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खाने की यह बर्बादी

विचार

 

खाने की यह बर्बादी

देविंदर शर्मा

अन्न की बर्बादी


कभी-कभी जब मैं किसी विवाह समारोह में भोजन खत्म करके कचरा फेंकने वाले डब्बे में पत्तल फेंकने जाता हूं तो मैं बहुत पछतावे और चिंता के साथ देखता हूं कि छोटे-छोटे बच्चों का झुंड बचे हुए खाने पर टूट पड़ने के लिए तैयार दिखता है. इन बच्चों के बाद वहां कुत्ते आने लगते हैं. साथ ही साथ कौवे भी अपनी बारी के लिए उस जगह पर मंडराने लगते हैं.

जिस भोजन को हम व्यर्थ समझते हैं, वह न जाने कितने ही भूखे पेट और पशु-पक्षियों की खाद्य जरूरत को पूरा करने के काम आता है. इसलिए मुझे कई बार आश्चर्य होता है कि भारत जैसे देश में क्या वाकई भोजन बर्बाद होता है? मैं आज भी देखता हूं कि मेरी मां सुबह गायों को अनाज देती हैं और शाम के भोजन के बाद कुत्तों के लिए कुछ रोटियां अलग से रखती हैं.

दरअसल, उनके इस काम के पीछे धर्म के साथ-साथ पशुओं के लिए खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य भी होता है. हम अक्सर अपने आस-पास ऎसा करते हुए कई लोगों को देख सकते हैं. भारतीय धर्म शास्त्र हमें करूणा रखने की सीख देते हैं और मिल-बांटकर खाने एवं देखभाल करने में विश्वास जगाता है.

कुछ देशों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अमरीका और कनाडा में 40 प्रतिशत भोजन बर्बाद होता है, इसमें से अधिकांश घरेलू स्तर पर होता है. अध्ययन बताते हैं कि अमरीका में हर दिन इतना भोजन बर्बाद होता है, जिससे एक फुटबाल का मैदान भरा जा सकता है. अमरीकी हर साल 165 अरब डॉलर का खाना बर्बाद करते हैं. बर्बाद होने वाले भोजन में से अगर 15 प्रतिशत को बचा लिया जाए, तो इससे 250 लाख भूखे अमरीकियों का पेट भर सकता है. अमरीका में 420 लाख लोग ऐसे हैं, जो "सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन प्रोग्राम" पर निर्भर हैं. यूरोप में भी स्थिति बेहतर नहीं कही जा सकती. एक अनुमान के मुताबिक हर साल यूरोप में 900 लाख टन खाना बर्बाद होता है.

एक ऐसा क्षेत्र, जहां 790 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं और 160 लाख लोग भोजन सहायता के लिए दानदाता संस्थाओं पर निर्भर रहते हैं. अगर यह बर्बाद जाने वाला भोजन बचा लिया जाये, तो न केवल भूखी जनता का पेट भरने के लिए पर्याप्त होगा, बल्कि गरीब देशों को निर्यात भी किया जा सकेगा. उदाहरण के लिये अगर अकेले इटली में बर्बाद होने वाला भोजन बचा लिया जाए, तो इथोपिया की पूरी भूखी आबादी का पेट भरा जा सकता है.

यहां प्रसंगवश एक और मुद्दे पर बात किया जाना ज़रुरी है. हाल ही में जब रिटेल में एफडीआई को लेकर बहस जोरों पर थी, तो एक टीवी शो पर एंकर ने मुझसे सवाल किया कि एफडीआई के आने से क्या 40 प्रतिशत फल-सब्जियों की बर्बादी को रोका नहीं जा सकेगा? मैंने जवाब दिया कि पहले तो मैं इन आंकड़ों को ही नहीं मानता. दूसरा, जब वॉलमार्ट अमरीका में ही 40 प्रतिशत भोजन की बर्बादी को नहीं रोक पाया, तो हमारे भोजन को व्यर्थ जाने से कैसे रोक देगा?

वॉलमार्ट की भूमिका को एनआरडीसी यानी नेचुरल रिर्सोसेज डिफेंस काउंसिल के अध्ययन से भी समझा जा सकता है. यह अध्ययन बताता है कि सुपरमार्केट में बेचे जाने वाले आधे फल-सब्जियां तो व्यर्थ ही जाते हैं. समझने वाली बात है कि जब अमरीका के सुपर स्टॉर ही फल-सब्जियों की बर्बादी को नहीं रोक पा रहे हैं, तो हम कैसे यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि ये अमरीकी कम्पनियां भारत में भोजन बर्बादी को रोक लेंगी? वैसे गौर करने लायक बात यह है कि भारत में ये 40 प्रतिशत अन्न बर्बादी का आंकड़ा कहां से आया?

एक एग्रीकल्चर छात्र होने के नाते 30 साल पहले जो आंकड़ा मुझे मेरे अध्यापक बताया करते थे, वही आंकड़ा आज तक कायम है? रिटेल में एफडीआई की दरकार को सही साबित करने के लिए अलग-अलग मंच से बार-बार 40 प्रतिशत अन्न बर्बादी की दलील दी जाती रही है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस आंकड़े का इस्तेमाल करते हैं, खाद्य मंत्री के. वी. थॉमस इस आंकड़े को पेश करते हैं, आनंद शर्मा इस आंकड़े की दलील देते रहे हैं. उद्योग जगत में फिक्की और सीआईआई यह आंकड़ा बताती रही हैं. राहुल गांधी ने तो एक कदम आगे जाकर नया आंकड़ा पेश किया कि 60-70 प्रतिशत अनाज बर्बाद होता है.

यह तो भला हो लुधियाना स्थित "पोस्ट-हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट" का, जिसने आखिरकार इस आंकड़े से धुंधलका हटाया है. इस संस्था के एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन के मुताबिक पैदावार होने के बाद तक फलों में 5.8 प्रतिशत (चीकू) से लेकर अधिकतम 18 प्रतिशत (अमरूद) तक बर्बादी होती है. सब्जियों में फूलगोभी में अधितकम 6.8 प्रतिशत, टमाटर में 12.4 प्रतिशत का नुकसान होता है. दूसरे सामानों में नुकसान बहुत कम देखने को मिला. फसलों में 3.9 से 6 प्रतिशत नुकसान सामने आया. अनाज में 4.3 प्रतिशत से 6.1 प्रतिशत, दालों में 4.3 से 6.1 प्रतिशत, तिलहनों में 6 प्रतिशत, मांस में 2.3 प्रतिशत, मछली में 2.9 प्रतिशत और कुक्कट में 3.7 प्रतिशत नुकसान देखने को मिला.

ये सब आंकड़े कल्पित 40 प्रतिशत बर्बादी से कहीं कम हैं. वास्तव में अगर भारत की इस मामले में अमरीका से तुलना करें, तो हमारी स्थिति कहीं बेहतर है. जहां अमरीका में अकेले फल-सब्जियों में 50 प्रतिशत की बर्बादी हो रही है, वहीं भारत में यह नुकसान 5.8 प्रतिशत से अधिकतम 18 प्रतिशत तक ही है. चावल और गेहूं में नुकसान का स्तर तो बहुत ही कम है. गेहूं-चावल में 4.3 प्रतिशत से 6.1 प्रतिशत तक ही नुकसान होता है.

जिसे हम बर्बादी कहते हैं, मेरे ख्याल में वह पशुओं और पक्षियों की खाद्य सुरक्षा है. उन्हें भी तो भोजन चाहिए. कई मर्तबा गलती से जो भोजन बर्बाद होता है, वह भी उनकी खाद्य जरूरत को पूरा करता है. अमरीका और यूरोप को तो इस लिहाज से भारत से सबक लेने की जरूरत है.

02.11.2012, 08.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

पद्मनाभ गौतम [pmishra_geo@yahoo.co.in] अलोंग, अरुणाचल प्रदेश - 2012-11-07 08:45:01

 
  बात समझ में तो आती है पर कोई भी बर्बादी बर्बादी है। पशुओं का भोजन चारा है। गनीमत है लेखक ने इसे गरीब बच्चों के भोजन का भी माध्यम नहीं बना दिया। बहरहाल, यदि हम भोजन की बर्बादी में दूसरों से बेहतर हैं तो इसका कारण कमी होने की वजह से सजग रहना है। उदाहरण के लिए सोना बहुत संभाल कर रखा जाता है और लोहा कुछ कम संभाल कर। जो कुछ भी हो भोजन के बर्बाद हो जाने के प्रति हमें और सजग रहना ही पड़ेगा, क्योंकि उन आंकड़ों की तरह ये आंकड़े भी गलत हो सकते हैं ..... 
   
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