यह क्या है मनमोहन जी
बात पते की
यह क्या है मनमोहन जी
प्रीतीश नंदी
मैं अन्ना हजारे और उनकी टीम के सदस्यों की इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि
प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह भ्रष्ट व्यक्ति हैं. लेकिन अनेक भारतीयों की तरह मैं
भी यही सोचता हूं कि शायद अब उनके द्वारा सार्वजनिक जीवन को अलविदा कहने का समय आ
गया है.
अभी तक इस तरह की बातें उनके आलोचकों द्वारा ही कही जा रही थीं, अब उनके समर्थक भी
घुमा-फिराकर यही बात कहने लगे हैं. लगता नहीं कि अब वे हमारे राजनीतिक परिदृश्य में
अपनी ओर से कोई और योगदान कर सकते हैं. शायद यही श्रेयस्कर होगा कि कोई और व्यक्ति
आगे बढ़े और देश के राजकाज की कमान अधिक बेहतर व प्रभावी ढंग से संभाले.
एक कहावत है -देखते हुए भी अनदेखा कर देना. शायद यह बात हमारे प्रधानमंत्री पर
जितनी अधिक लागू होती है, उतनी किसी अन्य व्यक्ति पर नहीं. वे भलीभांति देख सकते
हैं कि उनके आसपास क्या हो रहा है, क्या चल रहा है. इसके बावजूद लगता है, जैसे इस
सबसे उनका कोई सरोकार नहीं है, या अगर कोई सरोकार है भी, तो शायद वे ऐसा दिखावा कर
रहे हैं, मानो उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
देश के लिए नुकसानदेह किसी भी गलत चीज की ओर इशारा करें तो उनकी पहली प्रतिक्रिया
उसे नजरअंदाज कर देने की ही होती है. लगता है कि वे यह मान चुके हैं कि जो कुछ वह
देखना नहीं चाहते, उसका कोई अस्तित्व नहीं है. अपराध हो या भ्रष्टाचार, अन्याय हो
या मानवाधिकारों का उल्लंघन, वे महज अपनी आंखें मूंदकर किसी भी चीज की अनदेखी कर
सकते हैं.
संभव है, यह उनके लिए अच्छा हो, लेकिन मुझे नहीं लगता यह देश के लिए अच्छा है. मैं
विपक्षी दलों का प्रशंसक नहीं हूं. हो सकता है कि विपक्षी दलों में बैठे लोग भी
कमोबेश उन्हीं तरह की बुराइयों के शिकार हों, जिनका शिकार हमारा सत्ता तंत्र है.
लेकिन शिकायत विपक्ष से नहीं, सत्तारूढ़ दल से ही की जाती है. देश मुश्किल भरे दौर
से गुजर रहा है. ऐसे हालात में हमें सरकार में ऐसे लोगों की जरूरत है, जो देश को
आगे ले जाएं. छोटे-मोटे नीतिगत बदलावों से कुछ हासिल नहीं होगा. हमें सुदृढ़
कार्रवाइयों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़े मानदंडों की आवश्यकता है.
देश के पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की तुलना में डॉ मनमोहन सिंह की सोच एकदम विपरीत
है. वे सोचते हैं कि उनका काम केवल आर्थिक निर्णय लेना है. वे स्वयं को ज्यादा से
ज्यादा एक सुपर फाइनेंस मिनिस्टर मानते हैं, उससे अधिक नहीं.
विज्ञान या तकनीकी में उनकी कभी कोई दिलचस्पी नजर नहीं आई, कला और संस्कृति से कभी
उनका कोई लेना-देना नहीं रहा, उन्होंने कभी शिक्षा या चिकित्सा से संबंधित मसलों
में रुचि नहीं ली, न तो न्याय और मानवाधिकार और न ही पर्यावरण और लोक स्वास्थ्य
जैसे मसलों से उनका ज्यादा सरोकार नजर आता है. वे कभी-कभी विदेश नीति से जुड़े
मामलों में जरूर दिलचस्पी लेते हैं, लेकिन केवल उसी सीमा तक, जहां तक उनका नाता
व्यापार और वाणिज्य से हो. संक्षेप में देश के लिए बुनियादी महत्व के अधिकतर मसलों
में उन्होंने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई है, जिसका नतीजा यह रहा है कि अब लोग उनसे
मायूस और नाउम्मीद होने लगे हैं.
प्रधानमंत्री विद्वान अर्थशास्त्री हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी उनकी
सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों को देश के लिए बहुत हितकारी नहीं कहा जा सकता. एक के
बाद एक अदूरदर्शी निर्णयों के कारण अर्थव्यवस्था बदहाल होती जा रही है. आर्थिक
सुधार लंबे समय से लंबित हैं.
अविवेकपूर्ण कदमों के कारण विदेशी निवेशक हमसे मुंह मोड़ने लगे हैं. रुपए का मूल्य
44 रुपए प्रति डॉलर से गिरकर 56 रुपए हो गया है. वोडाफोन कंपनी से 11 हजार करोड़
रुपए का कर पाने के लिए कानून में अतीत की तारीख के अनुसार परिवर्तन किया गया और
जीएएआर प्रस्तुत किया गया. इसका हमें खासा नुकसान हुआ.
आज सरकार अपने खर्चे पूरे करने के लिए हर सप्ताह 15 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले रही
है. धन की तंगी से बदहाल बैंकें रिजर्व बैंक से रोज करोड़ों का कर्ज ले रही हैं.
पिछले छह माह में इक्विटी इंवेस्टर्स ने रोज तीन हजार करोड़ रुपए गंवाए हैं. निराशा
का माहौल विदेशी निवेशकों में ही नहीं, बल्कि भारतीय उद्यमियों में भी है, जो
अन्यत्र पलायन करने की तैयारी करने लगे हैं. वे एक ऐसे परिवेश में खुद को सुरक्षित
अनुभव नहीं करते, जहां सरकार और उसकी एजेंसियां किसी भी व्यक्ति को किसी भी आधार पर
प्रताड़ित कर सकती हैं.
रुपया गिरने के साथ ही हमारी बचतों को भी नुकसान पहुंचा है, हमारे प्रभावी वेतनमान
संकुचित हुए हैं और मुद्रास्फीति भयावह रूप से बढ़ गई है. और इन तमाम स्थितियों को
दुरुस्त करने के लिए क्या किया गया है? हर महीने पेट्रोल की कीमतें बढ़ाई गई हैं.
अधिक कर लगाने के बारे में विचार किया जा रहा है.
हम, जो कुछ समय पहले तक दुनिया की आर्थिक महाशक्ति होने का दावा किया करते थे, अब
महानिर्धन होने की ओर अग्रसर होने लगे हैं. लेकिन सबसे बुरी बात यह हुई है कि सत्तर
के दशक के इंस्पेक्टर राज की वापसी हो रही है. देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान
पहुंचाने वाले लोगों को हटाया नहीं गया, उल्टे उन्हें बचाने और उनके विरुद्ध उठी
आवाजों को कुचलने की कोशिश की गई. सोशल मीडिया को नियंत्रित करने जैसी बातों से
दुनिया में भारत की उदारवादी लोकतांत्रिक साख को भी क्षति पहुंची. सरकार काटरून से
लेकर पाठच्यपुस्तकों और फिल्मों, संगीत, किताबों, सार्वजनिक प्रस्तुतियों, इंटरनेट
साइट्स सभी पर पाबंदी लगाने को आमादा नजर आती रही.
क्या माननीय प्रधानमंत्री अपने पीछे यही विरासत छोड़कर जाना चाहते हैं- पंगु
अर्थव्यवस्था, प्रताड़ित नागरिक, प्रतिबंधित अभिव्यक्ति? और क्या भारत की गौरवशाली
विकास गाथा एक दूरस्थ स्मृति बनकर ही रह जाएगी?
07.06.2012, 00.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित