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अन्ना का आशीर्वाद

मुद्दा

 

अन्ना का आशीर्वाद

योगेंद्र यादव


अन्ना नयी पार्टी के साथ भले न हों, लेकिन पार्टी बनाने वालों के हाथ एक मंत्र दे दिया है. उन्होंने पार्टी बनाने की कोशिश के सामने कुछ सवाल खड़े किये हैं. ये वे सवाल हैं, जिन्हें देश की करोड़ों आम जनता पूछना चाहेगी. इनका जवाब देना शुरू में भले तकलीफदेह हो, लेकिन अंतत: अन्ना के सवाल नयी राजनीति को सही दिशा में ले जायेंगे. यह एक तरह से नयी पार्टी को अन्ना का गुप्त आशीर्वाद है.

अन्ना हजारे

पहला सवाल तो यही है कि राजनीति की जरूरत क्यों? एक लिहाज से जनलोकपाल आंदोलन के अनुभवों ने इस सवाल का खुद ही उत्तर दे दिया है. सत्ताधारियों ने आंदोलन की मांग मान ली, संसद के दोनों सदनों ने एकमत से प्रस्ताव पारित किया, प्रधानमंत्री ने लिखित आश्वासन भी दे दिया, लेकिन हुआ कुछ नहीं. जैसे ही राजनेताओं को लगा कि आंदोलनकारियों की ऊर्जा छीज रही है, वे फिर अपनी पुरानी चाल पर लौट आये. अब बिल का भाग्य इसके तार्किक या नैतिक बल पर निर्भर नहीं करेगा. यह सत्तातंत्र पर पड़ने वाले राजनीतिक दबाव पर निर्भर करेगा.

देश के तमाम जनांदोलनों की यही कहानी है, चाहे नर्मदा बचाओ आंदोलन हो, पोस्को-विरोधी संघर्ष हो, एटमी ऊर्जा-संयंत्र प्रतिरोध हो या फिर मजदूर किसान शक्ति संगठन के आंदोलन. हाशिये की आवाजों को मुखर करना हो तो उसका एकमात्र रास्ता संगठित होकर प्रतिरोध में उतरना और दबाव डालना है. राजनीति इसी को कहते हैं. यदि राजनीति का मतलब समाज के शक्ति-संतुलन में बदलाव करना है, तो राजनीति न करने जैसा कोई विकल्प नहीं है. हम जिस देशकाल में जी रहे हैं, राजनीति उसका युगधर्म है.

अन्ना का दूसरा सवाल है कि राजनीति करनी भी है तो पार्टी क्यों बनाएं? धरना, प्रदर्शन, मांगपत्र और वार्ता का ही रास्ता क्यों न जारी रखें? आखिर सूचना का अधिकार, वनाधिकार और एक हद तक मनरेगा तथा शिक्षा का अधिकार भी हमें इसी रास्ते हासिल हुए. लेकिन, इस तरीके की राजनीति की सफलता उसी सत्तातंत्र की मोहताज है, जो खुद ही समस्या की जड़ में है. इसलिए ऐसी राजनीति कभी-कभार ही सफल हो पाती है. असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को बुनियादी सुरक्षा देने वाला कानून दो दशक से अधर में है.

वैसे भी अगर कोई ऐसा बुनियादी बदलाव करना हो, जिससे शासकवर्ग के हितों को चोट पहुंचे, तो अप्रत्यक्ष राजनीति का तरीका कारगर नहीं रह जाता. सारी पार्टियों को फंड देने वाले कॉरपोरेट घरानों पर अंकुश लगाने वाला कोई विधान बनाना तो दूर, यह संसद तो शिक्षा माफिया पर लगाम कसने वाला विधान बनाने से भी रही. यानी आंदोलनों के सहारे होने वाली राजनीति जरूरी, पर नाकाफी है. अगर सपना बड़ा और इच्छा मौजूदा व्यवस्था के भीतर मूलगामी बदलाव के लिए जोर डालने की है, तो इसके सिवाय कोई चारा नहीं कि आपका अपना राजनीतिक औजार हो.

तीसरा सवाल चुनिंदा हस्तक्षेप की रणनीति के बारे में है. अन्ना ने संकेत दिया है, चंद ईमानदार उम्मीदवारों का वे समर्थन करेंगे, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों. अन्य जनांदोलनों ने चुनिंदा हस्तक्षेप के कुछ और रूपों को अपनाया है. पहले पंचायत चुनाव लड़ना, स्वतंत्र उम्मीदवार खड़े करना, चुनाव के अवसरों का इस्तेमाल जन-सरोकारी मुद्दों पर जन-जागरण करना आदि सब तरीकों के प्रयोग हो चुके हैं.

मुश्किल यह है कि ये प्रयोग बहुत सफल सिद्ध नहीं हुए. हमारी चुनाव-प्रणाली निर्दलीय उम्मीदवार को निष्प्रभावी बना देती है. किसी पार्टी के अच्छे उम्मीदवार को समर्थन देने का मतलब नहीं है, क्योंकि पार्टी-ह्वीप निर्वाचित प्रतिनिधि को हाइकमान का गुलाम बना कर रखता है. जनांदोलनों का अनुभव बताता है कि चुनाव के समय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना भी कोई विकल्प नहीं है. सयाने राजनेता बेहतरीन जनांदोलनों का दोहन करना जानते हैं. ऐसे में, जाहिर है सबसे अच्छा रास्ता है राजनीतिक विकल्प गढ़ कर सीधा और खुला हस्तक्षेप करने का.

अन्ना का चौथा सवाल उम्मीदवार के चयन के बारे में है. क्या टिकट वितरण के हाइकमान शैली वाले उस तरीके से हमारा छुटकारा संभव है, जो नेताओं को अपने ही कार्यकर्ताओं और समर्थकों से काट देता है? प्रस्तावित पार्टी के दृष्टिपत्र में मौजूदा चाल-व्यवहार से हट कर एक प्रस्ताव रखा गया है. उम्मीदवारों का चयन पार्टी के इलाकाई कार्यकर्ता करेंगे, न कि केंद्रीय या राज्यस्तरीय नेता. पार्टी सिर्फ उन्हीं लोगों का नामांकन खारिज करेगी, जिन्होंने अपने बारे में झूठी जानकारी दी होगी या जिनका रिकार्ड सांप्रदायिकता, अपराध, भ्रष्टाचार या चरित्र के लिहाज से संदेहास्पद पाया जायेगा. अगर किसी नाम पर सहमति नहीं हो पाती है, तो उस क्षेत्र के पार्टी कार्यकर्ता मतदान के द्वारा उम्मीदवार चुनेंगे. यह व्यवस्था सही साबित हो न हो, कम से कम गौरतलब जरूर है.

पांचवां सवाल है कि चुनाव के लिए संसाधन कहां से आयेंगे? जाहिर है पार्टी के पास कभी भी इतने संसाधन नहीं होंगे कि वह चालू रेट के हिसाब से वोट ‘खरीद’ सके. और न ही उसे ऐसा करने की जरूरत है. असली सवाल है कि क्या नयी पार्टी इतना संसाधन जुटा सकती है कि चुनाव गंभीरता से लड़ सके और आम मतदाता को पार्टी के उम्मीदवार दौड़ से बाहर न जान पड़ें. चुनाव-प्रचार अभियान पर होने वाले इस न्यूनतम खर्चे के बराबर धन जुटा पाना भी आसान नहीं होगा, लेकिन लोगों की सहानुभूति हो तो यह असंभव भी नहीं. अगर चुनाव लकीर से हट कर हों, जैसा कि 1977 में हुआ था, तो साधन विहीनता एक पूंजी बन सकती है.

छठा सवाल, क्या गारंटी है कि नयी पार्टी के नेता-उम्मीदवार भ्रष्ट नहीं होंगे? शुरू में नयी पार्टी का प्रस्ताव अपने उम्मीदवारों और पदाधिकारियों के लिए आचार-संहिता लागू करने का है- इन लोगों को अपनी धन-संपदा की घोषणा करनी होगी, आपराधिक कृत्यों और जातिगत या संप्रदायगत घृणा फैलाने से, महिला उत्पीड़न या नशेड़ीपन से दूर रहना होगा.

चुने हुए प्रतिनिधियों को लालबत्ती लगाने की मनाही होगी, लाव-लश्कर नहीं, बड़ा बंगला नहीं, एमपीलैड जैसी योजनाओं के लिए विवेकाधीन कोटे के इस्तेमाल की भी मनाही होगी. आचार संहिता नयी बात नहीं है, लेकिन पार्टी ने आचार-संहिता के उल्लंघन में अपने पदाधिकारियों व निर्वाचित प्रतिनिधियों की जांच और उन पर कार्रवाई के लिए एक स्वतंत्र व ताकतवर मशीनरी का प्रस्ताव रखा है. प्रस्ताव है कि पार्टी के भीतर भी एक लोकपाल बने, जो पार्टी नेतृत्व से स्वतंत्र हो. पार्टी उसकी संस्तुतियां मानने को बाध्य होगी.

लेकिन जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोगों की चौकीदारी न हो, तब तक ऐसी कोई मशीनरी नहीं जो साफ-सुथरी राजनीति सुनिश्चित कर सके. लोकतंत्र गारंटी नहीं दे सकता. लोकतंत्र इसी आसरे जीता है कि आम जनता ने अपनी आत्मा को बंधक नहीं बनाया है. लोकतंत्र के हामियों को जनता के विवेक पर भरोसा करना होगा. अन्ना के मंत्र को आशीर्वाद में बदलने का यही तरीका है.

10.10.2012, 00.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Aarti Singh [aartiakb@gmail.com] Delhi - 2012-10-15 12:16:00

 
  फासीवादियों के हाथ आया भोथरा औजार है अन्ना !
मीडिया के हाथ लगा मस्त बाज़ार है अन्ना !
 
   
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