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एजाज अहमद | आज का दौर

आज के दौर की तस्वीर: तीन | किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि ?

 

लोकतांत्रिक मांग की सदी

एजाज अहमद

अनुवादः श्री प्रकाश

 

 

 

 

बीसवीं सदी के बारे में लिखी गई श्रृंखला के अंतर्गत पिछले दो लेखों में प्रोफेसर एजाज अहमद ने प्रस्तावित किया है कि समाजवादी व राष्ट्रीय मुक्तिकामी ताकतों और साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच चला संघर्ष इस सदी का महत्वपूर्ण व प्रतिनिधि पहलू रहा है. इस संघर्ष के दौरान वामपंथ की उपलब्धियों व पराजय को भी प्रो0 अहमद ने दिखाया है. एजाज अहमद मानते हैं कि समाजवाद व राष्ट्रीय मुक्ति के लिए चले ये संघर्ष जीवन के हर पहलू (आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक) को लोकतांत्रिक बनाने के लिए जारी अभियान का ही एक हिस्सा रहे. यहां प्रो0 अहमद बता रहे हैं कि विभिन्न वर्गों के लिए लोकतंत्र का क्या अर्थ है और इस सदी में कैसे इसी लोकतंत्र को लेकर लडाइयां लड़ी गयीं. इस श्रृंखला में आने वाले लेख पहले तो साम्राज्यवादी हमलों की प्रकृति का लेखा-जोखा सामने लायेंगे, फिर वे क्रांतिकारी कार्यभार के भविष्य और भावी विद्रोहों के संभावित स्वरूप के सवाल की तरफ लौटेंगे.


मैं निम्नलिखित 5 बिंदुओं को विचारार्थ रखना चाहता हूं:

• वर्तमान लोकतंत्र, चाहे वह अपनी प्रकृति में औपचारिक हो या बुर्जुआ, दरअसल 20वीं सदी की देन है.
• यह लोकतंत्र भी बुर्जुआ द्वारा हासिल नहीं किया गया, बल्कि उन मजदूरों, किसानों, महिलाओं, उपनिवेश से आक्रांत लोगों, पिछड़ी जातियों व जातीय समूहों, यूरोपीय नस्लवाद के शिकार (जो गोरे नहीं थे), जिनको बुर्जुआ ने लोकतांत्रिक परियोजना से बाहर कर देने का विचार व्यक्त किया था.
• लोकतंत्र का कार्यभार बुर्जुआ से अपने हाथों में लेकर पूंजीवाद से पीड़ित लोगों ने 'लोकतंत्र' को ऐतिहासिक रूप से एक अलग अर्थ दिया और इसे एक क्रांतिकारी दिशा में आगे बढ़ाया.
• 20वीं सदी में अपना प्रभावशाली असर रखने वाले समाजवाद व राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्षों की विफलताओं ने लोकतांत्रिक परियोजना को ही संकट में डाल दिया, क्योकि लोकतांत्रिक आजादी बाजार की काल्पनिक 'स्वतंत्रता' का प्रतिंविंब नहीं है, जैसा कि बुर्जुआ वर्ग कहता है, बल्कि शोषितों के पक्ष में रैडिकल व वास्तविक बराबरी लाने के संघर्ष का एक मोड़ है और समाजवाद व राष्ट्रीय मुक्ति के लिए जारी संघर्षों के साथ अंदरूनी रिश्ता बनाये बगैर जीवित नहीं रह सकता.
• इसलिए आने वाली सदी में वामपंथ के कंधों पर मार्क्स की उस दृष्टि को पुनर्स्थापित करने का कार्यभार होगा, जिसमें उन्होंने समाजवाद को लोकतंत्र की 'पूर्ण अवस्था' के रूप में देखा है.

कुछ विचार विवादास्पद हैं, इसलिए थोड़ी व्याख्या जरूरी है. स्वयं बुर्जुआ परियोजना मताधिकार को मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार मानती है. लोकतंत्र का बीसवीं सदी की ही अवधारणा होना इस एक तथ्य से ही साबित हो जाता है कि इस सदी की शुरुआत महिलाओं द्वारा मताधिकार हासिल करने से हुई, जो सिर्फ न्यूजीलैंड और अमेरिका के योमिंग राज्य में संभव हुआ, कहीं और नहीं. लेकिन 1960 तक महिलाओं ने कुछ इस्लामपरस्त देशों और स्विट्जरलैंड को छोड़कर हर उन देशों में यह अधिकार हासिल कर लिया, जहां चुनाव होते थे. इस अकेले अधिकार से ही इस सदी में जो कुछ हासिल हुआ, उसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं.

दरअसल वास्तविक वर्तमान लोकतंत्र के विचार पर जोर देने का अर्थ यही है कि तमाम अधिकार व व्यवहार जो वास्तव में अस्तित्व में होते हैं, हमेशा सैध्दांतिक घोषणाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं. लेकिन जब अमेरिकी संविधान अगले 80 वर्षों के लिए लाखों अश्वेत अमरीकियों के लिए दासप्रथा बनाये रखने को संवैधानिक ठहराता है तो 18वीं सदी के अंतिम वर्षों के दौरान संयुक्त राज्य अमेरीका में गणतंत्र के आधार दस्तावेज में व्यक्त 'सारे मनुष्य एक समान पैदा हुए' की जोरदार घोषणा की सार्थकता कम हो जाती है.

 

दरअसल 1950 के दशकों में भी अमेरिका के अधिकतर इलाकों में गोरे और अश्वेतों के वैधानिक अलगाव का अर्थ यही है कि अमेरिका के सभी नागरिकों को औपचारिक व न्यायसम्मत बराबरी भारत में गणतंत्र की स्थापना के कुछ वर्षो बाद ही मिली.

अमरीकी व फ्रांसिसी क्रांतियों के साथ ही शुरू हुई बुर्जुआ लोकतांत्रिक परियोजना के तीन अहम पहलू सामने आये हैं. एक, सैध्दांतिक तौर पर ही सही, अरस्तू से रूसो तक के राजनीतिक विचारों वाले लोकतंत्र की तुलना में यह काफी सीमित दायरे में लोकतंत्र की परिकल्पना सामने लाती है. दूसरे, अपनी उत्पत्ति के वक्त से ही इसने अर्थव्यवस्था को राजनीति से अलग कर दिया, समानता को शुध्द रूप से कानूनी शब्दावली में पारिभाषित किया और यथासंभव अधिकांश जनता को मताधिकार से वंचित रखने का प्रयत्न किया. ('जनता' के नाम पर अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा खोखली साबित हुई. इस 'जनता' में न तो महिलाएं शामिल थीं और न ही अश्वेत देशी जनता व अफ्रीकी मूल के दास शामिल थे).

 

तीसरे, बुर्जुआ ने हमेशा अपनी खुद की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया है. क्रांतिकारी बुर्जुआ ने भी लोकतंत्र की अवधारणा को विस्तार देने के बजाय इसे सीमित रखने में ही अधिक रूचि दिखायी. इसे सैध्दांतिक धरातल पर रूसो द्वारा रखे गये सवालो के संदर्भ में देखा जा सकता है, जिसमें वह पूछता है कि क्या समानता के बगैर आप मुक्ति को समझ सकते हैं? और क्या लोग कानूनी तौर पर समान हो सकते है, जबकि भौतिक वस्तुओं व सुविधाओं तक पहुँच के मामले में वे गैर-बराबरी के शिकार हों?

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piyush (todaiya@gmail.com) bhopal

 
 अभी फिर से पूरी लेखमाला से गुजरा और गहरे तक प्रभावित हूं. रविवार का मैं कायल हूं कि वह गंभीर सरोकारों के प्रति न केवल प्रतिश्रुत है वरन अपने आचरण से उसे अनवरत चरितार्थ भी कर रहा है, गहरी अंतरदृष्टि से. 
   

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