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बुजुर्ग, स्वास्थ्य और हम

मुद्दा

 

बुजुर्ग, स्वास्थ्य और हम

प्रीतीश नंदी


महज चंद दिनों में तीन महाद्वीपों की यात्रा करना रोमांचक था. लेकिन यात्रा के रोमांच के साथ ही यह देखना भी काफी दिलचस्प था कि अलग-अलग लोग और अलग-अलग संस्कृतियां अपने भविष्य को किस दृष्टिकोण से देखते हैं.

बुजुर्ग


हमारे अखबारों की सुर्खियों में महापंजीयक द्वारा केंद्र सरकार को भेजे गए उस एसआरएस डाटा की खबर थी, जिसमें यह बताया गया था कि वर्ष 2016 तक भारत की बुजुर्ग आबादी में महिलाओं की संख्या 51 फीसदी होगी, जबकि दूसरी तरफ कई राज्यों में कन्या भ्रूण हत्या के कारण लड़कियों की तादाद घट रही है.

वर्ष 2025 तक 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों की संख्या 12 फीसदी होगी और इनमें भी दस फीसदी ऐसे होंगे, जो अब सक्रिय नहीं हैं और रोगग्रस्त हो गए हैं. ये ही दस फीसदी लोग वे होंगे, जिन्हें समाज की संवेदनशीलता और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होगी.

दूसरे शब्दों में आने वाले एक दशक में भारत बुजुर्ग आबादी के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश होगा और इन बुजुर्गो में से 80 फीसदी लोग ग्रामीण क्षेत्रों के होंगे. इन आंकड़ों का सीधा-सीधा मतलब यही है कि भारत को अपनी मौजूदा स्वास्थ्य योजनाओं पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की दरकार है.

वर्तमान में भारत में 80 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों की संख्या 78 लाख है, जो वर्ष 2050 तक 5.14 करोड़ हो जाएगी. वहीं अल्जाइमर्स पीड़ितों की संख्या भी बढ़कर चौगुनी हो जाएगी. डायबिटीज में 300 फीसदी का इजाफा होने का अंदेशा है. हर चौथा भारतीय डिमेंशिया का मरीज होगा और बदलती जीवनशैली के कारण कहीं अधिक तादाद में युवा दिल के दौरे के शिकार होंगे.

आंकड़े यह भी कहते हैं कि आगामी 43 वर्षो में भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों की संख्या बढ़कर चौगुनी हो जाएगी. वर्तमान में 60 से अधिक आयु वालों की संख्या 8.4 करोड़ है, जिसके बढ़कर 33.5 करोड़ तक पहुंच जाने का अंदेशा है. इन आंकड़ों पर नजर डालें तो यही पता चलता है कि आज से तीस-चालीस साल बाद का भारत बुजुर्गो और बीमारों से भरा होगा. यह एक डराने वाली और निराशाजनक तस्वीर है.

लेकिन पश्चिमी देशों में भविष्य को लेकर इससे ठीक उलट कल्पनाएं की जा रही हैं. वैज्ञानिकों का दावा है कि वर्ष 2050 तक जीवन स्थितियां कहीं बेहतर होंगी और वह एक रोमांचक दौर होगा. समाज कहीं अधिक बहुसांस्कृतिक-बहुनस्लीय होगा.

गोया कि हवाई जहाज इस डर से उड़ान ही नहीं भरेंगे कि कहीं वे टकरा न जाएं और इससे पहले कि आप दही से भरे किसी प्याले को हजम कर जाएं, वह आपको गुडमॉर्निग विश करेगा. मनुष्य की चेतना, जिसके बारे में अध्यात्मवादी इतनी बातें करते हैं, सुपरकंप्यूटरों पर संग्रहीत कर ली जाएगी और यह मनुष्य जाति के लिए अमरत्व का प्रमाण होगा.

पश्चिम में अनुमान तो यह भी लगाया जा रहा है कि वर्ष २क्५क् तक जो व्यक्ति पचास की उम्र पार कर लेंगे, वे शायद चिरकाल तक जीवित रहेंगे. भूख इतिहास का विषय हो जाएगी. एक छोटी-सी गोली से पेट भरा जा सकेगा. हर हाथ में छोटे टैब्स होंगे, जो शिक्षा, सूचना और मनोरंजन का त्वरित माध्यम होंगे.

नहीं, ये किन्हीं साइंस फिक्शन लेखकों की दूर की कौड़ियां नहीं हैं, मनुष्य के अमरत्व का यह अनुमान भविष्य विज्ञान के जानकारों ने लगाया है. इन विद्वानों ने अप्लाइड मैथ्स, सैद्धांतिक भौतिकी, ऑप्टिकल नेटवर्क, ब्रॉडबैंड क्रांति और साइबरनेटिक्स के अपने विशद ज्ञान के माध्यम से मनुष्यता के भविष्य के प्रति एक अचूक दृष्टि विकसित कर ली है.

पश्चिम के ये धुरंधर वैज्ञानिक यह उम्मीद भी कर रहे हैं कि 2050 तक मनुष्य के दिमाग को कंप्यूटर जैसी किसी मशीन में डाउनलोड किया जा सकेगा, ताकि मनुष्य की मृत्यु के बाद भी उसका ‘कॅरियर’ जारी रह सके. यह सीधे-सीधे वास्तविक संसार से आभासी संसार की ओर यात्रा करना है.

उपयुक्त स्थिति निर्मित होने पर मनुष्य के दिमाग को फिर अपलोड किया जा सकेगा. डीएनए से जुड़े शोध यह दावा करते हैं कि जल्द ही मनुष्य के शरीर के सभी अंगों को बदला जा सकेगा, या उन्हें लैब में पुन: विकसित किया जा सकेगा. प्रारंभ में यह सब बहुत महंगा जरूर हो, लेकिन कुछ सालों बाद ही अमरत्व पाने की कीमत सभी के लिए ‘अफोर्डेबल’ हो जाएगी.

वास्तव में पश्चिम में जो बातें कही जा रही हैं, उसके पीछे रणनीति यह है कि युवाओं को मृत्यु की धारणा से मुक्त कर दिया जाए. वैज्ञानिकों द्वारा कंप्यूटिंग क्षमताओं में अकल्पनीय प्रगति का हवाला दिया जाता है. जैसे हाल ही में लॉन्च किया गया एक प्ले-स्टेशन इस तरह के पिछले गेम कंसोल्स से 35 गुना ज्यादा ताकतवर है. अब कोशिश की जा रही है कि मनुष्य के दिमाग जितने ही ताकतवर प्ले-स्टेशन बनाए जाएं. यदि ऐसा है तो वर्ष 2050 से भी पहले एक कांशसनेस कंप्यूटर भी बनाया जा सकता है.

यह सब सुनने में हैरतनाक लगता है. है ना? लेकिन बुनियादी बात यह है कि यह सब इस पर निर्भर करता है कि हम कहां हैं और अपने भविष्य को कैसे देख रहे हैं. जहां आप और हम बुढ़ापा, बीमारियों और जनसंख्या विस्फोट के बारे में चिंतित हैं, वहीं दुनिया का एक हिस्सा तकनीकी कारस्तानियों के मार्फत अमरत्व प्राप्त करने की बातें सोच रहा है.

शायद मैं ऐसे तमाम करामातें देखने के लिए जीवित न रहूं, लेकिन शायद मेरे बच्चे अमरत्व के ‘वर्जन वन’ होंगे. शायद वे हर शुरुआती मॉडल की तरह अनगढ़ हों, लेकिन समय के साथ वे खुद को अपग्रेड कर सकते हैं. जब तक वे ‘वर्जन थ्री’ तक पहुंचेंगे, मनुष्य का शाश्वत जीवन पूर्णत: त्रुटिरहित हो चुका होगा. पता नहीं, उस दुनिया में धर्म और ईश्वर का क्या स्थान होगा.

क्या तब भी हम वैसे ही सवाल पूछेंगे, जैसे आज पूछते हैं? मैं कौन हूं? मैं यहां किसलिए हूं? कैटी प्राइस अभी क्या कर रही होंगी? लेकिन इन सवालों से आखिर क्या फर्क पड़ता है, अमरत्व की दूरगामी कल्पनाओं के कारण हम माल्थस के जनसंख्या संबंधी सरोकारों को कुछ देर के लिए भुला देने को तैयार जो हो रहे हैं.

12.04.2012, 19.24 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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