी होती तो इस प्रकार की तात्कालिक मदद दुनिया से गरीबी और भुखमरी मिटाने के लिए की जाती. सहस्त्राब्दि के लक्ष्यों की पूर्ति में आ रही अड़चनों के लिए संयुक्त राष्ट्र के सामूहिक दोष पर लीपापोती करने की कोई जरूरत नहीं है. इस राशि से गरीबी इतिहास का विषय बन जाती और भुखमरी विलुप्त हो जाती.

फिर आर्थिक संकट की ओर लौटते हैं. कुल मिलाकर यह बाजार की श्रेष्ठता का उदाहरण है. जब यह चढ़ता है तो सरकार कदम पीछे खींच लेती है और उसे धमाचौकड़ी मचाने की खुली छूट दे देती है. लाभ ही एकमात्र उद्देश्य रह जाता है और निवेशक इसका पूरा फायदा उठाते हैं.

बार-बार कहा जाता है कि बाजार खुद को सुधारता है. निवेश बैंक सरकार, नियामकों और निवेशकों को आश्वस्त करते हैं कि उन्हें जोखिम से निपटने में महारथ हासिल है. पूंजीवादी कारपोरेट जगत लाभ को डकारता रहता है. कुछ कारपोरेट घराने अरबों डालर कमाते हैं, झूठे और गलत आंकड़े और दलीलें पेश करते हैं और रकम अपनी जेब में भरकर चलते बनते हैं. साख प्रदाता एजेंसियां इन्हें उच्चतम स्थान देती हैं. जब ये ध्वस्त हो जाते हैं तो नुकसान करदाताओं को उठाना पड़ता है. इन्हीं की बचत पर सरकार कंपनियों को सहारा देती है.

लाख टके का सवाल है कि सरकार को दखल क्यों देना चाहिए? क्या बाजार को आत्म नियामक और आत्म निरोधक नहीं होना चाहिए? इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि सरकार को बाजार को जिंदा क्यों रखना चाहिए? यहां यह बता देना जरूरी है कि ये कंपनियां आम व्यावसायिक घराने नहीं. ये कंपनियां तो अमेरिका के वित्तीय तंत्र का गौरव हैं.

ये श्रेष्ठतम प्रबंधन स्कूलों से सर्वोत्ताम प्रतिभाओं को चुनकर अपने यहां तैनात करती हैं, विदेशी सरकारों को विशेषज्ञ राय देती हैं, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आर्थिक नीतियां पुनर्निर्धारित करती हैं. ये इतनी शक्ति रखती हैं कि दुनिया भर में आर्थिक सोच इनकी शागिर्द बन जाती है.

आज निजीकरण आर्थिक मंत्र बन गया है, जो सरकारों को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए दरवाजे खोलने को मजबूर करता है. बाजार ही सब कुछ है. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश का दबाव है. राष्ट्रीयकृत बैंकों के निजीकरण का भी दबाव है.

इसके लिए वही घिसी-पिटी दलीलें दी जाती हैं. प्रत्येक ख्यातिनाम अर्थशास्त्री राष्ट्रीयकृत बैंकों के निजीकरण के पक्ष में तर्क पेश करता है और जब निजी क्षेत्र बाजार के विस्फोट में बर्बाद हो जाता है तो सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह उनका राष्ट्रीयकरण कर उन्हें बचाए. भारत के वाम दलों को साधुवाद कि भारत तगड़े झटकों से बच गया है, किंतु इतनी कंपकंपी तो छूट ही गई कि भारत सरकार को घरेलू बैंकिंग व्यवस्था को समायोजन सुविधाओं के माध्यम से 18 अरब डालर ढीले करने पड़े.

हमें भूलना नहीं चाहिए कि भारत सरकार वित्तीय क्षेत्र खोलने, सार्वजनिक बैंकों में निजी हिस्सेदारी बढ़ाने और बीमा क्षेत्र में सुधार के लिए विधेयक लाने को बिल्कुल तत्पर थी. वैश्विक आर्थिक संकट के कारण बैंकों और बीमा क्षेत्र के निजीकरण को फिलहाल टाल दिया गया है.

अब जरा इन बातों पर गौर करें. एआईजी को 85 अरब डालर का सहारा देना इतिहास का सबसे बड़ा राष्ट्रीयकरण है. एआईजी को बचाना महत्वपूर्ण था, अन्यथा इसकी असफलता समूचे वित्तीय ढांचे को हिलाकर रख देती. अमेरिका का एक हजार अरब डालर का वित्तीय पैकेज बाजार को जिंदा रखने के लिए है.

अगर अब राष्ट्रीयकरण उचित है तो यह समझ से परे है कि पहले से ही राष्ट्रीयकरण गलत कैसे है? आने वाले समय में हम इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्तिदेखेंगे. दूसरे शब्दों में और अधिक कंपनियों का राष्ट्रीयकरण होगा.

स्टर्न स्कूल आफ बिजनेस के प्रोफेसर नौरियल रौबीनी ने ठीक ही कहा कि यह लाभ का निजीकरण और घाटे का सामाजीकरण है. हम लालच पर आधारित वित्तीय ढांचे में सुधार का कितना ही प्रयास क्यों न करें, यह कभी अवरोधों से मुक्त और नियमित नहीं हो सकता. बाजार अर्थव्यवस्था की सफलता की डींगे मारना बंद होना चाहिए.

बाजार को मुक्त परिचालन करना चाहिए और अपने मूलाधार के बूते टिकना चाहिए. बाजार को सरकारी बैसाखी के बिना जोखिम का प्रबंधन करने में समर्थ बनना चाहिए. पूंजीवाद को अपने बूते खड़ा होना चाहिए और तब देखें बाजार कितना बचा रह सकता है?

तब तक आपको रोजाना भूख से मरने वाले हजारों लोगों के लिए आंसू बहाने की जरूरत नहीं है. उन्हें बड़े रूखेपन से बार-बार बता दिया जाता है कि सरकारों के पास उनके भोजन के लिए पैसा नहीं है. भोजन का वैधानिक अधिकार बाजार ने दूसरों की जेब भरने के लिए छीन लिया है.

25.09.2008, 01.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Shaharoz khan

 
 अफसोस इसी का तो है देविंदर जी कि सारे लोग बाज़ार के पीछे-पीछे घुम रहे हैं. हमने उपभेग को इतने केंद्र में ला दिया है कि अब कुछ भी संभव नहीं नजर आता. साम्राज्यवादी ताकतें इतनी मजबूत होती चली गई हैं कि क्या कहें. दुख की बात है कि इसके बाद भी हम नहीं चेत रहे हैं और धर्म, भाषा औऱ जात के नाम पर होने वाली लड़ाइयों में अपने को झोंक रहे हैं. 
   
 

neha

 
 i m agree by your facts and arguements and i also think that perhaps globlization is a key of all that drammatic situation which is always in favour of capitalism and unfavourable to socialism. 
   

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