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बस्तर के सवाल

बहस

 

बस्तर के सवाल

आनंद मिश्रा


यह कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन के अपहरण के बाद वाली सुबह का वाकया है. एक मित्र ने सुबह पूछा कि जिलाधीश मेनन का अपहरण हो गया, कहां है शांति मिशन वाले, मानवाधिकार वाले...क्यों नहीं आ रहे हैं. मैंने कहा-ठीक कहते हैं किंतु माओवादियों से लड़ने को तैयार, हर उस व्यक्ति जिन्हें वे माओवादी समर्थक मान लेते हैं, उन्हें रायपुर से जगदलपुर तक सड़कों पर चलने नहीं देते हैं, वे लोग भी अभी नहीं दिख रहे हैं.

अलेक्स पॉल मेनन


आज डा.ब्रह्मदेव शर्मा शासकीय मेहमान हैं क्योंकि कलेक्टर को छुड़ाना है. स्वामी अग्निवेश की घटना याद करें, जब पुलिसकर्मियों का अपहरण हो गया था. छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें मध्यस्थ बना कर जंगल में भेजा. मुख्यमंत्री रमन सिंह उन्हें बाजू में बिठा कर गौरवान्वित हुए. बाद में उन्हें क्या कहा, उनके साथ कैसा बर्ताव किया, यह जगजाहिर है. खुद दो दशक पहले तब के आईएएस अफसर ब्रह्मदेव शर्मा को मुंह काला कर कपड़ा फाड़ जगदलपुर की सड़कों पर घुमाया गया था. क्या इस अजीब और दोहरे चरित्र पर हमें आश्चर्य नहीं होता कि जब काम पड़ा तो मेहमान, नहीं तो छत्तीसगढ़ में पैर नहीं रखने देंगे का मुख्यमंत्री और गृहमंत्री का सरकारी उद्घोष!

कलेक्टर के अपहरण के बाद यह बात और साफ हो गई है कि माओवादी भी इस दोहरेपन से अलग नहीं हैं. व्यक्तिगत तौर पर तमाम तरह की हिंसा का कट्टर विरोधी होने के बाद भी पूछने का मन करता है कि गरीब आदिवासी, सरपंच, पटवारी, सिपाही के रिश्तेदार जब पकड़े गए तब तुरंत जनअदालत लगाकर सिर कलम कर दिया जाता है लेकिन बड़े अधिकारी पकड़े जाते हैं तो माओवादियों को उनके स्वास्थ की चिंता होने लगती है. दवा-दारु की बात की जाती है. गरीबों के लिये जन अदालत और बड़े अफसरान के लिये मध्यस्थ...!

कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन के मामले में भी खुद उनके अंगरक्षकों को क्या सजा मिली? माओवादियों के जनअदालत के अलग-अलग कानून हैं. किसी भी ठेकेदार या प्रभावशाली आदमी को नहीं पकड़े जाने की मजबूरी समझ में आती है किंतु बड़े अधिकारी जिसे वर्गशत्रु माना जाता है, बड़े पद का प्रभाव वहां भी है, इस बात को झूठा साबित करने के लिये माओवादियों के पास दुनिया की किसी भी भाषा के शब्द अब कम पड़ जाएंगे.

दूसरी और कलेक्टर अपहरण के बाद सवाल उठता है कि सरकार की नीति क्या है? मांद में घुसकर चुनौती देने की बात और नक्सलियों को पूरी तरह से मिटा देने की घोषणा अंततः 1967 से आज तक कहां आ पहुंची है ? छत्तीसगढ़ में गाहे-बगाहे मंत्री-मुख्यमंत्री ऐसी हुंकार भरते हैं और ऐसी हरेक हुंकार के बाद नक्सली कोई ऐसी घटना को अंजाम देते हैं, जिसके कारण सरकार उल्टे बांस बरेली की मुद्रा में आ जाती है.

पिछले कई सालों से नक्सलियों के सहयोगियों के नाम पर बिना मुकदमा सैकड़ों निर्दोष लोगों को जेल में सड़ने के लिये छोड़ दिया गया है. नक्सलियों का सहयोगी कह कर रायपुर से जगदलपुर तक उनके खिलाफ सरकार हमले करती है. ऐसे लोगों को सड़क पर नहीं चलने देना, सार्वजनिक अपमान, धक्का-मुक्की, मारपीट, अंडा फिंकवाना और फिर इन सब से परे असली और हार्डकोर नक्सलियों से बातचीत के लिये तत्परता.... पुलिस के छोटे कर्मचारी, दूसरे कर्मचारी, सरपंच पकड़े जाते हैं और मारे जाते हैं तो कहीं कोई हलचल नहीं होती. सरकार एक रटी-रटाई विज्ञप्ति जारी कर मुक्ति पा लेती है. दूसरी ओर एक कलेक्टर के पकड़े जाने भर से सरकार हिल जाती है या कम से कम हिलती हुई दिखती है.

बड़े अफसरों को अतिरिक्त सुरक्षा बरतने की सलाह देने वाली सरकार भूल जाती है कि कि बस्तर के क्षेत्र में नौजवान पुलिसकर्मियों को गश्त में भेजा जाता है तो पीछे कोई सपोर्ट पार्टी तक नहीं होती. यदि सुरक्षित आ गये तो ठीक नहीं तो पीछे रिलीफ पार्टी जाती है और फिर शवों को ताबूत में बंद कर ले आती है. अपनी लेट-लतीफी के लिये कुख्यात हो चुके बड़े अफसरान और मंत्रियों की प्रतीक्षा में पूरा-पूरा दिन शव उन्हीं ताबूतों में पड़ा रहता है. अफसर मंत्री के फूल और बेअसर हो चुकी श्रद्धांजलि के दो शब्द की प्रतीक्षा में शवों की और दुर्गति होती रहती है. फिर शाम ढ़ले उन शवों को गाड़ियों में लाद कर उन गरीब पुलिस के जवानों के घरों के लिये रवाना कर दिया जाता है. ऐसे जवानों के परिवार जब अनुकंपा नियुक्ति के लिये आते हैं या दूसरे कागजी कार्रवाईयों के लिये आते हैं तो इन शहीदों को कोई पूछने वाला नहीं होता. पुलिस अधीक्षक के कार्यालयों में धक्के खाते ऐसे शहीदों के परिजनों को आप कहीं भी देख सकते हैं.

छत्तीसगढ़ में सरकारी व्यवस्था कितनी संवेदनशील है, यह इसी से पता चलता है कि बिलासपुर के पूर्व पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा की संदेहास्पद मौत के दो माह होने को आ गये, लेकिन आज तक इस मामले में एफआईआर तक नहीं हुआ है. जांच की बात तो छोड़ ही दें. राज्य की सरकार ने हाथ खड़े कर लिये हैं- सीबीआई जांच नहीं कर रही है, हम क्या करें? सीबीआई कहती है कि हमें न तो राज्य सरकार से कोई अनुरोध पत्र मिला है और ना ही इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज हुई है. तो हम जांच कैसे करें ?

पिछले कुछ सालों में लगातार हर घटना को भूल जाने की बीमारी से ग्रस्त जनता ऐसी घटनाओं को भूल जाती है. एसपी राहुल शर्मा के मामले में घटना के समय जनता की संवेदना और आक्रोश दिखी तो राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुया, पूरा प्रदेश शासन शवयात्रा में शामिल हुआ. दिन बीतने लगे और सरकार ने पल्ला झाड़ लिया.

कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन के अपहरण और रिहाई के बीच सरकार और माओवादी, दोनों के दोहरे चरित्र उजागर हो गये हैं. गरीब आदिवासी की जान की कीमत की परवाह दोनों में से किसी को नहीं है. ऐसी घटनाओं के बीच यह दावा हास्यास्पद लगता है कि दोनों आदिवासी के विकास के लिए समर्पित हैं. आदिवासी के विकास के लिए दोनों के पास अपने-अपने कार्यक्रम हैं.

आदिवासियों का दुर्भाग्य है कि जहां वे रहते हैं, उन्हीं जमीनों के नीचे प्राकृतिक संसाधन हैं. माओवादी वहीं हैं, जहां प्राकृतिक संसाधन हैं. माओवाद गुजरात, झाबुआ मध्यप्रदेश और राजस्थान के गरीब आदिवासियों के लिए नहीं है. उन्हीं आदिवासियों के विकास के लिए यह माओवाद प्रतिबद्ध है, जहां प्राकृतिक संसाधन हैं. सरकार और माओवादियों के कथित द्वंद के बीच बस्तर के जंगल खाली हो रहे हैं. इंद्रावती के पानी से खेत की सिंचाई के लिए योजना नहीं है.बस्तर का संसाधन पानी में घोलकर विदेश भेजा जा रहा है. उद्योगपति बस्तर पहुंच रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर के ठेकेदार भी निर्भय और नि:संकोच पहुंच रहे हैं. सरकार और माओवादी, दोनों के एजेंडे में बस्तर का औद्योगिकरण शामिल है. आदिवासियों के लिये शासकीय आश्रय स्थल निर्धारित कर दिये गये हैं. आज के बस्तर के विनाश पर ही कल के बस्तर का विकास अवलंबित है.

आखिरकार हमारी विकास की अवधारणा भी तो यही कहती है कि सबका विकास जब संभव नहीं है तो क्यों नहीं 85 प्रतिशत लोगों की कीमत पर कम से कम 15 प्रतिशत लोगों का विकास हो जाये. सरकार की नीतियां साफ कहती हैं कि इन 15 प्रतिशत लोगों के विकास की कीमत 85 फीसदी लोगों को जैसे भी हो चुकाना ही पड़ेगा, जान दे कर भी.

बस्तर एक प्रश्नवाचक चिन्ह है और हम सब शोक, संवेदना, क्षणिक आवेश और थोड़े से शब्दों की जुगाली करते ऐसे लोग, जिन्हें सरकार और माओवादियों के हांके के लिये छोड़ दिया गया है. क्या सोचते हैं आप ?


01.05.2012, 15.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

yogendra thakur [yogdunia@yahoo.co.in] jagdalpur - 2012-05-06 16:21:40

 
  एक आम बस्तरिया सब समझने लगा है केवल राजनीति को छोड़कर. वह जानता है अंदर और बाहर वालों को, फिर भी खामोश है क्योंकि उसे औऱ उसके परिवार को यहीं रहना है. इसलिये ही वह दो पाटों के बीच पीस रहा है. ये नेता, ये व्यापारी, ये नक्सली औऱ अधिकारी अपने स्वार्थ सिद्धी में लगे हुये हैं. बस्तर के नाम पर सहानूभुति और धन दोनों कमा रहे हैं. इन पर कभी कोई हमला नहीं होता. इनके परिजन नहीं मारे जाते. मरता औऱ फंसता है तो छोटा कर्मचारी, गरीब आदिवासी औऱ आम बस्तरिया. नक्सलवाद सरकार के लिये अब एक ऐसा उद्योग बन गया है, जिसमें सभी लोग लूटने में लगे हुये हैं. 
   
 

ved vilas [ved vilas@gmail.com] noida - 2012-05-04 08:31:54

 
  Good article, it shows myopic policies of our governments, now situation is uncontrolled. There is no luster in the face of Adiwasis. 
   
 

Alok Shukla [cbaraipur@gmail.com] Raipur - 2012-05-02 05:38:28

 
  आनंद भैया आपने सही कहा पैसे वाले उच्च पद पर आसीन व्यक्ति की जान की कीमत होती हे गरीब व्यक्ति की जान की किसे परवाह. बस्तर में चल रहे इस द्वन्द में आदिवासी ही मर रहा हे, लगभग 460 गाँव ख़त्म हो गए, लाखो लोग पलायन कर गए इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? संसाधनों की लूट का एकमात्र राश्ता हे आदिवासियों का खातमा क्योंकि संसाधन आदिवासियों के जीने का साधन हे और पूंजीपतियों की लालच जो एक साथ नहीं चल सकता..
कलेक्टर की रिहाई के बाद राज्य सरकार विडिओ फुटेज देखेगी की कही बी डी शर्मा जी ने लाल सलम तो नहीं बोला और एक पूरा अभियान चलेगा उन्हें नक्सली घोषित करने का जैसे अग्निवेश जी के साथ हुआ था और कुछ मीडिया भी अपनी पूरी भागीदारी देगा.
खेल बड़ा हे नक्सली उन्मूलन के नाम पर अरबो रुपयों का केंद्र का फंड जिसका आडिट नहीं होता. फिर अपनी नाकामी छुपाने का भी बड़ा माध्यम की हम विकास इसलिए नहीं कर पाते क्यूंकि वह नक्सली हे. कौन चाहेगा शांति वार्ता? आज फस गए तो चर्चा याद आ गयी कल वही ताल पुनः मांद में घुसकर हमला.
 
   
 

vivek [] - 2012-05-01 18:52:48

 
  डकैत है दोनो तरफ, एक जो सिस्टम use कर के आते हैं. और दूसरे वो जो उनका oppose करने का नाटक करते हैं. बीच में नेता और so called बुद्धिजीवी भी अपनी रोटी सेंकते हैं. मूर्ख जनता democracy के नाम पर छली जाती है. और अपनी कायरता को छिपाने के लिए candle march करती है.  
   
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