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सिक्स, सेक्स और आइपीएल

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सिक्स, सेक्स और आइपीएल

एम जे अकबर

आईपीएल


एक सवाल का जवाब जानने के लिए मैं उत्सुक हूं कि महान विचार के साथ महान सौभाग्य का संयोजन कितना उत्तेजक होता है? ऐसे अचंभित करने वाले विचार इतिहास में भरे पड़े हो सकते हैं, लेकिन वे आकार नहीं ले पाये, क्योंकि उनका सौभाग्य नहीं था कि वे पूंजी को आकर्षित कर सकें या सही विचारों को मूर्त रूप लेने का सही वक्त नहीं आ पाया था.

इंडियन प्रीमियर लीग के प्रतिभाशाली खोजकर्ता ललित मोदी का विचार भी असफल हो गया होता, अगर वह ऐसा दस साल पहले करने की सोचते. अगर आइपीएल केवल क्रिकेट होता तो वह न तो इस विधा में एक फीके जुड़ाव मात्र से कुछ ज्यादा होता और न ही असली क्रिकेट.

यह भव्य इसलिए बन पाया, क्योंकि इसने खेल और दर्शक को लचीली नैतिकता और युवा भारत की मनोरंजन जरूरतों से जोड़ दिया. इस बात पर बहस हो सकती है कि बिना सामाजिक सुधार के आर्थिक सुधार नहीं किये जा सकते या इसके उलट दोनों मामलों में भारत में दोनों चीजें हैं.

आइपीएल सिक्स और सेक्स की उत्तेजना से जुड़ा हुआ है. बिकनी पहनी चीयर लीडर्स डांस के झूठे तर्क के नाम पर अंग प्रदर्शन करती हैं और खेल के बाद सेक्स से भरी पार्टियों की कहानी आज खेल के मैदान पर 22 खिलाड़ियों की प्रतिस्पर्धा के अनुभव के लिए जरूरी बन गयी है.

कभी खेल को दूसरे अर्थो में युद्ध कहा गया था. लेकिन आइपीएल दूसरे संदर्भो में एक रात का ठिकाना बन गया है. किसी को इस बात की फिक्र नहीं कि कौन जीतता है या हारता है? सभी केवल उत्तेजना और तनाव के बारे में सोचते हैं, जो खेल के आखिरी ओवर में खत्म होता है. वैसे ही जैसे सेक्स में दोनों पक्षों की जीत होती है.

जन-मनोरंजन लोगों की व्यक्तिगत समझ का जोड़ होता है. दूसरे परिवर्तनों की तरह भारत में एक यौनिक क्रांति भी पिछले कम से कम दो दशकों से सतह के भीतर से उभार ले रही थी. इसका पहला आईना मुंबई का व्यापारिक सिनेमा था, जो सड़कों पर टिकट बेच कर बचा रहा.

नामी फिल्म डांसर हेलेन को आज भुला दिया गया है, जिन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत 50 के दशक वाली स्कर्ट से की और इसका समापन 80 के दशक वाले थोड़े चिपके और पारभासी किस्म के कपड़ों से की. आज के आइटम नंबर, शरीर को किसी कल्पना के लिए नहीं छोड़ते हैं.

यौनिकता को लेकर हमारी कल्पना काफी लंबी यात्र कर चुकी है. अब आपको प्रमाण के लिए सेक्स स्कैंडल के विवरण जमा करने पड़ेंगे, जो पूरी पहरेदारी वाले राजनीतिक वर्ग से छनकर समाचार बन पाते हैं. समकालीन भारतीय कल्पनाशीलता पूरी तरह दूसरी कहानी है.

सिनेमा की पहुंच हॉल तक सीमित थी. टेलीविजन ने आइटम नंबरों और गानों के जरिये इस क्रांति को घरों तक पहुंचा दिया. बाजार का दबाव इतना व्यापक था कि प्रिंट ने भी इसका अनुसरण किया. इस नयी नैतिकता ने धर्म को खारिज नहीं किया.

भले ही अब हम भगवान से यह कहते नहीं सुनते कि (ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरी मेरे नालें) या भगवान को चुनौती नहीं देते (भगवान कभी दो घड़ी इंसान बन के देख, धरती पर कभी चार दिन मेहमान बन के देख) लेकिन धर्मग्रंथों के शब्द आज भी परदे पर हावी हैं. साथ ही कव्वाली भी पहले की तरह प्रसिद्ध है.

धर्म का प्रभाव अभी भी गैर-सांप्रदायिक है, लेकिन नैतिकता अब सिर्फ मध्यवर्ग के बेडरूम की विशेषता नहीं रह गयी है. इसकी व्यापक भूमिका शासन में जवाबदेही की ओर खिसक गयी है. भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष अपनी कहानी खुद बयां करता है. मीडिया के सभी आयामों को जरूर नेतृत्व देने के लिए आगे आना चाहिए. यहां लाइफस्टाइल भी साथ रह सकता है, लेकिन पिछले पन्ने पर.

भाग्य ने ललित मोदी का साथ छोड़ दिया, क्योंकि वे भूल गये कि सार्वजनिक जीवन से वित्तीय पारदर्शिता को दरकिनार नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद हमें उनके आइपीएल के प्रभाव को स्वीकार करना होगा. इससे होने वाले अतिरिक्त फायदे अचंभित करने वाले हैं.

मेरा स्पष्ट मानना है कि आइपीएल ने वेस्टइंडीज में क्रिकेट को फिर से जिंदा कर दिया है. अब प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए अभूतपूर्व वित्तीय इनाम उपलब्ध हैं. आज सर गारफील्ड सोबर्स खेलते तो वे सचिन तेंदुलकर की तरह ही अमीर होते. आज वेस्टइंडीज की युवा पीढ़ी क्रिस गेल बनने का सपना देख रही होगी.

क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि विव रिचर्डस को देखते कितने दर्शक आते? पहले चमकते क्रिकेट खिलाड़ी और गुमनामी के अंधेरे में खोये क्रिकेटरों के बीच फासला अधिक था. आज लोग कल के सितारे को मैदान पर देखते हैं और उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानते हैं. चयन में भेदभाव अभी भी संभव है, लेकिन उतना आसान नहीं है. आज आइपीएल क्रिकेट के सालाना मौसम का हिस्सा बन गया है. सभी मौसम एक समान नहीं होते, लेकिन उपज के उत्सव पर तो खुशी मनाई ही जाती है. आइपीएल इनाम की उपज है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
22.04.2012, 06.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित