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धरोहर का मतलब

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धरोहर का मतलब

एम जे अकबर

ब्रिटिश म्यूजियम


ब्रिटिश म्यूजियम की महत्ता को देखते हुए इसका नाम बदलकर ब्रिटिश एंपायर म्यूजियम कर दिया जाना चाहिए. मानव प्रतिभा का यह सबसे बड़ा भंडार तीन सदियों के व्यापारिक और राजनीतिक सत्ता का स्मृति चिह्न् है. साम्राज्य और उसके निवासियों के तीन तट थे. पहला, वैसे क्षेत्र जो सीधे उसके नियंत्रण में थे. दूसरा, वे क्षेत्र जिन पर उसका वर्चस्व था और तीसरा विभिन्न संधियों के जरिए नियंत्रण में रखे गये क्षेत्र. जैसे कि भारत और मलेशिया के रजवाड़े.

क्लाइव की तरह दूसरे ब्रिटिश विजेताओं में लालच की बात जगजाहिर थी, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों को एक बात का श्रेय दिया जाना चाहिए. ब्रिटिश विजेताओं ने जिन क्षेत्रों पर भी नियंत्रण कायम किया, वहां के नागरिकों को डराकर, घूस देकर या जीत के अधिकार के तौर पर जो कुछ भी हासिल किया, उसका एक हिस्सा राष्ट्रीय खजाने के लिए छोड़ दिया. उनका मानना था कि ऐसा खजाना पैसे से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. ब्रिटिश म्यूजियम सभ्यता की बैंलेंस शीट से निकलने वाली संपदा है.

लेकिन इस महान संपदा को जिस चीज ने नुकसान पहुंचाया, वह संरक्षण और मालिकाना हक के बीच का फासला है. विंस्टन चर्चिल सोचते थे कि ब्रिटिश हुकूमत का सूरज कभी नहीं डूबेगा, बाद में वे खुद इस घटना के गवाह बने. लेकिन इस तर्क के आधार पर पुराने उपनिवेशों को ब्रिटिश म्यूजियम को दिनदहाड़े लूट की जगह कहकर खारिज करने का पूरा अधिकार है.

आप खो गयी चीजों के लिए दुख प्रकट कर सकते हैं, या फिर गर्व कर सकते हैं कि किन चीजों को संजोकर रखा गया है. अगर आप अच्छे भारतीय हैं, जैसा कि मैं हूं, तो आप दोनों कर सकते हैं.

लंदन में सभी जगह भारत का वैभव बिखरा पड़ा है, क्योंकि भारत ब्रिटिश शक्ति की सबसे ऊंची चोटी और साम्राज्य को भव्यता देने वाला उपनिवेश था. लेकिन जब मैं भारतीयों द्वारा अपनी ही धरोहरों की चोरी, लूट, बर्बादी को देखता हूं, जो अभी तक जारी है, तो मुझे थोड़ी राहत महसूस होती है कि ब्रिटिश नवाबों में इतनी शालीनता तो है कि वे चोरी किए हुए सामानों को संरक्षित रखे हुए हैं. ब्रिटिश कभी-कभार ऐसा जताने की कोशिश करते है कि वे पूर्व में किए गये कामों के लिए शर्मिदा हैं. इसके लिए वे बेतुके तर्को का सहारा लेते है. जैसे कि यह कानूनी तरीके से हासिल किया गया है.

ये तर्क मुझे वाइसरायों की पत्नियों की याद दिलाती है, जो जब भी महाराजाओं को रात के खाने पर आमंत्रित करती थीं, तो भेंट के तौर पर कीमती जेवरों की उम्मीद करती थीं, और जो महाराजा ऐसा नहीं करते थे, उनकी शामत आ जाती थी. जीतने वालों के तर्क अकसर एक जैसे होते हैं.

लॉर्ड पामस्र्टन ने गैरकानूनी अफीम व्यापार को इस आधार पर जायज ठहराने की कोशिश की थी कि भ्रष्ट चीनी अधिकारियों ने इस पाबंदी को जानबूझकर समाप्त हो जाने दिया. यह व्यापार तब तक चलता रहा, जब तक चल सकता था. भारत में शासन खत्म होने से 29 साल पहले ब्रिटिश हुकूमत का सुनहरा दौर 1918 में आया.

1918 में ब्रिटिश शासन के पैरोकार और पक्षधर इस बात के प्रति आश्वस्त थे कि अगली चार सदी तक उनकी हुकूमत कायम रहेगी. ब्रिटिश सरकार ने खलीफा पर ताना मारते हुए कहा था कि वास्तव में वे मुसलमानों के असल नेता हैं क्योंकि ओटोमन साम्राज्य से अधिक मुसलमान ब्रिटिश हुकूमत के अधीन रह रहे हैं. लेकिन अब यह ताना उलटा पड़ गया है.

इस्लाम के उदय के बाद 1918 में ब्रिटिश ऐसे पहले गैर मुस्लिम थे, जिनका मक्का और मदीना पर नियंत्रण था. जब खलीफा ने मदीना के गर्वनर के साथ संधि की तो एक ओटोमन अधिकारी ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया था. इसकी वजह धोखा देना नहीं बल्कि एक उद्देश्य था. वह दस महीने संघर्ष करता रहा, क्योंकि वह पैगंबर मोहम्मद के कुछ दुर्लभ निजी सामानों को मदीना से तुर्की ले जाने के लिए समय चाहता था.

उसने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये सभी ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ाएंगे. आज ये सामान इस्तांबुल के टोपकापी महल में हैं. यही वजह है कि ब्रिटिश म्यूजियम में हज यानी लंदन से इस्लाम के हृदय मक्का तक की यात्रा पर होने वाली शानदार प्रदर्शनी में पैगंबर का सामान शामिल नहीं है. लंदन दौरे में मैं इस सफर का हिस्सा बनने पर गौरवान्वित था.

फ्रांसीसियों के विपरीत अंगरेज सिर्फ दिखावे के लिए प्रदर्शनी लगाना पसंद नहीं करते. लेकिन कोई भी उनकी तरह प्रदर्शनी को जीत की शक्ल नहीं दे सकता. शायद अंगरेज छिपी हुई पहचान में ही सर्वश्रेष्ठ होते हैं. क्योंकि इस तरह की प्रदर्शनियों में किसी का नाम नहीं होता, बल्कि ये सामूहिक प्रयास की निशानी होती हैं. शायद ही कोई दूसरी नौकरशाही इतनी प्रेरणादायी हो.

दरवाजे पर दिल को छू देने वाली अजान की आवाज ने मेरा स्वागत किया. यहां कुरान की आयतों की व्याख्या की जा रही थी. इस्लाम के पूरे इतिहास और संस्कृति से यहां रूबरू हुआ जा सकता था. इस जादुई सैर में शामिल हुए सैकड़ों बच्चों और वयस्कों के चेहरे पर आश्चर्य और खुशी को महसूस किया जा सकता था. ब्रिटिश म्यूजियम ने एक प्रदर्शनी को तीर्थ यात्रा में बदल दिया था.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
15.04.2012, 11.28 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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