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अन्ना के आंदोलन की हिंसा

विचार

 

अन्ना के आंदोलन की हिंसा

मनीष शांडिल्य

अन्ना हजारे


थोड़े-थोड़े महीनों के ब्रेक पर जनलोकपाल के लिए चलाये जाने वाले ‘जनआंदोलन’ पर हमेशा के लिए ब्रेक लग गया है. अब जनलोकपाल की मांग करने वाले अगुआ खुद संसद पहुंचकर कानून बनाने लायक बनने की कोशिश करेंगे. टीम अन्ना भंग भी कर दी गई है. ‘दुश्मन’ को निपटाने से पहले ‘हथियार’ से ही निपट लिया है अन्ना ने. लेकिन आज राजनीतिक दल बनाने के फैसले के बाद और इसके पहले भी टीम अन्ना के पहल का समर्थन, आलोचना और विरोध करने वाले सभी तरह के विचार के लोग थे. लेकिन सब अमूमन यह मानते थे कि यह मुहिम अहिंसक है. लेकिन आज समय के इस मोड़ पर यह मूल्यांकन करने की जरूरत है कि क्या सही मायनों में यह मुहिम अहिंसक था. ऐसा किया जाना इस कारण जरूरी है जिससे कि आम जनता भविष्य में सही-गलत का चुनाव करने में ज्यादा सजग हो सके. वह फिर किसी से छली नहीं जाए.

गौरतलब है कि टीम अन्ना के आखिरी प्रयास में ज्यादा भीड़ नहीं जुटा पा रही थी. पिछले बरस अगस्त में जब यह मुहिम परवान चढ़ी थी तो इसमें मीडिया, खासकर खबरिया चैनलों की बड़ी भूमिका थी. लेकिन मुहिम के अंतिम संस्करण में अलग-अलग वजहों से जुट रही कम भीड़ के कारण यह अबकी ‘लाइव शो’ नहीं था. ऐसे में टीम अन्ना अपने भीतर झांक कर देखने के बजाय मीडिया पर बिक जाने, दवाब में आ जाने का आरोप लगाने लगी.

इस बीच एक रोज अन्ना सर्मथकों ने मीडियाकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार तक कर डाला. हालांकि इसके लिए खुद अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने मंच से माफी मांगी थी. अन्ना ने साफ किया था कि अगर दोबारा ऐसी घटना हुई, तो वे यह ‘अहिंसात्मक आंदोलन‘ रोक देंगे. दूसरी ओर मीडियाकर्मियों से माफी मांगते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि चैनल मालिकों को तय करना होगा कि वे देश के साथ हैं या भ्रष्टाचारियों के.

केजरीवाल के बयान पर गौर करने, इसे ‘बिटवीन द लाइंस’ पढ़ने की जरुरत है. बयान को परत-दर-परत उधेड़ा जाए तो उनका यह बयान वैचारिक हिंसा करता नजर आता है. वे प्रकारांतर से कह रहे थे कि अगर आप उनके विचारों, तौर-तरीकों से सहमत नहीं है तो आप गलत हैं, भ्रष्ट हैं.

पहले से ही वैचारिक असहिष्णुता दिखाने के साथ-साथ केजरीवाल और उनकी टीम भ्रष्टाचार पर मीडिया सहित सबको करेक्टर सर्टिफिकेट यानी कि चरित्र प्रमाण पत्र भी बांटने लगी थी. कानून बनाने की मांग करने के साथ-साथ खुद ही न्यायाधीश की कुर्सी पर भी बैठ जाती थी. खुद को दाग-धब्बों से परे मानते हुए. अरविंद केजरीवाल जैसों ने यह भाषा संभवतः पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश से सीखी है. बुश ने भी वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर पर हुए हमले के बाद कहा था कि अगर आप अमरीकी सरकार के साथ नहीं हैं तो फिर आतंकवादी हैं. यह बताने की जरुरत नहीं है कि बुश अहिंसा के कितने बड़े पुजारी थे.

मुहिम के अंतिम संस्करण के दौरान एक दूसरी घटना भी गौर करने वाली है. तब अन्ना समर्थकों ने प्रधानमंत्री आवास पर जाकर हल्ला-हंगामा किया था. यह भीड़ प्रधानमंत्री को धमकाने, उन पर दवाब बनाने के लिए ही तो गयी थी. नहीं तो अगर प्रधानमंत्री तक अपनी बात पहुंचाना ही मकसद था तो इसके लिए रामलीला मैदान के मंच से लेकर वार्ता के मेज तक, टीम अन्ना के पास कई कारगर विकल्प मौजूद थे. (अब तो वे शायद अगली लोकसभा में अपने साथी सांसद यानी कि प्रधानमंत्री से सीधे बात करेंगे या हो सकता है कि जनता के अपार समर्थन से खुद सरकार ही बना लें). लेकिन टीम अन्ना ने अपने ‘समर्थकों’ की इस कार्रवाई से पल्ला नहीं झाड़ा. यह चुप्पी भी साबित करती है कि टीम अन्ना की मुहिम का वैचारिक आधार हथियारविहीन था, अहिंसक कतई नहीं था.

वह उकसावे की रणनीति पर चल रहे थे. कभी गांधी, कभी भगत सिंह तो कभी शिवाजी के रास्ते पर चलने की बात करते थे. अब गांधी के रास्ते और शिवाजी की रणनीति में मेल कैसा, ये तो टीम अन्ना ही बेहतर बता सकती थी.

दरअसल टीम अन्ना का पूरा वैचारिक आधार ही प्रतिकार, उकसावे पर आधारित था और बहुत चतुराई से उन्होंने बापू के अहिंसा की आड़ ले ली थी. टीम अन्ना की वैचारिक हिंसा को समझने के लिए उनके सबसे प्रमुख हथियार, अनशन को ही लें. कहने को तो उन्होंने बापू की राह चुनी थी. लेकिन हकीकत यह है कि बापू के नाम पर राजनीति करने में टीम अन्ना भी बहुतेरे राजनेताओं से पीछे नहीं रही थे, अब तो उसी जमात में शामिल भी हो गये हैं.

दरअसल टीम अन्ना जिसे गांधीमार्ग बता रही थी, बापू के साहित्य का अध्ययन बताता है कि अनशन या उपवास बापू आत्मशुद्धि के लिए किया करते थे, अपनी बातें जबरन मनवाने के लिए नहीं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि अपनी लाश पर भारत के बंटने की बात कहने वाले बापू ने भारत के बंटवारे को रोकने के लिए अनशन का सहारा नहीं लिया था.

इस तथ्य के आईने में टीम अन्ना के मुहिम को देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि इसने बापू के रास्ते को भी बहुत ही सूक्ष्मता से एक हिंसक मोड़ दे दिया था. इस टीम को तो अनशन की रणनीति को एक जिद की तरह इस्तेमाल करना था और अवधारणा की धरातल पर देखें तो जिद कभी अहिंसक नहीं होती.

वैचारिक हिंसा के कई दूसरे तत्व भी इस मुहिम में शामिल थे. जीवन भर टाडा, पोटा या सशस्त्रबल विशेषाधिकार जैसे कानूनों के खिलाफ लड़ने वाले प्रशांत भूषण और उनकी टीम को ऐसा मजबूत जनलोकपाल क्यों चाहिए था जो हर किसी को जेल भेज सके और जिस पर किसी का अंकुश न चलता हो? न संसद का और न ही सरकार का.

किसी संस्था को संसद और सरकार से भी शक्तिशाली बना देना वर्तमान व्यवस्था में सीधे-सीधे जनता के सर्वोच्च अधिकारों का हनन है, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक भी. जंतर-मंतर की जबरदस्ती से करोड़ों लोगों की चुनी हुई सरकार बदलने में सहायक होना फासीवाद के लिए रास्ता तैयार करने जैसा भी था. साथ ही एक भ्रष्ट व्यवस्था में कड़े कानून कितने खतरनाक साबित होते हैं, इसके कई उदाहरण हैं.

जनलोकपाल, भ्रष्टाचार या काले पैसे को लेकर टीम अन्ना जिस दृष्टिकोण से परिचालित हो रही थी, उसके दवाब में अगर कोई कानून बन भी जाता तो उसका प्रभाव तो आने वाले कुछ सालों में पता चलता. लेकिन अभी तो इतना साफ है कि यह आंदोलन ‘अहिंसक’ तो कहीं से नहीं है. साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि वैचारिक हिंसा प्रत्यक्ष हिंसा से कहीं ज्यादा खतरनाक होती है.

12.08.2012, 15.23 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

अनिल अनलहातु [analhatu@gmail.com] dhanbad - 2012-09-11 16:18:32

 
  क्यों मनीष जी क्या आप भी कॅँग्रेज़ हो गये हैं. माना की अन्ना का आंदोलन गलत एवं हिंसक था, लेकिन आप कहाँ और किनलोगों के साथ खड़े हैं उसे भी तो साफ करें. अन्ना के आंदोलन एवं केजरीवाल को हिंसक ठहराने के लिये आपको या तो कुछ पुरस्कार मिला है या आप कुछ मिलने की प्रत्याशा में हैं.  
   
 

vinod kumar yadav [vinodrajveer6@gmail.com] MIRAZAPUR - 2012-08-30 13:55:47

 
  AAP KYA BATANE CHAHATE HO JANATA KO ANNA ANDOLAN GALAT HAI AOUR AAP KI SARKAR JO KISI BHI KIMAT PAR KISI KO BECHATI YA KHARIDATI HAI AATANK WADI GHATANAO KO CONGRESS PARTI KA AHAM VYAKTI DESH KI CHHATI KO LAHU LUHAN KARANE WALI ATANK WADI GHATANAO KO AK DO HOTI RAHANE KI BAT KARTA HAI WO SAHI HAI
DONG KARKE BHAGWAN KRISHNA KI TARAH GARIB KE GHAR JAKAR NOUTANKI KARATA HAI MASIHA BANANE KA DONG KARATA HAI WO SAHI HAI ABTO TUM AJAD HO GULAMO KI TARAH KYO BICHAR RAKHATE HO APANI DESH KI MAATI KO PAHCHANO ISI DHARATI PAR RAM AOUR KRISHNA DONO NE JANM LIYA HAI AOUR ISI DHARTI PAR SUBHASH AZAD AOUR GANDI GOUTAM BHI JANM LIYE HAI PAR KARY TO SABAKA APANE DESH AOUR SAMAJ KE PRATI APANE KARTVYO KO PURA KARANA THA JISHASE WO MAHAN KE SREDI ME AA GAYE ARE DIVYA CHACHHO KHOLO AOUR DEKHO KYA SAHI HAI AOUR KYA GALAT 65 KO DEHO AOUR PAISE KA MOH TYAG DESH KE LIYE BALIDAN HONE KE BARE ME SOCHO HAME TUMAKO KUCHH BATANE KI AWSYKATA NATI PADEGI NISWARTH BANO SACHACHAI SAMNE AA JAYEGI JAI HIND JAI BHARAT
 
   
 

vedvilas [vedvilas@gmail.com] noida - 2012-08-23 03:17:35

 
  जितना मंथन अन्ना के उपर किया, उसका सौंवा हिस्सा भी इन कांग्रेसियों भाजपाइयों की हरकतों पर किया होता, तो लेख का मतलब होता। बुद्दि वहां दौड़ाके क्या फायदा जहां से कुछ मिलना नहीं। आप लोग यही सोचते रहो। नेता मौज में डूबे रहेंगे। अन्ना पर कुल्हाड़ी चलाओ, खरबों का घोटाला करने वालों का दुलारो। आप लोगों के लेखों और सोच से कितनी सुविधा हो जाती है इन अय्याश नेताओं को। कभी बंद कमरे में बैठकर सोचना इस पर।  
   
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