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जनता का ट्रायल

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जनता का ट्रायल

एम जे अकबर


राजनेता कानून से डरते हैं, ऐसा होना भी चाहिए. लेकिन, उन्हें सबसे ज्यादा भय लगता है जनमत के फैसले से. अदालती कार्रवाई व्यक्तिगत खतरे से अधिक नहीं होती. कानून के बारे में कहा जाता है कि वह अपना काम करती है और अकसर अत्यधिक देरी के कारण लक्ष्य को गंवा देती है. जनमत को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में थोड़ा वक्त तो लगता है, पर वह अटल होता है. वह तयशुदा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हर पांच साल या उससे पहले भी कठोर और निर्मम फैसले सुनाता है.

चिदंबरम


मद्रास हाइकोर्ट ने आदेश दिया है कि केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम को चुनावी गड़बड़ियों और घोखे के लिए ट्रायल से गुजरना ही होगा. चिदंबरम पर 2009 के आम चुनाव में मतगणना प्रक्रिया में गड़बड़ी करने का आरोप है. लेकिन जनमत का निर्णय कानूनी प्रक्रिया से आगे चलता है. चिदंबरम अपने निर्वाचन क्षेत्र शिवगंगा से अगला चुनाव नहीं जीत पायेंगे. इसी कारण से यह विरोधाभास पनपा है, जिसे कांग्रेस स्वीकार नहीं करना चाहती.

विपक्षी दल मौके -बेमौके चिदंबरम के इस्तीफे की मांग करते रहते हैं. लेकिन, उनका मूल मकसद ऐसा नहीं होता. गृह मंत्री के तौर पर चिदंबरम विपक्षी दलों के लिए अधिक उपयोगी हैं न कि संसद में बैठे एक कुशल वकील के तौर पर. अगर कोई वरिष्ठ मंत्री है, जिसने विपक्षी दलों को 2009 के हार के गम से बाहर निकलने में सबसे अधिक मदद की है, तो वे चिदंबरम ही हैं. गड़बड़ी की फेहरिस्त में तेलंगाना सबसे उम्दा उदाहरण है.

जब कांग्रेस नेतृत्व आम धारणा के खिलाफ जाकर चिदंबरम के पद पर बने रहने का बचाव करती है, तो सार्वजनिक तौर पर विपक्षी दल विरोध जाहिर करते हैं, पर निजी तौर पर खुश होते हैं. विपक्ष एक सीमा के बाद विरोध जाहिर नहीं करता.

आखिर क्यों वे कांग्रेस के जख्म को भरने में सहयोग दें? चिदंबरम के चुनावी ट्रायल में आने वाले सभी उतार-चढ़ाव भूखे मीडिया को दाना-पानी मुहैया करायेंगे. रिपोर्टर सबूत जुटाकर ऐसी खबरें सामने लायेंगें कि चिबंरम पद का इस्तेमाल अपने खिलाफ चल रहे मामले को कमजोर करने के लिए कर रहे हैं. यह नौटंकी लगातार अखबारों और टेलीविजन चैनलों पर चलती रहेगी.

अगर चिदंबरम को कैबिनेट से हटा दिया गया, तो इस मामले में जिज्ञासा खत्म हो जायेगी. समाचार की खोज में रहने वाले उनका पीछा करना छोड़ देंगे. दूसरे कार्यकाल का तीसरा साल सामान्यतया धीमा होता है. या तो उस समय तक सरकार अप्रासंगिकता की ओर जाने लगती है या धीरे-धीरे अपने विकल्प को अप्रासंगिक बना देती है.

हालांकि यह साल काफी अशांत रहा है. हालांकि, ज्योतिषी इसका कारण ग्रहों की हलचल को बता रहे हैं. लेकिन, इसका कारण बिल्कुल साधारण है. कांग्रेस हाइकमान का गलत निर्णय भी इसका एक कारण है. कांग्रेस के लिए असाधारण खराब स्थिति होगी उसकी सबसे बड़ी पूंजी प्रणब मुखर्जी का जून के आखिरी में राजनीतिक दांवपेंच से हटकर देश के शीर्ष पद पर बैठना और सबसे बड़े बोझ चिदंबरम का ऐसे कमजोर घोड़े के तौर पर पद बने रहना.

कांग्रेस को जब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की घोषणा करनी चाहिए, ऐसे समय में व्यक्तिगत कारणों से सोनिया गांधी को भारत से बाहर जाना पड़ा है. तकनीकी तौर पर ऐसा जून के तीसरे हफ्ते से पहले करना जरूरी नहीं है, लेकिन राजनीतिक बुद्धिमता इस ओर इशारा करती है कि धुंध में तैरना खतरनाक होता है, चाहे धुंध कृत्रिम तौर पर ही क्यों न बनायी गयी हो. आप नहीं जानते कि कब राह में मुलायम सिंह यादव की दीवार से टक्कर हो जाये. यादव के स्पष्ट संदेश के बिना कांग्रेस उम्मीदवार दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है और सरकार अस्पताल पहुंच सकती है. ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे विश्वसनीय उम्मीदवार निश्चित तौर पर प्रणव मुखर्जी हैं.

सोनिया गांधी राजनीतिक तौर पर इतनी मजबूत नहीं है कि वे ज्यादा खतरे उठा सकें. इसका मतलब सरकार चला रहे व्यक्ति को बदलना और टूटे टुकड़ों के साथ नया खेल शुरू करना होगा. मुखर्जी को इस खेल में बनाये रखने का एक मात्र तरीका है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति भवन भेजना और उनकी जगह प्रणब को बैठा देना.

इसका मतलब होगा रणनीति में व्यापक बदलाव. मुखर्जी ऐसे संतरियों, घोड़ों और शूरवीरों का स्थान नहीं लेना चाहेगें, जिनके बारे में उनका मानना है कि वे मुरझा गये हैं या बौद्धिक तौर पर असहाय हो गये हैं. वे जानते हैं कि इन थके-हारे चेहरे के सहारे वे जनमत के रुख को नहीं बदल सकते हैं. ना ही वे एक हारे हुए व्यक्ति के तौर पर खुद को याद किया जाना पसंद करेंगे.

हम नहीं जानते कि जून के अतीत बन जाने के बाद क्या होगा, लेकिन यह जरूर जानते हैं कि अनिर्णय लंबे समय तक विकल्प नहीं बना रह सकता है. चिदंबरम का ट्रायल अदालत में होगा, लेकिन कांग्रेस सरकार भी रोजाना सामने आ रहे सबूतों और बहसों में सार्वजनिक तौर पर कठघरे में खड़ी की जा रही है. यही दूसरा फैसला इतिहास की किताबों में जगह बनायेगा, जबकि पहले पर केवल कुछ ही वाक्य होंगे.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
10.06.2012, 00.14 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

GOPAL PRASAD [gopal.eshakti@gmail.com] DELHI - 2012-06-21 13:31:13

 
  अनिर्णय लंबे समय तक विकल्प नहीं बना रह सकता है. 
   
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