पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >अन्ना हजारे Print | Share This  

राजा पर दांव

विचार

 

राजा पर दांव

अन्ना हजारे

16 अगस्त 2011 को रामलीला मैदान में जन लोकपाल की मांग को ले कर मेरा अनशन हुआ था. उस वक्त देश की जनता करोडों की तादाद में जन लोकपाल की मांग को ले कर रस्ते पर उतर आई थी. अनशन के 13दिन के दौरान दिल्ली के साथ साथ देश के कई राज्यों में बारह दिन तक यह आन्दोलन चलता रहा. विदेशों में भी जहाँ भारतीय नागरिक हैं ऐसे कई देशों में भी अपने देश और देश की जनता के भलाई के खातिर आन्दोलन चला. लेकिन इस निर्दयी सरकार ने 12दिन तक जनता के उस आन्दोलन के बारे में कुछ भी नहीं सोचा. अंग्रेजों की तानाशाही और आज की सरकार की नीति में क्या फरक है?

अन्ना हजारे

वास्तव में जनता ने हर सांसद को अपने सेवक के नाते संसद में भेजा है. इस लिए भेजा है कि सरकारी तिजोरी का पैसा जनता का पैसा है. आप हमारे सेवक बन कर जाइये और हमारी तिजोरी के पैसों का समाज और देश की उन्नति के लिए सही नियोजन कीजिये ता कि देश के विभिन्न क्षेत्रों का सही विकास हो .

संविधान के मुताबिक यह देश कानून के आधार पर चलने वाल़ा देश है. समाज और देश की उन्नति के लिए अच्छे अच्छे सशक्त कानून बनवाइए. संविधान के मुताबिक कानून बनाना सरकार का कर्त्तव्य है.कानून संसद में ही बनते हैं, इसमें दो राय होने का कारण नहीं है, लेकिन लोकशाही में कानून बनाते समय जनता का सहभाग ले कर उस कानून का मसौदा बना कर वह मसौदा संसद में रखना जरूरी है. जन लोकपाल कानून बनवाने के लिए सरकार अपने इस कर्त्तव्य को भूल गई. कानून का मसौदा सरकारने बनवाया, जन सहभाग नहीं लिया इस कारन सरकारी लोकपाल कमजोर हुआ है.देश की जनता ने आन्दोलन के माध्यम से सरकार को जन लोकपाल कानून बनाने के लिए बार बार याद दिलाने का प्रयास किया लेकिन सत्ता और पैसे की नशा कैसी होती हैं उसका उदाहरण इस सरकार ने न सिर्फ देश के सामने बल्कि दुनिया के सामने रखा है. दुनिया के कई लोगों ने इस आन्दोलन को देखा है. देश की जनता रस्ते पर उतर कर बार बार जन लोकपाल की मांग कर रही थी लेकिन सरकार ने जनता की मांग को ठुकरा दिया. लोकशाही वादी देश के लिए यह दुर्भाग्य की बात है.

भारत में हुए इस अहिंसावादी आन्दोलन की चर्चा दुनिया के कई देशों में चलती रही, आज भी चल रही है, कि देश के करोड़ों लोग जन लोकपाल की मांग को ले कर रास्ते पर उतर गए और 13 दिन आन्दोलन चलता रहा लेकिन किसी नागरिक ने एक पत्थर तक नहीं उठाया, कई देशों को भारत के इस अहिंसा वादी आन्दोलन का आश्चर्य लगा, हमारे सरकार ने जनता के उस करोडो लोगों ने किये हुए आन्दोलन की कदर नहीं की. इससे स्पष्ट होता है कि सत्ता और पैसे की नशा सरकार चलाने वाले लोगों को कितना बेहोश करती है इसका एक उत्तम उदाहरण इस सरकार ने देश के जनता के प्रति दिखाया गया अनादर, अनास्था के रूप में हमारे देश के और दुनिया के सामने रखा है.

भारत की जनता के संयम की इतिहास में नोंद हो सकती है. आन्दोलन करने वाले लोग दो दिन, चार दिन संयम रख सकते हैं, लेकिन 13 दिन सरकार द्वारा जनता पर अन्याय करने पर भी एक भी नागरिक के दिल में गुस्सा पैदा नहीं हुआ. अगर गुस्सा आया भी होगा लेकिन उन्होंने गुस्से में प्रकट नहीं किया. विशेष तौर पर 20 से 30 साल की उम्र वाले युवकों का खून अन्याय, अत्याचार से गरम हो जाता है. ऐसी स्थिति में आन्दोलन में क्या क्या नहीं होता? हम कई बार कई देशों में मार पीट, राष्ट्रीय और निजी संपत्ति की तोड़फोड़-जलाकर हानि करना आदि उदाहरण टीवी पर देखते हैं. महात्मा गांधीजी को चल बसे 64 साल बीत गए लेकिन अभी उनके अहिंसा वादी विचारों का प्रभाव हमारे देश के जवान कार्यकर्ताओंके जीवन पर बरकरार है. इस कारण अपना गुस्से को पीते हुए किसी ने एक पत्थर तक नहीं उठाया. ना ही कोई तोड़ फोड़ की. हो सकता है, हमारे देश में चली आ रही ऋषि मुनियों की संस्कारात्मक संस्कृति का भी परिणाम हुआ हो.

सरकार जन लोकपाल कानून बनाने के लिए खुद तैयार नहीं है, कारण भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण हो, यह इस सरकार की मंशा नहीं है, इच्छाशक्ति नहीं है, और उनकी नीयत साफ नहीं है. अगर सरकार की नीयत साफ होती तो 44 साल में 8 बार लोकपाल का बिल संसद में आ कर भी 40 साल सत्ता में होते हुए लोकपाल बिल पास नहीं किया, अभी जनता डेढ़ साल से कह रही हैं जन लोकपाल का बिल संसद में लाओ. लेकिन सरकार लोगों की माँग की अनसुनी कर देश को अपने पक्ष और पार्टी की सत्ता मान कर अंग्रेजों की तानाशाही का रवैया अपना रही है. आज राष्ट्र से अधिक महत्व पक्ष को दिया जा रहा है और पक्ष से भी बढ कर पक्ष की व्यक्ति को अधिक महत्व प्राप्त हो गया है यह लोकशाही के लिए बड़ा खतरा बना है, उसमें भी परिवार वाद - घराना शाही का खतरा बहुत बड़ा है. अगर जनता ने घराना शाही को देश में से समाप्त नहीं किया तो फिर से राजा,महाराजाओं जैसी हुकूमत आएगी. वह लोकशाही के लिए ज्यादा खतरनाक होगी. घराना शाही को समाप्त करना मतदाताओं के हाथ में है. मतदाताओं ने अगर तय किया तो मतदाता घराना शाही को रोक सकते हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vinod kumar yadav [vinodrajveer6@gmail.com] MIRAZAPUR - 2012-08-30 13:30:31

 
  काश इस देश का हर इंसान देश के बारे में बापू, अन्ना हज़ारे जी की तरह सोचता तो इस देश की दशा और दिशा दोनों बदल जातीं और नेताजी सुभाषचंद्र बोस, आज़ाद जी जैसे वीर सपूतों की धरती एक बार फिर से अपने बच्चों पर गर्व करती और बापू के सपनों का भारत स्वराज का भारत फिर से खुशहाल हो उठता. गांधीजी के स्वराज का सपरा पूरा वो जाता. इस देशवासियों से अपील करूंगा कि खास तौर पर उनके लिए जो अपनी मातृभूमि से प्रेम करते हैं और उनके लिए भी जो सब कुछ जानते हुए भी चुप बैठे रहते हैं - देखो वीर जवानों अपने खून पे ये इल्जाम न आए माँ न कहे कि मेरे बेटे वक्त पड़ा तो काम ना आए. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in