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सईद पर इनाम

बाईलाइन

 

सईद पर इनाम

एम जे अकबर


कोई भी भ्रम अकसर मुश्किलों में डालने वाला होता है. अमरीका ने जमात उद दावा यानी लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद के बारे में जानकारी मुहैया कराने वाले को 10 मिलियन डॉलर का इनाम देने की घोषणा की है. अभी तक इस इनाम पर दावा जताने के लिए सईद स्वयं ही सामने आये हैं. अगर वाशिंगटन को सिर्फ उनके ठौर-ठिकाने के बारे में जानकारी चाहिए, तो हाफिज खुशी से रोजाना के कार्यक्रमों की जानकारी किसी नामित व्यक्ति या संस्था को दे देंगे.

हाफिज सईद


वाशिंगटन ने इस बारे में सफाई दी है कि वह इनाम की राशि हाफिज सईद को सजा दिलाने के लिए सबूत देने के बदले देगी. भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम काफी समय से कहते रहे हैं कि सईद को सजा दिलाने के लिए पाकिस्तान को पुख्ता दस्तावेजी सबूत सौंपे जा चुके हैं, लेकिन इस्लामाबाद परिणामों के भय से सईद के खिलाफ मामला नहीं चला रहा है.

इसी हफ्ते विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने बेंगलुरू में फिर दोहराया कि सईद के खिलाफ सौंपे गये सबूतों को झुठलाया नहीं जा सकता है. चिदंबरम यह फाइल वाशिंगटन क्यों नहीं भेज देते और भारतीय पुलिस की ओर से इनामी रकम पर दावा जताकर प्रतिक्रिया का इंतजार करते हैं?

पाकिस्तान के मित्र चीन ने भी आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल में 6 अप्रैल को दक्षिण एशिया के एक देश पर पूर्वी तुर्किस्तान इसलामी मूवमेंट के 6 उइगर मुसलिम नेताओं को पनाह देने का आरोप लगाया. चीन के मुताबिक यह मूवमेंट न सिर्फ चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती पेश कर रहा है, बल्कि क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए भी खतरा है. चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी सिंहुआ ने इसे चीन की सुरक्षा पर सबसे बड़ा खतरा करार दिया है. यहां कठोर शब्दों के बावजूद कोई इनाम घोषित नहीं किया गया है.

वाशिंगटन को पैसे के बदले पुख्ता सबूत की जरूरत है. नाम. पता. मोबइल नंबर. देश का नाम. दक्षिण एशिया काफी बड़ा है. क्या उइगर नेता नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, भारत या संभवत: पाकिस्तान में हैं? सतर्क वाक्यों से कुछ हासिल नहीं होगा. ऐसे में दिल्ली के लिए इनाम का विकल्प अभी भी मौजूद है.

संभवत: वाशिंगटन को आतंकवादियों के रिवार्ड प्रोग्राम को अंतरराष्ष्ट्रीय सूची में डालने से पहले थोड़ा और स्पष्टवादी रवैया अपनाना चाहिए था. अमेरिका ने दस मिलियन डॉलर के पांच आतंकवादियों की सूची में सईद का नाम 2008 मुंबई हमले में लश्कर-ए-तैयबा के बारे में भारत द्वारा भेजे सबूतों के आधार पर शामिल नहीं किया है. उसने ऐसा सईद के सहयोगी रहे पाकिस्तानी अमेरिकी डेविड कोलमैन हेडली द्वारा लश्कर, अल-कायदा और आइएसआइ के बीच संबंधों के बारे में विस्तार से बताये जाने के बाद किया है.

हेडली को 2009 में एफबीआइ ने शिकागो एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया था. हेडली अल-कायदा के मुहम्मद इलियास कश्मीरी के संपर्क में था और उसने खुलासा किया कि मुबंई ऑपरेशन के लिए रेकी करने के लिए वित्तीय मदद आइएसआइ ने मुहैया करायी थी.

ये सभी और इससे भी अधिक रहस्योद्घाटन पाकिस्तान के कुछ साहसी पत्रकारों, खासकर सलीम शहजाद ने किए थे. शहजाद की हत्या उनकी किताब 'इनसाइड अल-कायदा एंड तालिबान' के प्रकाशन के कुछ ही दिन बाद कर दी गयी थी. तत्कालीन अमरीकी सेना प्रमुख एडमिरल माइक मुलेन ने कहा था कि शहजाद की हत्या भविष्य में होने वाले रहस्योद्घाटनों को रोकने के मकसद से की गयी है.

अमरीका को बहुत सारी सनसनीखेज जानकारी ओसामा-बिन-लादेन के एबटाबाद ठिकाने से जब्त दस्तावेजों से भी हासिल हुई और इससे ही सईद और अल-कायदा के बीच संबंध की बात सही साबित हुई. अमरीकी एजेंसियां सईद को 2008 से ही खोज रही हैं. अब उस पर इनाम की घोषणा इस खोज को एक तर्कसंगत उंचाई पर ले गया है.

फिलहाल स्थिति यह है. हमारे पास पैसे भी हैं और दस्तावेज भी. फिर किस चीज की कमी है? क्या यह अगला कदम उठाने की इच्छाशक्ति है? पिछले तीन सालों से भारत इसी उलझन में पड़ा है कि अगला कदम क्या? उसने मामले में इस्लामाबाद से सहयोग मांगा, लेकिन देरी के कारण उसे निराश होना पड़ा.

भारत ने सभी मौकों पर यह जताने की कोशिश की कि वह इस्लामाबाद के कदम न उठाने की मजबूरी को समझता है, क्योंकि सच्चाई यह है कि ऐसा करने से पाकिस्तानी संस्थाओं को नुकसान पहुंचेगा. यही वजह है कि भारत-पाक रिश्ते पर उसने आतंकवाद कर साया नहीं पड़ने दिया है. जबकि मुंबई हमला भारत के मानस पर दाग छोड़ चुका है और यह खत्म नहीं होगा.

इन्हीं कारणों से 8 अप्रैल को दिल्ली में आसिफ अली जरदारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ लंच तो करेंगे, मगर भारत के खिलाफ पाक समर्थित आतंकवाद पर कोई भरोसा नहीं दे पायेंगे. लेकिन वाशिंगटन के पास मनमोहन सिंह जैसा राष्ट्रपति नहीं है. वह दूसरे नियमों से चलता है. वह लचीला हो सकता है, जैसा आइएसआइ के साथ संबंध के मामले में है. लेकिन सईद पर अमरीकी निर्णय इस लचीलेपन के टूटने का सबूत है.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
08.04.2012, 07.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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