बरसात की प्रतीक्षा में
बात निकलेगी तो
बरसात की प्रतीक्षा में
देविंदर शर्मा
इंद्र देव मेहरबान होने के बजाय एक बार फिर से ढिलाई बरत रहे हैं. जून महीने में
सामान्य से 31 प्रतिशत कम बारिश हुई और जुलाई-अगस्त महीनों में 96 फीसद बारिश के
पूर्वानुमान के बजाय 70 फीसद बारिश ही होने की उम्मीद है. खेती के लिए ये माह अहम
होते हैं, कम बारिश के चलते खरीफ की बुआई धीमी पड़ गई है.
कृषि मंत्रालय के हिसाब से अकेले पंजाब और हरियाणा में धानरोपण में 26 फीसद की
गिरावट आई है. राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में मक्का, बाजरा और
ज्वार की बुआई में भी फर्क पड़ा है. हालांकि मंत्रालय ने कहा है कि दालें, तिलहन और
गन्ने की बुआई सामान्य रही है, लेकिन बारिश में अब और देर हुई, तो खरीफ के उत्पादन
के लिहाज से यह नुकसानदेह होगा. यहां तक कि उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और
आंध्रप्रदेश में खेतों में खड़ी फसल मॉनसून में दिन-ब-दिन देरी के चलते दबाव में
है.
अगर बारिश आने में अब एक और सप्ताह देरी हुई, तो सारे आकलन उल्टे-पुल्टे साबित हो
जाएंगे.
कृषि मंत्री शरद पवार किसी भी तरह के सूखे की आशंकाओं को कम करने का भरसक प्रयास कर
रहे हैं. एक ओर जहां विकास दर फिसलकर पहले से ही 6.5 फीसद के स्तर पर आ गई है, ऎसे
में कृषि उत्पादन में कमी इसमें और नुकसान पहुंचाएगी. इसके साथ ही खाद्य
मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी सरकार के लिए ढेरों परेशानियां खड़ी कर देगी. शरद पवार ने
कहा है, "हम कम बारिश से पैदा हुई स्थिति से निपटने को पूरी तरह तैयार हैं और सभी
राज्यों को आकस्मिक योजनाओं के साथ तैयार रहने के निर्देश दे दिए हैं."
दुर्भाग्यवश, मुझे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ट्यूबवैलों के लिए न तो पर्याप्त
डीजल संग्रहण की कोई आपात योजना दिखाई पड़ रही है और न ही कृषि क्षेत्रों के लिए
अबाधित बिजली सप्लाई के आवंटन की योजना दिख रही है. ऎसा लगता है कि भारत ने सूखे से
निपटने के लिए कुछ नहीं सीखा.
यद्यपि भारतीय मौसम विभाग कह रहा है कि देश में जुलाई-सितंबर माह में सामान्य बारिश
होगी. बारिश सामान्य रहने पर भी देश के कई हिस्से सूखे की चपेट में आते हैं. बिहार,
महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कई क्षेत्रों में वर्ष 2010-11 में सूखा पड़ा,
जबकि देशभर में अच्छी बारिश हुई थी. इस वर्ष भी देखने लायक बात यह होगी कि मानसून
कितना अधिक फैलता है. इसके अलावा सितम्बर माह में अल-नीनो पैदा होने का पूर्वानुमान
मानसून को लेकर सबसे बड़ी चिंता है.
अल-नीनो ही ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया और भारत में सूखे की वजह रहा है.
हमारे मौसम विभाग के मुताबिक भी सितम्बर में अल-नीनो बनने के करीब 36 फीसद अवसर
हैं. अगर ऎेसा होता है, तो सितम्बर में सूखा रहेगा. यानी निश्चित तौर पर उत्पादन
में गिरावट आएगी. अल-नीनो के खतरे को समझने के लिए यह काफी है कि भारत को पिछली
पांच बार सूखा केवल अल-नीनो की वजह से ही झेलना पड़ा. वैश्विक स्तर पर देखें, तो
पिछले 110 साल में आए 21 बड़े सूखों में से 15 अल-नीनो की वजह से हुए.
हालांकि मानसून के व्यवहार के बारे में दीर्घकालिक भविष्यवाणियां करना आसान काम
नहीं है. यह न केवल भारतीय मौसम विभाग, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी
भविष्यवाणियां एकदम सटीक नहीं रही हैं. ये और बात है कि पिछले कुछ साल में भारतीय मौसम
विभाग ने मानसून के पूर्वानुमान के लिए सांख्यिकी पद्धति छोड़कर ज्यादा उन्नत
"डायनैमिक मॉडल" अपना लिया है. लेकिन एकदम सटीक अनुमान की अपेक्षा करना अभी भी दूर
की कौड़ी है. यहां तक कि मौसम विभाग पिछले 130 साल में सूखे का ही ठीक तरह से
अनुमान नहीं लगा पाया है.
यह अत्यंत दिलचस्प है कि हाल के वर्षों में 2009 में देश ने भयानक सूखे का सामना
किया, जबकि मौसम विभाग ने उस साल 96 फीसद बारिश होने का अनुमान लगाया था. असल में
महज 23 फीसद बारिश हो पाई थी, जिसकी वजह से धान के उत्पादन में भारी नुकसान हुआ था.
संयोग से इस साल भी मौसम विभाग ने 96 फीसद बारिश के आसार जताए हैं और देश में 70
फीसद भू-भाग पर पहले से ही मॉनसून 15 दिन देरी से है.
यद्यपि मानसून में कमी के चलते अगर सूखे के हालात बने, तो ज्यादा घबराने की जरूरत
नहीं है. राहत की बात यह है कि देश में अभी रिकॉर्ड 82.4 मिलियन टन गेहूं और चावल
भरा हुआ है. यानी कृषि उत्पादन कमजोर हुआ, तो अकाल की स्थिति नहीं बननी चाहिए.
पर्याप्त खाद्य संग्रहण मौजूद होने के साथ ही सरकार को चाहिए कि वह सभी राज्यों को
इसका बराबर वितरण करे और इनकी कीमतों को नियंत्रण में रखे. पर्याप्त खाद्य संग्रहण
होने की स्थिति में बाहर से आयात करने की जरूरत फिलहाल नहीं है. इस स्थिति में भारत
को जी-20 के उस बाध्यकारी निर्देश को भी दरकिनार करना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि
समूह के सदस्य देश अपने यहां सरप्लस (अतिरिक्त) अनाज होने पर उसे जरूरत पड़ने पर
किसी अन्य सदस्य देश को निर्यात करेंगे.
यद्यपि जी-20 का मकसद अनाज की कमी होने पर वैश्विक स्तर पर कीमतों में अधिकाधिक
इजाफे की आशंका को कम करना है. लेकिन भारत इतनी ज्यादा आबादी को देखते हुए पर्याप्त
खाद्य संग्रहण और अपनी खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए ऎसे कायदे वहन
नहीं कर सकता. मेरा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाध्यताओं से पहले घरेलू नीतियों और
जरूरतों पर गौर किया जाना जरूरी होता है.
06.07.2012, 11.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित