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मोदी का जाति उन्मूलन

बहस

 

मोदी का जाति उन्मूलन

राम पुनियानी

Narendra Modi


जाति प्रथा की जड़ें भारतीय समाज में गहरे तक फैली हुई हैं. जातिप्रथा उन्मूलन का संघर्ष उन्नीसवीं सदी से जारी है. फुले, अम्बेडकर व पेरीयार जैसे व्यक्तित्वों के विचारों से प्रेरित अनेक सामाजिक आंदोलन भी जातिप्रथा का अंत करने में सफल नहीं हुए और कैंसर की तरह इस कुप्रथा ने हमारे समाज के हर तबके को जकड़ रखा है. जातिप्रथा के बाबत भारतीय समाज में दो अलग-अलग धाराएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं.

पहली है वे सामाजिक आंदोलन और संघर्ष, जो सामाजिक न्याय की भावना से प्रेरित हैं. सामाजिक न्याय की अवधारणा हमारे राष्ट्रीय स्वंतत्रता आंदोलन का अभिन्न हिस्सा थी और हमारे संविधान में भी इसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है. एक दूसरी धारा वह है जो इस प्रथा को एक नए कलेवर में नवजीवन देना चाहती है. यह धारा तेजी से बदलते हुए समय के अनुरूप अपनी भाषा बदल रही है, और ‘सामाजिक समरसता’ के नाम पर हिन्दू समाज में व्याप्त जातिगत ऊँचनीच को एक नये, आकर्षक लेबल के तहत जिंदा रखना चाहती है.

इस धारा के प्रणेता वे वर्ग हैं, जो भारतीय राष्ट्रवाद के विरोधी थे और हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकार. हिन्दू राष्ट्रवाद की इसी धारा से सन् 1915 में हिन्दू महासभा का जन्म हुआ और 1925 में आरएसएस का. इन धाराओं का एकमात्र लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र की स्थापना. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने हाल में सामाजिक समरसता मंच नामक एक नये संगठन की स्थापना की है. नरेन्द्र मोदी, जो कि इन दिनों विकास पुरूष का तमगा हासिल करने के लिए बेताब हैं, ने सामाजिक समरसता पर एक पुस्तक लिखी है.

इस पुस्तक में मोदी ने यह दावा किया है कि वे दलितों की भलाई के लिए काम करते रहे हैं. वे लिखते हैं, ‘‘8 नवम्बर, 1989 को भव्य राममंदिर का शिलान्यास किसी महंत या पुजारी ने नहीं किया था. यह काम बिहार के एक दलित ने किया था. उस समय केवल मंदिर की नींव ही नहीं रखी गई थी वरन् सामाजिक समरसता की नींव भी रखी गयी थी. वह एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरूआत थी.’’

कई दलित विद्वान कहते हैं कि बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए 6 दिसम्बर का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि उस दिन डॉक्टर अम्बेडकर की पुण्यतिथि है. इन विद्वानों का मानना है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाली ताकतें, दलितों को अपने अधीन रखते हुए भी अपने साथ रखना चाहती हैं.

सामाजिक समरसता की अवधारणा में शामिल है विभिन्न जातियों के सदस्यों के बीच सद्भाव. परन्तु जातिप्रथा का अंत, सामाजिक समरसता आंदोलन का लक्ष्य नहीं है. जहां अम्बेडकर जातिप्रथा के सम्पूर्ण उन्मूलन के पैराकार थे वहीं सामाजिक समरसता के झंडाबरदार, हिन्दू समाज को एक रखना चाहते हैं परन्तु उसके जातिगत व वर्ण-आधारित भेदभाव के साथ. इस प्रकार एक सूत्र में बांधे गए हिन्दू समाज का इस्तेमाल मुसलमानों, ईसाइयों व अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जाएगा.

अम्बेडकर ने जातिप्रथा का अंत करने के अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही चावदार तालाब आंदोलन शुरू किया था, जिसका लक्ष्य था दलितों को पानी के सार्वजनिक स्त्रोतों पर अधिकार दिलाना. इसी तरह, उन्होंने कालाराम मंदिर आंदोलन के जरिये दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलवाने के लिए भी आंदोलन शुरू किया था. परन्तु जल्दी ही उन्हें यह समझ में आ गया कि उनकी राह में असली रोड़ा क्या है. उन्होंने ‘मनुस्मृति‘ को जलाने का क्रम शुरू किया. उन्होंने कहा कि मनुस्मृति ही महिलाओं और दलितों को गुलाम बनाए रखने की वकालत करती है और वे इस अवधारणा के विरोधी हैं.

भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता के रूप में अंबेडकर ने संविधान में जातिप्रथा के उन्मूलन और दलितों और आदिवासियों के हितों के लिए विशेष प्रावधान किये. उन्होंने सामाजिक स्तर पर दलितों को बराबरी के हक दिलाने के लिए संघर्ष तो किया ही, उनके आर्थिक सशक्तिकरण के लिए भी काम किया. भू-अधिकारों और आर्थिक न्याय के लिए अंबेडकर ने आंदोलन चलाये और एक स्वतंत्र लेबर पार्टी का गठन भी किया. इस पार्टी का उद्देश्य दलितों को उनके आर्थिक हक दिलाना था. अंबेडकर का स्पष्ट मत था कि जातिप्रथा, श्रमविभाजन नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है.

दूसरी ओर, आरएसएस, दलितों और श्रमिक वर्ग के अपने अधिकारों के संघर्ष का घोर विरोधी है और इसलिए वह पहचान-आधारित मुद्दों को उठाता रहा है. गौरक्षा, राममंदिर, रामसेतु सहित संघ व मोदी के एजेण्डे में कई पहचान-आधारित मुद्दे हैं, जिनके जरिये वे दलितों को हिन्दू धर्म का हिस्सा बनाये रखना चाहते हैं परन्तु निचले दर्जे के साथ. जहाँ अंबेडकर और फुले का संघर्ष दलितों की भौतिक और सामाजिक आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ था वहीं संघ केवल पहचान-आधारित मुद्दों को उठाकर दलितों को भुलावे में रखना चाहता है.

जहाँ अंबेडकर और फुले का एजेण्डा दलितों को उनके अधिकार और गरिमा दिलाना था वहीं संघ का एजेण्डा केवल यह सुनिश्चित करना है कि दलितों का कहीं हिन्दू धर्म से मोहभंग न हो जाये. सामाजिक समरसता कार्यक्रम के अतिरिक्त, आरएसएस ने वनवासी कल्याण आश्रम भी स्थापित किये हैं जिनका लक्ष्य आदिवासियों को हिन्दू धर्म से जोड़ना है. पहचान की राजनीति के उदय से जातिगत व लैंगिक भेदभाव के विरूद्ध चल रहे आंदोलन कमजोर हुये हैं.

इस राजनीति की शुरूआत सन् 1980 के दशक से हुई. पहले दलितों और उसके बाद अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का विरोध किया गया. इसके साथ ही, दलितों और आदिवासियों के हिन्दूकरण के प्रयास जारी रहे. इसके लिए सामाजिक समरसता मंचों और वनवासी कल्याण आश्रमों का इस्तेमाल किया गया. इन ताकतों द्वारा कई स्तरों पर सोशल इंजीनियरिंग की जा रही है. इसके साथ ही, संस्कृत और हिन्दू कर्मकाण्डों को अपनाने के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया जा रहा है. लक्ष्य यह है कि दलित व आदिवासी ऊँची जातियों के हिन्दुओं की नकल करके ही स्वंय को धन्य मानने लगें.

इसी प्रक्रिया का एक भयावह नतीजा था गुजरात की हिंसा, जहाँ दलितों और आदिवासियों के एक तबके का अल्पसंख्यक मुसलमानों पर हिंसक हमले करने के लिए इस्तेमाल किया गया. यह मानना कि राममंदिर का शिलान्यास किसी दलित से करवाने से ही जातिप्रथा से जुड़ी समस्याएँ खत्म हो जाएंगी, भ्रामक है. दलितों और आदिवासियो की असली समस्याएँ भूख, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी हैं. इन समस्याओं को सुलझाने के लिए राज्य को सकारात्मक कदम उठाने होंगे और इन तबको को एक शक्तिशाली आंदोलन चलाकर, राज्य को ऐसे कदम उठाने के लिए मजबूर करना होगा.

समरसता का नाटक मात्र मृगमरीचिका है जिसका उद्देश्य इन वंचित वर्गों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाना है. दलितों व आदिवासियों को अपनी भौतिक आवश्यकताओं, गरिमा और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना है और इसके लिए उन्हें समाज के अन्य वंचित वर्गों-फिर चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, के साथ संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए. किसी प्रतिगामी, पहचान-आधारित सोच में फँसकर ये वर्ग अपना नुकसान ही करेंगे. मोदी और उनके जैसे अन्य लोग, सामाजिक ऊँच-नीच बनाये रखना चाहते हैं. उनके एजेण्डा में अल्पसंख्यकों का विरोध शामिल है और हमेशा रहेगा.

दलितों और उनसे जुड़े मुद्दो पर अंबेडकर व आर.एस.एस.-मोदी की सोच एक दूसरे से एकदम उलट है. जहाँ अंबेडकर जाति के उन्मूलन के पक्षधर थे वहीं आरएसएस-मोदी जातियों के बीच सद्भाव व समरसता की बातें करते हैं. अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया और भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता बने. आरएसएस नेता के. सुदर्शन ने सन् 2000 में कहा था कि भारतीय संविधान, पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है (उनका अर्थ शायद यह था कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्य पश्चिमी हैं!) और इसलिए इसके स्थान पर हिन्दू धर्मग्रंथों पर आधारित संविधान बनाया जाना चाहिए. मोदी का प्रयास सुदर्शन की इच्छा को पूरा करने की दिशा में एक कदम है. मोदी और सुदर्शन का सामाजिक एजेण्डा एक है और उन दोनों की ही जातिप्रथा के उन्मूलन में कोई रूचि नहीं है.

*मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया
13.11.2012, 16.35 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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