क्यों सुलगी बोड़ोलैंड की आग
मुद्दा
क्यों सुलगी बोड़ोलैंड की आग
रविशंकर रवि
बोड़ोलैंड और लोअर असम में हुई हिंसा के पीड़ितों की हालत को जानने के लिए शनिवार को
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कोकराझाड़ आना और लोगों से मिलना इस मायने में
महत्वपूर्ण है कि इससे बेघर हो चुके और राहत शिविरों में रहने की मजबूरी भोग रहे
लोगों का आत्मविश्वास बढ़ेगा. वैसे तमाम लोगों का भय बहुत हद तक दूर हो सकेगा, जो
हिंसा थम जाने के बावजूद अनहोनी की आशंका से घर जाने का साहस नहीं कर पा रहे हैं.
इससे यह भी संदेश जाएगा कि असम की घटनाओं के प्रति केंद्र किस हद तक संवेदनशील है.
प्रधानमंत्री के आश्वासन और निर्देश के बाद हिंसा प्रभावितों में उम्मीद की किरन
जगी है और यह लगने लगा है कि उनके पुनर्वास की प्रक्रिया तेज होगी. प्रधानमंत्री ने
हिंसा से प्रभावित हुए लोगों की राहत और पुनर्वास के लिए तत्काल एक सौ करोड़ उपलब्ध
कराने की घोषणा की है. उन्होंने हिंसा प्रभावित क्षेत्र की विकास योजनाओं के लिए भी
एक सौ करोड़ रूपए और इंदिरा आवास योजना के तहत एक सौ रूपए उपलब्ध कराने की घोषणा की
है. यह अच्छी बात है कि इन पैसों से जिनका सब कुछ तबाह हो गया है, उन्हें नए सिरे
से जिंदगी आरंभ करने में मदद मिलेगी.
इसमें दो राय नहीं है कि फिलहाल कानून-व्यवस्था को सामान्य बनाना पहली प्राथमिकता
होनी चाहिए और इसके लिए पर्याप्त सुरक्षाबलों की मौजूदगी जरूरी है. लेकिन हालात
सामान्य होने तक राहत शिविरों में मौजूद लोगों को कम से कम खाने-पीने की असुविधा न
हो, इसका ख्याल रखना जरूरी है.
इस बात की लगातार शिकायतें आ रही हैं कि राहत शिविरों में खाने-पीने की चीजों का
अभाव है. असम गण परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष अतुल बोरा ने हिंसा ग्रस्त क्षेत्रों
का दौरा करने के बाद बताया कि राहत शिविरों में जरूरी सुविधाओं का घोर अभाव है.
पहले से डरे-सहमे लोगों को भरपेट भोजन उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है. वे
चाहते हैं कि सुरक्षाबलों की मौजूदगी में लोगों को वापस भेजने का माहौल बनाया जाए.
उन्होंने मांग की है कि एक सप्ताह के अंदर लोगों को वापस घर भेजा जाना चाहिए, ताकि
वे लोग नए सिरे से अपनी जिंदगी आरंभ कर सकें.
लेकिन इस तरह की हिंसा और उसके बाद राहत का यह मरहम असम के लोगों के लिये नया नहीं
है. लेकिन संकट यही है कि हर बार इस तरह की हिंसा को सतही तौर पर विश्लेषित कर के
उसके सतही समाधान की कोशिश की जाती है और जब तक उस समाधान की दिशा में कोई कदम आगे
बढ़ता है, एक और हिंसक घटना सामने आ जाती है.
यह बात बहुत साफ तौर पर समझने वाली है कि बोड़ोलैंड में जो कुछ हुआ या हो रहा है, वह
सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है. समस्या की वजह कुछ और कहीं और है.
अतुल बोरा मानते हैं कि हाल ही में जिस तरह की हिंसक घटनाएं हुई हैं, ऐसी घटनाए हर
चार-पांच वर्षों में घट रही हैं. उनका मानना है कि हिंसा की स्थिति किसी खास मकसद
के लिए बनाई जाती है. मुख्यमंत्री तरुण गोगोई भी मानते हैं कि यह न तो सांप्रदायिक
हिंसा है और न ही गुटीय. इसके पीछे तीसरी शक्ति है, जो लोगों को उकसाती है. गोगोई
का मानना है कि इसके पीछे सोची-समझी साजिश है और वे सभी को बेनकाब करेंगे.
इसी तरह का आरोप भाजपा की तरफ से भी आ रहा है. हालांकि भाजपा इसके पीछे बांग्लादेशी
नागरिकों का हाथ बता रही है. जबकि मुख्यमंत्री गोगोई और केंद्र सरकार ने हिंसा में
किसी बांग्लादेशी का हाथ होने से इनकार किया है. लेकिन यह दिख रहा है कि कुछ
कट्टरपंथी ताकतें अल्पसंख्यकों को उकसा रही है और हिंसा करवाने में मदद कर रही है.
जबकि पूर्व बोड़ो उग्रवादी भी अल्पसंख्यकों पर हमला करते रहे हैं. उनका मानना है कि
उनके इलाके में लगातार संदिग्ध नागरिकों का प्रवेश हो रहा है.
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विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या बोड़ो समुदाय की पहचान से भी जुड़ा हुआ है.
बोड़ो समुदाय के लोगों को पहले से बसे अल्पसंख्यकों के रहने में कोई परेशानी नहीं
है. परेशानी हो रही है हजारों की संख्या में आ रहे बांग्लादेशी मूल के लोगों बसने
से. कहा जा रहा है कि उनलोगों की मदद कई कट्टरवादी ताकतें कर रही हैं. इस हिंसा में
दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ है. इसलिए यह कहना भी गलत होगा कि सिर्फ
अल्पसंख्यकों पर हमला हो रहा है. अल्पसंख्यक भी जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. इसलिए
कारण के मूल में जाना और बाहरी लोगों द्वारा अवैध ढंग से भूमि पर कब्जा करना बंद
करना होगा.
प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि हालात सामान्य होने के बाद दोषियों की पहचान होगी और
सजा दिलाई जाएगी. यहीं पर राजनीति आड़े आ जाती है. जब कार्रवाई की बात आती है तो
राजनीतिक दबाव सामने आ जाते हैं. चार साल पहले इसी तरह की हिंसा उदालगुड़ी में हुई
थी. उस समय भी दोनों समुदायों के कुछ लोगों पर उकसाने के आरोप लगे थे. उस हिंसा के
दौरान उदालगुड़ी और दरंग में पाकिस्तानी झंडे फहराए गए थे. पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे लगाए गए थे.
इस तरह की घटनाएं तो चिंताजनक है ही, उससे भी अधिक चिंता राज्य सरकार की उदासीन
प्रतिक्रिया है. इसका यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि राज्य के अल्पसंख्यक
पाकिस्तान समर्थक हो गए हैं, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि उनके बीच जेहादी और
राष्ट्र विरोधी ताकतों ने अपनी पैठ जमा ली है और उन्हीं के बहकावे में आकर कुछ
लोगों ने हिंसा के दौरान पाकिस्तान के झंडे फहाराए और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे
लगाए.
इसके पहले भी नगांव जिले के सामागुड़ी में इस तरह की घटना होने की खबर थी, लेकिन तब
प्रमाण नहीं थे. इस बार ऐसा नहीं है. कई ग्रामीणों ने अपनी आंखों से यह नजारा देखा
ही है, मीडिया के पास भी उनकी तस्वीरें उपलब्ध है. एक स्थानीय निजी चैनल ने उसके
फुटेज का भी प्रसारण किया. इतना ही नहीं, पाकिस्तानी मीडिया में भी इसकी चर्चा गर्व
के साथ की गई है. इन घटनाओं से राज्य के लोगों की चिंता जायज थी. अब तक तो सिर्फ
कहा जा रहा था कि राज्य में जेहादी संगठनों का नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है. खुद
मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने पुलिस के एक समारोह में जेहादियों से नापाक मंसूबों का
उल्लेख करते हुए खुफिया विभाग को नजर रखने का निर्देश दिया था. बावजूद इसके
पाकिस्तान झंडे के सवाल पर मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और राज्य सरकार की प्रतिक्रिया
चौंकाने वाली थी. इस मामले की गंभीरता से जांच कराने और वैसे लोगों की पहचान के लिए
निर्देश देने की बजाय मुख्यमंत्री यह कह रहे थे कि वे ईद के झंडे थे. जबकि उन
तस्वीरों को देखकर कोई भी कह सकता है कि वे पाकिस्तानी झंड़े थे.
असल में मुख्यमंत्री यह स्थापित करना चाहते हैं कि बोड़ो उग्रवादियों की हिंसक
कार्रवाइयों की वजह से दंगा भड़का है. जबकि पुलिस की रिपोर्ट बताती है कि हिंसा के
पहले शिकार बोड़ो थे. उसके बाद जेहादी तत्वों ने की सक्रियता बढ़ गई. वे तो चाहते हैं
कि असम में सांप्रदायिक तनाव हो और फिर अल्पसंख्यकों की मदद के नाम पर उनका विश्वास
जीता जाए और उनके माध्यम से अपने नापाक मंसूबे को अंजाम दिया जाए. मुख्यमंत्री
संभवत: मुस्लिम मतदाताओं के नाराज हो जाने की भय से झंडे वाली बात को नजरअंदाज कर
रहे हैं.
सरकार की उदासीन प्रतिक्रिया की वजह से असम के भूमिपुत्रों को यह अहसास होने लगा कि
राज्य सरकार चुनावी लाभ के लिए राष्ट्रविरोधी ताकतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने
से परहेज कर रही है. उन्हें यह भी लगने लगा है कि जेहादी ताकतों का हमला बढ़ेगा तथा
राज्य सरकार उनकी मदद करेगी. उन्हें यह भी आभास हो रहा है कि भूमिपुत्र होने के
बावजूद भी अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की वजह से ही सुरक्षा के लिए राहत शिविरों में
रहने को मजबूर होना पड़ रहा है. इसकी बहुआयामी प्रतिक्रिया हो सकती है. लेकिन उसके
बाद कुछ नहीं हुआ. कोकराझाड़ में भी वही होगा. सवाल यह है कि आग को राख से ढंक देने
से आग समाप्त नहीं हो जाती. जब भी उसे हवा मिलती है, वह धधक उठती है.
31.07.2012, 00.38
(GMT+05:30) पर प्रकाशित