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अन्ना ने खिड़की खोली तो

विचार

 

अन्ना ने खिड़की खोली तो

योगेंद्र यादव

अन्ना हजारे


अन्ना हजारे का आंदोलन देश के लिए एक आशा की किरण है. यह आंदोलन देश में व्यापक परिवर्तन ला सकता है कि नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है. लेकिन, इसने जनमानस में एक बदलाव लाया है. जितने लोग सड़क पर उतरे, उससे कहीं अधिक घर में बैठे लोगों के मन में उस आंदोलन के प्रति सकारात्मक सोच उत्पन्न हुआ. यह देश में बदलाव का एक संकेत है. यह बदलाव उस पर निर्भर करता है कि हमारी नयी पीढ़ी की भागीदारी इसमें कैसी रहती है.

देश आज दोराहे पर खड़ा है. लोगों में गुस्सा है. वैसे हिंदुस्तानियों के मिजाज में गुस्सा है. बात-बात पर लोगों में खीझ उत्पन्न होती है. लेकिन, पिछले साल-डेढ़ साल में जो गुस्सा पैदा हुआ है, उससे एक छोटी-सी आशा पैदा हुई है. यह आशा का दीप बुझ जायेगा या दीर्घकालिक परिवर्तन की ओर ले जायेगा, यह तय नहीं है.

सामान्यत: घर, परिवार, बीवी, नेताओं, व्यवस्था, सरकार व शासन-प्रशासन से असंतोष रहता है. लेकिन वर्तमान असंतोष अलग किस्म का है. यह व्यवस्था के खिलाफ असंतोष है. घोटाले पहले भी हुए थे और अब भी हुए. ये यदा-कदा उजागर भी होते रहे हैं. नयी दिल्ली में काम करनेवाले मीडियाकर्मी हों या सत्ता के गलियारे से जुड़े लोग, इनके पास घोटालों की जानकारी भी रहती है. यह दीगर है कि इसे छापने की हिम्मत किसी में नहीं होती. लेकिन, जिस तरीके से कोलगेट घोटाले का मामला उजागर हुआ, उसने राजनीतिक प्रतिष्ठान के खिलाफ ही असंतोष का भाव पैदा किया.

आम तौर पर घोटालों में सत्ता से जुड़े लोग ही होते हैं. कोयला खदान आवंटन घोटाला ऐसा है, जिसमें कांग्रेस के साथ ही भाजपा के लोग भी समान रूप से संलिप्त हैं. जिस नीति के आधार पर कोयला खदान का आवंटन हुआ, उसे भाजपा सरकार ने बनाया था. कांग्रेस ने उस पर अमल शुरू किया, तो मध्यप्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री ने उस नीति को जारी रखने के लिए सिफारिश भरा पत्र लिखा. ओड़ीशा के मुख्यमंत्री के अलावा राजस्थान सहित कई कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी उस नीति का समर्थन किया. हद तो यह कि आमतौर पर ईमानदार समझे जाने वाले वाम दलों की पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भी पत्र लिखा गया.

रॉबर्ट वाड्रा का मामला कुछ भी नया नहीं है. सत्ता में बैठे लोगों के दामादों, रिश्तेदारों का प्रभाव शुरू से ही रहा है. बिहार में तो वर्षो तक प्रभाव था. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में रंजन भट्टाचार्य का प्रभाव किसी मीडियाकर्मी से छिपा नहीं था. लेकिन मीडिया में इस मुद्दे पर चुप्पी थी.

कांग्रेस के शासनकाल में एक साप्ताहिक पत्रिका ने जब रंजन भट्टाचार्य से संबंधित खबर छापनी चाही कि किस कदर वे पीएमओ चलाया करते थे, तो प्रिंटिंग प्रेस से उस मैटर को वापस करना पड़ा. रॉबर्ट वाड्रा के मामले में ऐसा नहीं है. यह बीते एक-डेढ़ साल में हुई घटनाओं का ही असर है कि निजी तौर या ड्राइंग रूम में होनेवाली चर्चाएं आज सार्वजनिक तौर पर हो रही हैं. लेकिन सत्ता व विपक्षी पार्टियों ने एक अलिखित समझौता किया है.

बीते दिन कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने खुलेआम कहा कि हमारे पास रंजन भट्टाचार्य से जुड़ी कई जानकारियां हैं, लेकिन हम गैरकानूनी बात नहीं करते. सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर यह बेशर्मी दिखती है कि एक-दूसरे का बचाव करें, बात न करें, पोल न खोलें. जनता के सामने सच को नहीं रखें. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की कंपनी पर आरोप लगे कि उसने गबन किया है या उसके मालिक खोजे नहीं मिल रहे हैं, तो इसमें एक सच यह भी है कि उनको (अध्यक्ष को) मदद करनेवाली सरकार कांग्रेस व एनसीपी की ही है. इन घटनाओं से यह सीधा मतलब निकलता है कि सत्ता प्रतिष्ठान एक-दूसरे से मिला हुआ है.

बीते 20 वर्षों में देश ने कई रंगों की सरकार देखी है, पर रिलायंस का प्रभाव जस-का-तस है. देश का कोई भी पेट्रोलियम मंत्री ऐसा नहीं रहा, जो रिलायंस के खिलाफ बोल सके. मौजूदा समय में जिसने भी रिलायंस के खिलाफ बोलने की कोशिश की, उसे मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा. यह शर्म का विषय है कि प्रधानमंत्री ईमानदार मंत्री से पेट्रोलियम मंत्रालय चलाना चाहते हैं, पर वे इसमें कामयाब नहीं हो पा रहे हैं. पीएम में ऐसी हिम्मत नहीं है कि वे ऐसा कर सकें.
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